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EPFO के नए नियम: ईपीएफ में 1,800 रुपये से अधिक का अंशदान अब स्वैच्छिक, इससे फायदा होगा या नुकसान?
Fri, 03 Jul 2026 11:05 AM IST
नितिन गौतम
पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: नितिन गौतम
Updated Fri, 03 Jul 2026 11:05 AM IST
सार
ईपीएफओ ने अपने नियमों में हाल ही में कुछ बदलाव किए हैं। इन बदलावों के तहत अब ईपीएफ में 1800 रुपये से अधिक का अंशदान स्वैच्छिक होगा। साथ ही कंपनियां भी 1800 रुपये तक का ही अंशदान देने के लिए कानूनी तौर पर बाध्य होंगी। इसका करीब 8 करोड़ पीएफ धारकों पर सीधा असर पड़ेगा।
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- फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
वेतनभोगी कर्मचारियों को अपनी बेसिक सैलरी का 12 फीसदी अंशदान ईपीएफ में करना होता था और कंपनी भी इतना ही अंशदान ईपीएफ में करती थी, लेकिन बीती 29 जून को श्रम मंत्रालय ने कर्मचारी भविष्य निधि योजना, 2026 के तहत नए प्रावधान अधिसूचित कर दिए हैं। इस प्रावधान के तहत कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) में 15,000 रुपये की मासिक वेतन सीमा से अधिक वेतन पर किए जाने वाले अंशदान को स्वैच्छिक बना दिया है। यानी 15,000 रुपये की वेतन सीमा के आधार पर निर्धारित 1,800 रुपये से अधिक का ईपीएफ अंशदान अब अनिवार्य नहीं होगा।
क्या हैं नए नियम?
नए नियमों ने कर्मचारी भविष्य निधि योजना, 1952 की जगह ली है। अब इससे पहले कर्मचारी भविष्य निधि योजना, 1952 के तहत 15,000 रुपये की मासिक वेतन सीमा किसी कर्मचारी को कंपनी में नियुक्ति के समय अनिवार्य सामाजिक सुरक्षा कवरेज देने के लिए लागू होती थी। 15,000 रुपये तक के बेसिक वेतन वाले सभी कर्मचारियों को इस योजना के दायरे में अनिवार्य रूप से शामिल किया जाता था, जबकि इससे अधिक वेतन पाने वाले कर्मचारियों के पास ईपीएफओ द्वारा संचालित सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से स्वेच्छा से जुड़ने का विकल्प होता था।
एक बार योजना के दायरे में आने के बाद कर्मचारी अपने वास्तविक मूल वेतन के आधार पर ईपीएफ में अंशदान करते थे और नियोक्ता भी उतनी ही राशि का योगदान करते थे। यह अंशदान कई मामलों में सरकार द्वारा समय-समय पर तय की गई वेतन सीमा से अधिक वेतन पर भी किया जाता था। वर्तमान 15,000 रुपये की वेतन सीमा वर्ष 2014 में अधिसूचित की गई थी। अब नए नियमों के मुताबिक अब कर्मचारी योगदान को 15000 रुपये की वैधानिक वेतन सीमा से जोड़ दिया गया है। यानि अब कंपनियों के लिए सिर्फ 15 हजार रुपये पर 12 प्रतिशत यानी 1800 रुपये का अंशदान देना ही अनिवार्य होगा।
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हालांकि कर्मचारी स्वेच्छा से अधिक योगदान देना जारी रख सकते हैं। वहीं कंपनियां सिर्फ 1800 रुपये का अंशदान देने के लिए ही बाध्य होंगी। नई कर्मचारी भविष्य निधि योजना, 2026 में कहा गया है कि किसी सदस्य के संबंध में देय अंशदान केंद्र सरकार द्वारा समय-समय पर अधिसूचित वेतन सीमा के अधीन होगा।
पीएफ निकासी का दावा 20 दिनों में निपटाना जरूरी
नई व्यवस्था के तहत यदि भविष्य निधि, पेंशन या बीमा का दावा सभी आवश्यक दस्तावेजों के साथ पूरा होने के बावजूद 20 दिनों के भीतर नहीं निपटाया जाता, तो संबंधित आयुक्त पर 12 प्रतिशत वार्षिक दंडात्मक ब्याज लगाया जा सकेगा। यह राशि संबंधित अधिकारी के वेतन से काटी जाएगी। मंत्रालय का कहना है, इससे दावों के निपटारे में अनावश्यक देरी पर रोक लगेगी और कर्मचारियों को समय पर उनका पैसा मिलेगा। मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि पहले भी देरी होने पर ब्याज देने का प्रावधान था, लेकिन अब इसे स्पष्ट रूप से 12 प्रतिशत तय कर दिया गया है। पहले अधिकारियों को पीएफ पर घोषित ब्याज दर के अनुसार भुगतान करना पड़ता था।
पीएफ धारकों पर क्या होगा असर?
अभी कंपनियां बेसिक सैलरी का 12 फीसदी पीएफ अंशदान काटती थीं और उन्हें भी उतना ही अंशदान देना होता था। ऐसे में जिन लोगों की बेसिक सैलरी 15 हजार से ज्यादा होती थी, उनका पीएफ भी ज्यादा कटता था और बचत ज्यादा होती थी। अब पीएफ कम कटेगा तो हाथ में सैलरी ज्यादा आएगी, लेकिन इससे बचत भी कम होगी। हालांकि ये अपने आप नहीं होगा बल्कि कंपनियों और कर्मचारियों की इस बारे में आपसी सहमति जरूरी है।
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क्या हैं नए नियम?
नए नियमों ने कर्मचारी भविष्य निधि योजना, 1952 की जगह ली है। अब इससे पहले कर्मचारी भविष्य निधि योजना, 1952 के तहत 15,000 रुपये की मासिक वेतन सीमा किसी कर्मचारी को कंपनी में नियुक्ति के समय अनिवार्य सामाजिक सुरक्षा कवरेज देने के लिए लागू होती थी। 15,000 रुपये तक के बेसिक वेतन वाले सभी कर्मचारियों को इस योजना के दायरे में अनिवार्य रूप से शामिल किया जाता था, जबकि इससे अधिक वेतन पाने वाले कर्मचारियों के पास ईपीएफओ द्वारा संचालित सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से स्वेच्छा से जुड़ने का विकल्प होता था।
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एक बार योजना के दायरे में आने के बाद कर्मचारी अपने वास्तविक मूल वेतन के आधार पर ईपीएफ में अंशदान करते थे और नियोक्ता भी उतनी ही राशि का योगदान करते थे। यह अंशदान कई मामलों में सरकार द्वारा समय-समय पर तय की गई वेतन सीमा से अधिक वेतन पर भी किया जाता था। वर्तमान 15,000 रुपये की वेतन सीमा वर्ष 2014 में अधिसूचित की गई थी। अब नए नियमों के मुताबिक अब कर्मचारी योगदान को 15000 रुपये की वैधानिक वेतन सीमा से जोड़ दिया गया है। यानि अब कंपनियों के लिए सिर्फ 15 हजार रुपये पर 12 प्रतिशत यानी 1800 रुपये का अंशदान देना ही अनिवार्य होगा।
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हालांकि कर्मचारी स्वेच्छा से अधिक योगदान देना जारी रख सकते हैं। वहीं कंपनियां सिर्फ 1800 रुपये का अंशदान देने के लिए ही बाध्य होंगी। नई कर्मचारी भविष्य निधि योजना, 2026 में कहा गया है कि किसी सदस्य के संबंध में देय अंशदान केंद्र सरकार द्वारा समय-समय पर अधिसूचित वेतन सीमा के अधीन होगा।
पीएफ निकासी का दावा 20 दिनों में निपटाना जरूरी
नई व्यवस्था के तहत यदि भविष्य निधि, पेंशन या बीमा का दावा सभी आवश्यक दस्तावेजों के साथ पूरा होने के बावजूद 20 दिनों के भीतर नहीं निपटाया जाता, तो संबंधित आयुक्त पर 12 प्रतिशत वार्षिक दंडात्मक ब्याज लगाया जा सकेगा। यह राशि संबंधित अधिकारी के वेतन से काटी जाएगी। मंत्रालय का कहना है, इससे दावों के निपटारे में अनावश्यक देरी पर रोक लगेगी और कर्मचारियों को समय पर उनका पैसा मिलेगा। मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि पहले भी देरी होने पर ब्याज देने का प्रावधान था, लेकिन अब इसे स्पष्ट रूप से 12 प्रतिशत तय कर दिया गया है। पहले अधिकारियों को पीएफ पर घोषित ब्याज दर के अनुसार भुगतान करना पड़ता था।
पीएफ धारकों पर क्या होगा असर?
अभी कंपनियां बेसिक सैलरी का 12 फीसदी पीएफ अंशदान काटती थीं और उन्हें भी उतना ही अंशदान देना होता था। ऐसे में जिन लोगों की बेसिक सैलरी 15 हजार से ज्यादा होती थी, उनका पीएफ भी ज्यादा कटता था और बचत ज्यादा होती थी। अब पीएफ कम कटेगा तो हाथ में सैलरी ज्यादा आएगी, लेकिन इससे बचत भी कम होगी। हालांकि ये अपने आप नहीं होगा बल्कि कंपनियों और कर्मचारियों की इस बारे में आपसी सहमति जरूरी है।