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Biz Updates: 40 फीसदी गिग कर्मचारी की कमाई 15 हजार से कम, कौशल विकास से रोजगार बढ़ाने की जरूरत

बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिवम गर्ग Updated Fri, 30 Jan 2026 06:54 AM IST
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शेयर बाजार, कारोबार और वाणिज्य जगत की अहम खबरें - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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देश के करीब 40 फीसदी गिग (अस्थायी) कर्मचारी हर महीने 15,000 रुपये से भी कम कमाते हैं। यह आंकड़ा बताता है कि नियमित एवं अस्थायी रोजगार के बीच कमाई के मोर्चे पर अब भी एक बड़ी खाई है, जिसे पाटने के लिए उचित मजदूरी सुनिश्चित करने की जरूरत है। साथ ही, 1.20 करोड़ से अधिक गिग कर्मचारियों के वेतन में सुधार के लिए नीतिगत हस्तक्षेप की आवश्यकता है।

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जोमैटो संस्थापक दीपिंदर गोयल ने हाल ही में कहा था कि उनके प्लेटफॉर्म पर डिलीवरी पार्टनर दिन में 8-10 घंटे और सप्ताह में छह दिन काम कर हर माह 25,000 रुपये कमा सकते हैं। लेकिन, आर्थिक समीक्षा में इससे जुड़ी एक अलग ही सच्चाई सामने आई है।
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प्रति घंटा न्यूनतम आय निर्धारित करना जरूरी
आर्थिक समीक्षा में नियमित एवं अस्थायी रोजगार के बीच कमाई के अंतर को कम करने के लिए प्रति घंटा या प्रति काम के हिसाब से न्यूनतम कमाई तय करने का सुझाव दिया गया है, जिसमें वेटिंग अवधि का मुआवजा भी शामिल हो। गिग कर्मियों की संख्या 2029-30 तक कुल श्रमबल 6.7% हो जाएगी। 80 करोड़ से अधिक कर्मचारी स्मार्टफोन चलाते हैं और हर माह 15 अरब यूपीआई लेनदेन करते हैं।

कौशल विकास: स्कूल छोड़ने वालों की घटेगी संख्या, 13 फीसदी बढ़ेगा रोजगार

देश के विद्यालयों में युवाओं को बाजार के अनुरूप कौशल प्रशिक्षण दिया जा सकता है। विशेष रूप से सेवा क्षेत्र में जहां प्रशिक्षित युवाओं में से आधे से अधिक कार्यरत हैं। शिक्षा को आर्थिक अवसरों से जोड़ा जाए तो स्कूल छोड़ने वालों की संख्या में भी कमी आएगी। 15 से 29 साल वाले युवाओं में केवल 4.9 फीसदी को ही औपचारिक व्यावसायिक या तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त है। 21.2 फीसदी ने अनौपचारिक स्रोतों से प्रशिक्षण लिया है। इसलिए कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रमों के कवरेज को बढ़ाने की जरूरत है।


जिला कौशल समितियों को स्थानीय आधारशिला के रूप में मजबूत करने की जरूरत। छोटे और मझोले उद्योगों के क्लस्टर मॉडल और कंपनियों के आकार के आधार पर उन्हें दिए जाने वाले श्रेणीबद्ध प्रोत्साहनों के माध्यम से उद्योग की भागीदारी को बढ़ाया जा सकता है। औपचारिक कौशल विकास में निवेश के जरिये कुशल कार्यबल में 12 फीसदी की वृद्धि से 2030 तक श्रम प्रधान क्षेत्रों में रोजगार 13 फीसदी बढ़ा सकते हैं।

एमएसएमई : 8.1 लाख करोड़ का लंबित भुगतान बड़ी चुनौती
करीब 8.1 लाख करोड़ रुपये के विलंबित भुगतान देश के लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के विकास को बाधित कर रहे हैं। ये कार्यशील पूंजी को प्रभावित कर रहे हैं। यह क्षेत्र विनिर्माण क्षेत्र में वर्तमान गति का लाभ उठाने के लिए अच्छी स्थिति में है। सूक्ष्म उद्यमों और पहली बार ऋण लेने वालों को कर्ज उपलब्ध कराने के लिए नकदी प्रवाह आधारित ऋण सहित नए उपायों की जरूरत है। ऋण के बढ़ते दायरे और डिजिटल एकीकरण में वृद्धि के बावजूद सीमित गारंटी और दस्तावेजीकरण की कमी के कारण कई सूक्ष्म उद्यमों के लिए औपचारिक ऋण तक पहुंच एक बड़ी बाधा बनी हुई है।

विशेष रूप से महिला स्वामित्व वाले एमएसएमई वाणिज्यिक ऋण का एक छोटा हिस्सा हैं। हालांकि उद्यम योजना के तहत औपचारिकीकरण और लक्षित ऋण दिशा-निर्देश धीरे-धीरे इस अंतर को पाट रहे हैं। एमएसएमई कर्ज ने हाल में सकारात्मक गति बनाए रखी है, जिसे इस क्षेत्र में ऋण प्रवाह बढ़ाने के उद्देश्य से सरकार के कई हस्तक्षेपों से बल मिला है। विलंबित भुगतान से तरलता प्रभावित होती है। डिजिटल ऋण साझेदारी को गति देने से उद्यमों को समय पर और सस्ता फाइनेंस दिया जा सकता है।

घटी गरीबी : सबसे निचले तबके के खर्च में भारी उछाल

सरकार के लक्षित कल्याणकारी उपायों से गरीबी में उल्लेखनीय कमी आई है और आय वितरण में भी सुधार हुआ है। इससे सबसे निचली पांच से 10 फीसदी आबादी के उपभोग खर्च में सर्वाधिक तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। सब्सिडी, पेंशन, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण और शिक्षा-स्वास्थ्य सेवा पर सार्वजनिक खर्च जैसे उपायों से कमजोर वर्ग को गरीबी के दुष्चक्र से निकलने में मदद मिली है।

बदलेगी परिभाषा : 26% हिस्सेदारी पर भी सरकारी मानी जाएगी कंपनी

आर्थिक समीक्षा में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की परिभाषा बदलने का सुझाव दिया गया है। इसके तहत, अब 51 फीसदी के बजाय सिर्फ 26 फीसदी हिस्सेदारी होने पर भी कंपनी को सरकारी माना जा सकता है। इससे कंपनी पर सरकारी नियंत्रण भले ही कम हो जाएगा, लेकिन महत्वपूर्ण फैसलों पर सरकार का प्रभाव बना रहेगा। जो सरकारी कंपनियां बेची जानी हैं, उनकी कानूनी परिभाषा बदले बिना भी सरकार अपनी हिस्सेदारी 51 फीसदी से कम कर सकती है। इससे कंपनी को पूरी तरह बेचने की राह आसान होगी। सरकारी खजाना भरने और कंपनियों के बेहतर प्रबंधन में मदद मिलेगी।
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