Biz Updates: US में भारतीय सोलर सेल पर 123 फीसदी एंटी-डंपिंग शुल्क; देश के विदेशी मुद्रा भंडार में बढ़ोतरी
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भारतीय कंपनियों पर आरोप लगाया गया है कि वे अपने उत्पादों को अमेरिकी बाजार में उनकी वास्तविक लागत से काफी कम कीमत पर बेच रही हैं। विभाग ने चार भारतीय कंपनियों के नामों का जिक्र किया है, जिनमें मुंद्रा सोलर पीवी, मुंद्रा सोलर एनर्जी, कोवा कंपनी व प्रीमियर एनर्जी फोटोवोल्टाइक शामिल हैं। अमेरिका ने इन कंपनियों की औसत डंपिंग मार्जिन की गणना 123.07 फीसदी की है। उनके अनुमानित भारित औसत डंपिंग मार्जिन की गणना 123.07 प्रतिशत की गई है।
अब अमेरिकी आयातकों को इन सौर उत्पादों के आयात के समय निर्धारित शुल्क के बराबर नकदी जमा करनी होगी। विभाग ने कहा कि वह अपने शुरुआती निर्णय की तारीख से 75 दिन में अंतिम निर्णय जारी करेगा। भारत के अलावा लाओस और इंडोनेशिया के खिलाफ भी सौर सेल और पैनल की डंपिंग को लेकर इसी तरह की जांच की जा रही है।
रिजर्व बैंक के ताजा आंकड़ों के अनुसार, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 17 अप्रैल को खत्म हुए सप्ताह में 2.362 अरब डॉलर बढ़कर 703.308 अरब डॉलर हो गया। इससे पहले वाले हफ्ते में भी इसमें 3.825 अरब डॉलर की बढ़त दर्ज की गई थी। हालांकि, यह अभी भी फरवरी के अंत में बने 728.494 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर से नीचे है। विशेषज्ञों के मुताबिक पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर भारतीय रुपये पर पड़ा, जिससे आरबीआई को बाजार में डॉलर बेचकर हस्तक्षेप करना पड़ा। विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा 'फॉरेन करेंसी एसेट्स' होता है, जो इस हफ्ते 1.481 अरब डॉलर बढ़कर 557.463 अरब डॉलर हो गया।
इसके अलावा, सोने के भंडार में भी 790 मिलियन डॉलर की बढ़ोतरी हुई और यह 122.133 अरब डॉलर पहुंच गया। वहीं, स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स (SDRs) में 78 मिलियन डॉलर की बढ़त हुई। आईएमएफ में भारत की रिजर्व पोजिशन भी थोड़ा बढ़कर 4.87 अरब डॉलर हो गई। कुल मिलाकर, विदेशी मुद्रा भंडार में यह बढ़ोतरी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत मानी जा रही है, हालांकि वैश्विक हालात अभी भी चुनौती बने हुए हैं।
सेबी का निवेशकों की सुरक्षा और कारोबार को आसान बनाने प्रयास
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने निवेशकों की सुरक्षा और कारोबार को आसान बनाने के लिए एक बड़ा प्रस्ताव जारी किया है। सेबी ने ग्राहकों के “अनपेड सिक्योरिटीज” यानी जिन शेयरों का भुगतान समय पर नहीं हुआ है, उनके नियमों में बदलाव सुझाए हैं। नए प्रस्ताव के अनुसार, ब्रोकर अब ग्राहकों को भुगतान करने के लिए अधिकतम 5 ट्रेडिंग दिनों का समय दे सकेंगे। हालांकि, वे अपनी नीति के अनुसार इससे कम समय भी तय कर सकते हैं। अगर ग्राहक शाम 5 बजे से पहले भुगतान कर देता है, तो उसी दिन उसके शेयरों पर लगी पाबंदी (प्लेज) हटा दी जाएगी, जबकि देर से भुगतान करने पर अगले ट्रेडिंग दिन यह प्रक्रिया पूरी होगी।
सेबी ने यह भी सुझाव दिया है कि जरूरत के अनुसार आंशिक रूप से शेयरों को रिलीज किया जा सके, जिससे निवेशकों को ज्यादा सुविधा मिले। इसके अलावा, अगर 6 ट्रेडिंग दिनों तक न तो शेयर बेचे जाते हैं और न ही भुगतान होता है, तो वे अपने आप प्लेज से मुक्त हो जाएंगे। खास परिस्थितियों जैसे ट्रेडिंग बंद होने या बाजार में उतार-चढ़ाव के दौरान, ब्रोकर को एक हफ्ते तक अतिरिक्त समय मिल सकता है। सेबी ने इन बदलावों पर 15 मई तक आम लोगों से राय मांगी है।
एसबीआई कैप्स की एक रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार भारत का पावर ट्रांसमिशन सेक्टर वित्त वर्ष 2027 में पांच सुस्त वर्षों के बाद रिकवरी की ओर बढ़ सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि नियामकीय बदलाव और नए निवेश मॉडल इस क्षेत्र में पूंजी प्रवाह तथा परिसंपत्तियों के उपयोग के तरीके को बदल सकते हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2022 से 2026 के बीच ट्रांसमिशन लाइन और सबस्टेशन विस्तार के लक्ष्य लगातार पूरे नहीं हो सके। इसके पीछे राइट ऑफ वे (Right of Way) में देरी, जमीन मूल्यांकन की जटिलताएं, ग्रेट इंडियनबस्टर्ड रूलींग , और चीन से सीमित आयात के कारण उपकरणों की कमी जैसे प्रमुख कारण रहे।
हालांकि, वित्त वर्ष 2026 में सुधार के शुरुआती संकेत देखने को मिले। इस दौरान ट्रांसमिशन लाइन जोड़ने की रफ्तार सालाना आधार पर 37 प्रतिशत बढ़ी, जबकि सबस्टेशन क्षमता विस्तार लगभग लक्ष्य के करीब पहुंच गया। इसके बावजूद रिपोर्ट में कहा गया है कि मार्च 2027 तक राष्ट्रीय विद्युत योजना का लक्ष्य हासिल होना मुश्किल नजर आ रहा है, जिससे इस क्षेत्र की बड़ी पूंजीगत निवेश योजनाएं अभी पाइपलाइन में बनी रहेंगी। एसबीआई कैप्स ने अगले छह वर्षों में पावर ट्रांसमिशन सेक्टर में करीब 7.6 लाख करोड़ रुपये के निवेश अवसर का अनुमान जताया है, जो इस क्षेत्र में बड़े विस्तार की संभावनाओं को दर्शाता है।

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