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बैंक एफडी में नॉमिनी नहीं है, तो क्या होगा?: अदालत तक पहुंच सकता है मामला, महीनों तक फंसी रह सकती है रकम
बोनस डेस्क, नई दिल्ली
Published by: Devesh Tripathi
Updated Mon, 22 Jun 2026 03:08 AM IST
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सार
अगर आपने अपनी बैंक एफडी में किसी को नॉमिनी नहीं बनाया है और न ही कोई कानूनी वसीयत लिखी है, तो आपके जाने के बाद आपका परिवार एक भयंकर दस्तावेजी चक्रव्यूह में फंस सकता है।
बैंक के नियम सख्त
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
बिना नॉमिनी और बिना वसीयत के बैंक अपने जोखिम नियंत्रण को बेहद सख्त कर देते हैं, जिससे हफ्तों में होने वाला काम महीनों के लिए लटक जाता है।
बिना नॉमिनी होगी मुश्किल
अगर एफडी कर्ता का निधन हो जाए, तो परिवार के लिए पैसा निकालने की राह लंबी, दस्तावेजी और तनावपूर्ण हो जाती है। रिजर्व बैंक के दिशानिर्देशों के अनुसार, बैंकों को मृतक जमाकर्ताओं के दावों को निपटाने के लिए एक पारदर्शी प्रक्रिया रखनी होती है, लेकिन नॉमिनी न होने पर बैंक बिना कड़े कानूनी प्रमाण के पैसा नहीं दे सकते।
जब बड़ी रकम फंसी हो, तो बैंक अपनी सुरक्षा के लिए सीधे सक्षम अदालत से जारी कानूनी दस्तावेज मांगने पर अड़ जाते हैं। इनमें लीगल हायर सर्टिफिकेट, उत्तराधिकार प्रमाणपत्र, या प्रोबेट/लेटर्स ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन शामिल हैं। इसके साथ ही बैंकों को सभी उत्तराधिकारियों के अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) और क्षतिपूर्ति बंधपत्र की जरूरत होती है।
सबसे बड़ी गलतफहमी नॉमिनी के अधिकार को लेकर है। आम लोग अक्सर सोचते हैं कि नॉमिनी ही पैसे का अंतिम मालिक बन जाता है, जो कि सरासर गलत है। नॉमिनी केवल एक ट्रस्टी या केयरटेकर होता है, जो कानूनी उत्तराधिकारियों की तरफ से बैंक से पैसा प्राप्त करता है। पैसे का अंतिम मालिकाना हक वसीयत या उत्तराधिकार कानून से ही तय होता है।
जरूरी सलाह
आज और इसी वक्त अपने नेट बैंकिंग एप में लॉग-इन करें और अपनी हर एक एफडी और बैंक खाते में नॉमिनी की स्थिति को अपडेट करें। यह एक छोटा-सा कदम आपके जाने के बाद आपके परिवार को मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना से बचा सकता है।
बिना नॉमिनी होगी मुश्किल
अगर एफडी कर्ता का निधन हो जाए, तो परिवार के लिए पैसा निकालने की राह लंबी, दस्तावेजी और तनावपूर्ण हो जाती है। रिजर्व बैंक के दिशानिर्देशों के अनुसार, बैंकों को मृतक जमाकर्ताओं के दावों को निपटाने के लिए एक पारदर्शी प्रक्रिया रखनी होती है, लेकिन नॉमिनी न होने पर बैंक बिना कड़े कानूनी प्रमाण के पैसा नहीं दे सकते।
- ऐसी स्थिति में कानूनी उत्तराधिकारियों को अपनी पात्रता साबित करने के लिए मृतक का मृत्यु प्रमाणपत्र, बैंक का निर्धारित दावा फॉर्म, दावेदार का आईडी व एड्रेस प्रूफ, और पैन या अन्य प्रासंगिक केवाईसी दस्तावेज जमा करने होते हैं।
- इसके अलावा, यदि एक से अधिक कानूनी उत्तराधिकारी हैं और कोई वसीयत नहीं है, तो एफडी की राशि उन सभी में संबंधित उत्तराधिकार कानून के हिसाब से बांटी जाएगी।
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जब बड़ी रकम फंसी हो, तो बैंक अपनी सुरक्षा के लिए सीधे सक्षम अदालत से जारी कानूनी दस्तावेज मांगने पर अड़ जाते हैं। इनमें लीगल हायर सर्टिफिकेट, उत्तराधिकार प्रमाणपत्र, या प्रोबेट/लेटर्स ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन शामिल हैं। इसके साथ ही बैंकों को सभी उत्तराधिकारियों के अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) और क्षतिपूर्ति बंधपत्र की जरूरत होती है।
- अदालत से उत्तराधिकार प्रमाणपत्र लेने की यह प्रक्रिया न सिर्फ हफ्तों से महीनों का समय खा जाती है, बल्कि इसमें जेब भी अच्छी-खासी ढीली होती है। कोर्ट फीस अलग-अलग राज्यों के हिसाब से संपत्ति के मूल्य के एक निश्चित प्रतिशत के रूप में वसूली जाती है।
- इसमें वकीलों का भारी खर्च, नोटरी और हलफनामे का कानूनी तामझाम मुफ्त में जुड़ जाता है। यदि उत्तराधिकारियों के बीच कोई आपसी विवाद हो जाए, तो यह समयसीमा और लंबी खिंच जाती है।
सबसे बड़ी गलतफहमी नॉमिनी के अधिकार को लेकर है। आम लोग अक्सर सोचते हैं कि नॉमिनी ही पैसे का अंतिम मालिक बन जाता है, जो कि सरासर गलत है। नॉमिनी केवल एक ट्रस्टी या केयरटेकर होता है, जो कानूनी उत्तराधिकारियों की तरफ से बैंक से पैसा प्राप्त करता है। पैसे का अंतिम मालिकाना हक वसीयत या उत्तराधिकार कानून से ही तय होता है।
जरूरी सलाह
आज और इसी वक्त अपने नेट बैंकिंग एप में लॉग-इन करें और अपनी हर एक एफडी और बैंक खाते में नॉमिनी की स्थिति को अपडेट करें। यह एक छोटा-सा कदम आपके जाने के बाद आपके परिवार को मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना से बचा सकता है।