Explainer: कभी लापरवाही, कभी हिंसा के कारण विवादों में रहे डे-केयर का बाजार कितना बड़ा; कैसे हुआ इसका विस्तार?
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विस्तार
देश में कामकाजी अभिभावकों की संख्या बढ़ने के साथ डे-केयर और क्रेच की जरूरत भी तेजी से बढ़ी है। खासकर शहरों में जहां ज्यादातर एकल परिवार होते हैं और माता-पिता दोनों नौकरी करते हैं, वहां छोटे बच्चों की देखभाल के लिए डे-केयर सेंटर एक जरूरत बन चुके हैं। ये डे केयर सेंटर कई बार गंभीर अनियमितताओं की वजह से सु्र्खियों में रहते हैं। ऐसा ही एक मामला हाल ही में बंगलूरू में सामने आया है, जिसने एक बार फिर इन केंद्रों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि डे-केयर को लेकर किस तरह के मामले सामने आ रहे हैं? डे केयर को लेकर सरकारी दिशानिर्देश क्या हैं? क्रेच खोलने से पहले किन बातों का ध्यान रखना जरूरी है? डे-केयर में स्टाफ की नियुक्ति के क्या नियम हैं? सुरक्षा के लिए क्या-क्या नियम तय किए गए हैं? देश में डे-केयर बाजार कितनी तेजी से और क्यों बढ़ रहा है? आइए विस्तार से जानते हैं।
डे-केयर से जुड़े हालिया विवाद क्या हैं?
हाल ही में बंगलूरू के ब्रुकफील्ड स्थित कैपजेमिनी परिसर के 'लिटिल बड्स डे-केयर' में दो-तीन साल के बच्चों के साथ क्रूरता का मामला सामने आया। आरोप है कि डे-केयर की महिला कर्मचारियों ने रोते हुए बच्चों को फ्रंट-लोडिंग वॉशिंग मशीन में डाल दिया, उन्हें बाथरूम में बंद किया, वेस्टर्न टॉयलेट पर बैठाया और टॉयलेट के जेट स्प्रे से उनके मुंह में पानी डाला। बच्चों को चुप रहने के लिए धमकाया भी गया। वीडियो सामने आने के बाद पांच महिला कर्मचारियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है।
इससे पहले महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर में 23 महीने के एक बच्चे को कथित तौर पर दूसरे बच्चे ने 25 बार काट लिया। आरोप है कि उस समय कमरे में कोई देखभाल करने वाला मौजूद नहीं था। परिवार ने यह भी आरोप लगाया कि घटना के बाद मामले को दबाने की कोशिश की गई।
पिछले साल नोएडा के सेक्टर-137 स्थित एक रिहायशी सोसायटी के डे-केयर में भी 15 महीने की बच्ची के साथ मारपीट का मामला सामने आया था। बच्ची के शरीर पर काटने के निशान मिले थे। बाद में सीसीटीवी फुटेज में कर्मचारी बच्ची को थप्पड़ मारते और जमीन पर गिराते हुए दिखाई दी थी।
क्रेच/ डे केयर को लेकर क्या हैं नियम?
महिला व बाल विकास मंत्रालय ने श्रम मंत्रालय के साथ मिलकर वर्ष 2024 में भारत में क्रेच स्थापित करने और उनके संचालन के लिए राष्ट्रीय न्यूनतम मानक और प्रोटोकॉल जारी किए थे। इन दिशा निर्देशों का उद्देश्य देशभर में बच्चों की देखभाल की सेवाओं को संस्थागत रूप देना और कामकाजी महिलाओं की भागीदारी को बढ़ावा देना है। इसमें क्रेच और डे-केयर को परिभाषित भी किया गया है।
क्रेच की परिभाषा क्या है?
दिशा निर्देशों के अनुसार, क्रेच ऐसा देखभाल केंद्र है जहां माता-पिता या अभिभावकों के काम पर रहने के दौरान बच्चों को सुरक्षित और पोषणयुक्त वातावरण उपलब्ध कराया जाता है। यहां बच्चों के स्वास्थ्य का ध्यान रखा जाता है, उन्हें पूरक पौष्टिक भोजन दिया जाता है तथा उनकी उम्र के अनुसार सीखने और खेलने की गतिविधियां कराई जाती हैं ताकि उनका समग्र विकास हो सके।
क्रेच का उद्देश्य क्या है?
सरकार के अनुसार, क्रेच का मुख्य उद्देश्य कामकाजी माता-पिता के बच्चों की देखभाल करना और उन्हें सुरक्षित वातावरण देना है। इसके साथ ही महिलाओं को रोजगार जारी रखने में सहायता करना, महिला-नेतृत्व वाले विकास को बढ़ावा देना, महिलाओं के लिए नए रोजगार के अवसर पैदा करना, महिला श्रम भागीदारी बढ़ाना व चाइल्ड केयर और प्रशिक्षण के क्षेत्र में नए अवसर विकसित करना भी इसका उद्देश्य है।
क्रेच खोलने से पहले किन बातों का ध्यान रखना जरूरी है?
- छह महीने या उससे अधिक उम्र के बच्चों के लिए क्रेच खोला जा सकता है।
- इसे कार्यालय, आवासीय सोसायटी, स्कूल, अस्पताल या अन्य उपयुक्त स्थान पर स्थापित किया जा सकता है।
- कोशिश हो कि क्रेच बच्चों के घर या माता-पिता के कार्यस्थल के पास हो ताकि जरूरत पड़ने पर उनसे तुरंत संपर्क किया जा सके।
- जरूरत के अनुसार नियमित, दैनिक या घंटे के आधार पर देखभाल की सुविधा भी दी जा सकती है।
स्थान को लेकर क्या नियम हैं?
- क्रेच का ग्राउंड फ्लोर पर होना बेहतर माना गया है।
- अगर ऊपरी मंजिल पर हो तो सभी जरूरी सुरक्षा उपाय होने चाहिए।
- कमरों में पर्याप्त जगह, रोशनी और वेंटिलेशन होना चाहिए।
- बच्चों के आराम और गतिविधियों के लिए पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए।
- खिड़कियां सुरक्षित ऊंचाई पर हों और उनमें सुरक्षा जाली लगी हो।
बुनियादी सुविधाओं को लेकर क्या व्यवस्था होनी चाहिए?
क्रेच में बच्चों के अनुकूल शौचालय, बहता हुआ पानी और यूरिनल होना चाहिए। हाथ धोने के लिए साबुन या हैंडवॉश उपलब्ध होना जरूरी है। विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की जरूरतों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।
क्रेच के अंदर और बाहर साफ-सफाई बनाए रखना अनिवार्य है। सुरक्षित पेयजल की व्यवस्था होनी चाहिए। बच्चों को दिया जाने वाला भोजन क्रेच प्रशासन और अभिभावकों की आपसी सहमति से तय किया जा सकता है।
इसके अलावा बच्चों के लिए खिलौने, खेल सामग्री, ब्लॉक, प्रारंभिक शिक्षा की सामग्री और अन्य आवश्यक लर्निंग मटेरियल उपलब्ध होना चाहिए। जहां संभव हो वहां ऑडियो-वीडियो उपकरण भी लगाए जा सकते हैं ताकि बच्चों की उम्र के अनुसार सीखने की प्रक्रिया बेहतर हो सके।
सुरक्षा के लिए क्या-क्या नियम तय किए गए हैं?
- क्रेच पूरी तरह बच्चों के अनुकूल होना चाहिए और उसकी डिजाइन बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर तैयार की जानी चाहिए।
- क्रेच में 112, 1098, फायर सर्विस, चाइल्ड प्रोटेक्शन ऑफिसर और नजदीकी पुलिस स्टेशन जैसे जरूरी हेल्पलाइन नंबर प्रमुख स्थान पर लगे होने चाहिए।
- भोजन और साफ-सफाई का नियमित निरीक्षण होना चाहिए ताकि बच्चों के स्वास्थ्य से कोई समझौता न हो।
- सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि क्रेच में सीसीटीवी कैमरे लगाना अनिवार्य है ताकि बच्चों की निगरानी सुनिश्चित की जा सके।
- जहां संभव हो वहां अभिभावकों को भी सीसीटीवी देखने की सुविधा दी जा सकती है ताकि वे अपने कार्यस्थल से ही बच्चों की निगरानी कर सकें।
- इसके अलावा स्थानीय पुलिस स्टेशन, महिला व बाल विकास विभाग व श्रम विभाग के पास संबंधित क्रेच की पूरी जानकारी उपलब्ध होनी चाहिए।
स्टाफ की नियुक्ति के क्या नियम हैं?
- हर 20 से 25 बच्चों पर कम से कम एक क्रेच सुपरवाइजर और एक हेल्पर होना चाहिए।
- क्रेच सुपरवाइजर का कम से कम 12वीं पास होना जरूरी है, जबकि हेल्पर का कम से कम 10वीं पास होना चाहिए।
- स्टाफ के पास बच्चों की देखभाल का कम से कम दो वर्ष का अनुभव होना बेहतर माना गया है।
- चाइल्ड केयर या नर्सिंग में डिप्लोमा रखने वालों को प्राथमिकता दी जा सकती है।
- दिशानिर्देशों में बच्चों की देखभाल के लिए केवल महिला स्टाफ रखने की बात कही गई है।
- भर्ती से पहले पुलिस वेरिफिकेशन, चरित्र प्रमाण पत्र और मेडिकल सर्टिफिकेट लेना अनिवार्य बताया गया है।
- इसके अलावा हर क्रेच में एक प्रशासनिक समिति बनाने का भी प्रावधान है। इसमें क्रेच प्रशासक, सुपरवाइजर और लाभार्थी बच्चों के कम से कम तीन अभिभावकों को शामिल किया जा सकता है।
श्रम कानून क्या कहते हैं?
सामाजिक सुरक्षा संहिता और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य व कार्य परिस्थितियां संहिता के अनुसार जहां 50 या उससे अधिक कर्मचारी काम करते हैं वहां क्रेच की व्यवस्था होना अनिवार्य है। इन कानूनों के तहत कामकाजी महिलाओं को दिन में चार बार क्रेच जाने की अनुमति देने का भी प्रावधान है, जिसमें विश्राम का समय भी शामिल है। इसका उद्देश्य छह वर्ष से कम उम्र के बच्चों की माताओं को नौकरी और परिवार के बीच संतुलन बनाने में मदद करना है। इन कानूनों में यह भी प्रावधान है कि संस्थान चाहें तो केंद्र सरकार, राज्य सरकार, नगर निकाय, निजी संस्थाओं या गैर-सरकारी संगठनों द्वारा संचालित साझा क्रेच सुविधा का भी उपयोग कर सकते हैं।
भारत में डे-केयर बाजार कितनी तेजी से बढ़ रहा है?
- आईएमएआरएसी की रिपोर्ट के अनुसार, भारत का प्री-स्कूल/ चाइल्डकेयर बाजार 2025 में 5.1 अरब डॉलर ( यानी 47,000 करोड़ रुपये) का था।
- इसके 2034 तक बढ़कर 12 अरब डॉलर (1.14 लाख करोड़ रुपये) तक पहुंचने का अनुमान है।
- 2026 से 2034 के बीच इसमें 9.16 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि रहने का अनुमान लगाया गया है।
किस सेगमेंट की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा?
रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में फुल डे-केयर की हिस्सेदारी 64.5 प्रतिशत रही। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि शहरों में ड्यूल इनकम परिवार बढ़ रहे हैं, जहां माता-पिता दोनों नौकरी करते हैं और पूरे दिन बच्चों की देखभाल की जरूरत होती है।
माता-पिता डे-केयर पर क्यों करते हैं भरोसा?
- फुल डे-केयर सेंटर बच्चों को पढ़ाई, खेल, भोजन, आराम और अन्य गतिविधियां एक ही जगह उपलब्ध कराते हैं। इससे कामकाजी माता-पिता पर बोझ कम होता है और बच्चों को पूरे दिन व्यवस्थित माहौल मिलता है।
- ऐसे केंद्रों में भाषा, संगीत, कला और सामाजिक गतिविधियों पर भी ध्यान दिया जाता है। यही कारण है कि कई डे-केयर बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर, प्रशिक्षित स्टाफ, भोजन और परिवहन जैसी अतिरिक्त सुविधाओं पर निवेश कर रहे हैं।
कहां सबसे ज्यादा मांग?
दिल्ली-एनसीआर की बाजार हिस्सेदारी 24.5 प्रतिशत रही। यहां अधिक जनसंख्या, न्यूक्लियर परिवारों की संख्या और बड़ी संख्या में कामकाजी पेशेवरों के कारण डे-केयर की मांग सबसे ज्यादा है।
डे-केयर बाजार का विस्तार क्यों हो रहा है?
महिलाओं की बढ़ती कार्यभागीदारी
10 लाख से ज्यादा आबादी वाले शहरों में महिलाओं का वर्कर पॉपुलेशन रेशियो (डब्ल्यूपीआर) 2017-18 में जहां 17.9% था, वह 2025 में बढ़कर 25.5% पहुंच गया। इसका असर यह हुआ है कि डे-केयर अब केवल विकल्प नहीं बल्कि कामकाजी परिवारों की जरूरत बन गया है।
शहरीकरण और न्यूक्लियर परिवार
तेजी से बढ़ते शहरीकरण के कारण संयुक्त परिवारों की जगह न्यूक्लियर परिवारों की संख्या बढ़ी है। पहले जहां बच्चों की देखभाल परिवार के अन्य सदस्य कर लेते थे, वहीं अब कामकाजी माता-पिता को पेशेवर डे-केयर सेवाओं का सहारा लेना पड़ता है।
दूसरी रिपोर्ट क्या कहती है?
ग्रैंड व्यू होरिजोन रिसर्च के अनुसार, देश का चाइल्ड केयर सर्विसेज बाजार 2030 तक 25,892.3 मिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। वर्ष 2024 में वैश्विक चाइल्ड केयर सर्विसेज बाजार में भारत की हिस्सेदारी 5.6 प्रतिशत रही।
हाल की घटनाएं यह दिखाती हैं कि देश में डे-केयर सेवाओं की मांग लगातार बढ़ रही है। लेकिन इसके साथ सुरक्षा, प्रशिक्षित स्टाफ, प्रभावी निगरानी और तय मानकों का पालन सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है, ताकि माता-पिता अपने बच्चों को सुरक्षित माहौल में छोड़ सकें।