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ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट: विकास के नाम पर विनाश या देश के लिए गेमचेंजर? विरोध के बीच आसान भाषा में समझें सब कुछ

बिजनेस न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Kumar Vivek Updated Sat, 02 May 2026 08:43 PM IST
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सार

81,000 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से शुरू हो रहे ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को लेकर राहुल गांधी ने 'विकास के नाम पर विनाश' का आरोप क्यों लगाया है? आसान भाषा में समझें इस मेगा-प्रोजेक्ट के सामरिक फायदे, पर्यावरण का नुकसान और आदिवासी समुदायों पर पड़ने वाला असर। ग्रेट निकोबार विवाद से जुड़े 11 सबसे जरूरी सवालों के जवाब यहां जानिए।

Great Nicobar Project Explained: Inside India's $10B Strategic Answer to China's Maritime Push
ग्रेट निकोबार परियोजना से जुड़े हर सवाल का जवाब - फोटो : amarujala.com
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विस्तार

अंडमान-निकोबार द्वीप समूह का सुदूर दक्षिणी छोर इन दिनों देश की राजनीति और भू-रणनीतिक चर्चाओं का केंद्र बना हुआ है। हाल ही में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कैंपबेल बे का दौरा करने के बाद केंद्र सरकार के 'ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट' को 'विकास के नाम पर विनाश' और 'देश की प्राकृतिक तथा आदिवासी विरासत के खिलाफ सबसे बड़ा घोटाला' करार दिया है। एक तरफ विपक्ष और पर्यावरणविद् इसे प्रकृति और आदिवासियों के लिए मौत का फरमान मान रहे हैं, तो दूसरी तरफ सरकार इसे भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक महाशक्ति बनने की दिशा में एक 'अपरिहार्य सामरिक जरूरत' बता रही है। 

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आखिर 81,000 करोड़ रुपये का यह मेगा-प्रोजेक्ट है क्या? क्यों इसे लेकर इतना भारी विवाद है? आइए, एक आसान सवाल-जवाब में इस पूरे विषय को डिकोड करते हैं, ताकि आपके मन में उठ रहे हर सवाल का स्पष्ट जवाब मिल सके।
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सवाल: ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट आखिर क्या है और इसमें क्या-क्या बनेगा?
जवाब:
भारत सरकार 'द्वीपों के समग्र विकास' (Holistic Development of Islands) कार्यक्रम के तहत ग्रेट निकोबार द्वीप को एक वैश्विक समुद्री और व्यापारिक हब में बदलना चाहती है। इस मेगा-प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत करीब 72,000 करोड़ से 82,000 करोड़ रुपये (लगभग $10 बिलियन) है और इसे 166.10 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र (द्वीप का करीब 16% हिस्सा) में विकसित किया जाएगा। कुछ अनुमानों के अनुसार इसकी लागत 92,000 करोड़ रुपये तक जा सकती है।

इसमें मुख्य रूप से चार बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर बनाए जाएंगे:

  • कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (ICTT): गैलाथिया बे में 14.2 मिलियन TEU क्षमता का एक विशाल अंतरराष्ट्रीय बंदरगाह बनेगा।
  • ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट: सैन्य और नागरिक उपयोग (Dual-use) के लिए एक नया हवाई अड्डा बनेगा, जिसकी क्षमता सालाना 1 करोड़ यात्रियों को संभालने की होगी। 
  • पावर प्लांट: 450 MVA क्षमता का गैस और सौर ऊर्जा संयंत्र लगाया जाएगा।
  • इंटीग्रेटेड टाउनशिप: एक नया शहर बसाया जाएगा, जहां भविष्य में 3.36 लाख से 6.5 लाख लोगों के बसने की योजना है।

सवाल: राहुल गांधी और विपक्ष इस प्रोजेक्ट का इतना विरोध क्यों कर रहे हैं?
जवाब:
विपक्ष और पर्यावरणविदों के विरोध का मुख्य कारण इससे होने वाला भारी प्राकृतिक नुकसान है। राहुल गांधी का आरोप है कि इस प्रोजेक्ट के तहत करीब 160 वर्ग किलोमीटर के घने जंगल काटे जाएंगे, जिससे लाखों पेड़ खत्म हो जाएंगे और स्थानीय आदिवासियों के अधिकारों का हनन होगा। 

पर्यावरणविदों के अनुसार, यहां करीब 8.5 लाख से 10 लाख पेड़ (कुछ दावों के अनुसार 58 लाख तक) काटे जाने का अनुमान है। इसके अलावा, जिस गैलाथिया बे में बंदरगाह बन रहा है, वह विलुप्तप्राय 'विशाल लेदरबैक समुद्री कछुओं' के घोंसले बनाने का दुनिया का सबसे अहम ठिकाना है। निर्माण कार्यों के शोर और रोशनी से इनका जीवन और प्रजनन बुरी तरह प्रभावित होगा।

सवाल: अगर इतना नुकसान है, तो सरकार के लिए यह प्रोजेक्ट इतना अहम क्यों है?
जवाब:
सरकार के लिए यह प्रोजेक्ट देश की 'आर्थिक आत्मनिर्भरता'और 'सामरिक सुरक्षा' का ब्रह्मास्त्र है। 

  • आर्थिक फायदा: वर्तमान में भारत के पास बड़े जहाजों को संभालने के लिए गहरे पानी के बंदरगाह नहीं हैं, जिससे हमारा 75% 'ट्रांसशिपमेंट कार्गो' श्रीलंका (कोलंबो) और सिंगापुर से होकर आता है। इस प्रोजेक्ट के बनने से विदेशी बंदरगाहों पर हमारी निर्भरता घटेगी और हर साल लगभग 200 से 220 मिलियन डॉलर (करीब 1,600 से 1,800 करोड़ रुपये) की बचत होगी।
  • सामरिक फायदा: यह द्वीप दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्ग 'मलक्का जलडमरूमध्य' से सिर्फ 40 समुद्री मील दूर है। चीन भी भारत को घेरने के लिए म्यांमार के 'कोको द्वीप' पर तेजी से अपना सैन्यीकरण कर रहा है। ऐसे में ग्रेट निकोबार में भारतीय सेना और नौसेना की मजबूत मौजूदगी चीन की चालों का सबसे करारा जवाब होगी।

सवाल: जंगल कटने से जो नुकसान होगा, उसकी भरपाई कैसे की जाएगी?
जवाब:
कानून के मुताबिक, जहां वन काटे जाते हैं, उसके बदले सरकार को 'प्रतिपूरक वनीकरण' (Compensatory Afforestation) करना होता है। चूंकि अंडमान-निकोबार में पहले से ही 75% से अधिक जंगल हैं, इसलिए वहां नए जंगल लगाना संभव नहीं है। 

इसके समाधान के लिए सरकार ने एक अनोखा (और पर्यावरणविदों की नजर में विवादित) फैसला लिया है। निकोबार के जंगलों की कटाई की भरपाई हरियाणा के अरावली क्षेत्र (97.30 वर्ग किमी) में पेड़ लगाकर की जाएगी। सरकार का यह भी कहना है कि 166 वर्ग किमी प्रोजेक्ट एरिया में से करीब 65.99 वर्ग किमी हिस्से को 'ग्रीन जोन' के रूप में सुरक्षित रखा जाएगा।



सवाल: वहां रहने वाले आदिवासियों (शोम्पेन और निकोबारी) का क्या होगा?
जवाब:
यह सबसे संवेदनशील मानवीय संकट है। यहां बाहरी दुनिया से कटे रहने वाले 'शोम्पेन' (आबादी 237-250) और तटीय क्षेत्रों में रहने वाले 'निकोबारी' (आबादी 1,094-1,200) आदिवासी रहते हैं। विशेषज्ञों की चेतावनी है कि जब द्वीप की आबादी 8,000 से बढ़कर 3.5 लाख से अधिक हो जाएगी, तो "जनसांख्यिकीय विस्फोट" होगा। बाहरी लोगों के संपर्क में आने से शोम्पेन जनजाति को फ्लू जैसी विदेशी बीमारियों का खतरा है, जिससे लड़ने की उनकी शारीरिक क्षमता (इम्युनिटी) नहीं है। 

हालांकि, सरकार का स्पष्ट आश्वासन है कि किसी भी आदिवासी को उनके घर (जैसे राजीव नगर और न्यू चिंगेन) से विस्थापित नहीं किया जाएगा। सरकार का दावा है कि प्रोजेक्ट में ली जा रही आदिवासी जमीन के बदले 76.98 वर्ग किमी नई जमीन को ट्राइबल रिजर्व घोषित किया जा रहा है, जिससे आदिवासी इलाके में कुल 3.91 वर्ग किमी की वृद्धि होगी।

सवाल: क्या इस क्षेत्र में भूकंप और सुनामी का भी कोई खतरा है?
जवाब: हां, भूवैज्ञानिक इस खतरे को लेकर बहुत चिंतित हैं। यह क्षेत्र 'अंडमान-सुमात्रा सबडक्शन जोन' पर स्थित है और सबसे खतरनाक भूकंपीय 'जोन पांच' में आता है। साल 2004 में आई भयानक सुनामी में इसी द्वीप का दक्षिणी हिस्सा 15 फीट तक नीचे धंस गया था। देश के शीर्ष भूवैज्ञानिकों का कहना है कि इतने सक्रिय फॉल्टलाइन के ऊपर बिना विशेष अध्ययन के 81,000 करोड़ का निवेश एक 'टाइम बम' जैसा है। वहीं, मंत्रालय के अधिकारियों ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में लिया गया एक कैलकुलेटेड रिस्कबताया है।

सवाल: क्या इस प्रोजेक्ट को कानूनी मंजूरी मिल चुकी है?
जवाब: जी हां। पर्यावरणविदों ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में इस प्रोजेक्ट और इसकी क्लियरेंस को चुनौती दी थी। लेकिन फरवरी 2026 में एनजीटी की विशेष पीठ ने सरकार की पर्यावरण मंजूरी को बरकरार रखा। ट्रिब्यूनल ने अपने फैसले में कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक विकास को पर्यावरण के साथ संतुलित करना आवश्यक है, और सरकार ने प्रकृति व आदिवासियों की रक्षा के लिए पर्याप्त शर्तें लागू की हैं। 

सवाल: क्या 81,000 करोड़ रुपये का यह भारी-भरकम निवेश आर्थिक रूप से व्यावहारिक है?
जवाब: अर्थशास्त्रियों और आलोचकों ने इस प्रोजेक्ट की लागत और भविष्य के मुनाफे पर गंभीर सवाल उठाए हैं। जब 2020 में इस परियोजना की रूपरेखा तैयार की गई थी, तब इसकी अनुमानित लागत केवल 8,000 करोड़ रुपये (लगभग 1 बिलियन डॉलर) थी। लेकिन अब यह लागत नाटकीय रूप से बढ़कर 72,000 से 81,800 करोड़ रुपये के बीच पहुंच गई है।
 
विशेषज्ञों का तर्क है कि मुख्य भूमि से बहुत दूर होने के कारण यहां निर्माण सामग्री (रेत, सीमेंट, मशीनरी) ले जाने की लॉजिस्टिक्स लागत तीन गुना अधिक होगी। इसके अलावा, वैश्विक जहाजों को सिंगापुर या कोलंबो से खींचने के लिए भारत इस नए बंदरगाह पर अधिक 'हैंडलिंग शुल्क' नहीं वसूल सकता। ऐसे में, शुरुआती वर्षों में इस ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल के भारी घाटे में चलने की आशंका है, जिसका सीधा वित्तीय बोझ भारतीय करदाताओं पर पड़ सकता है।



सवाल: चीन की 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' नीति और म्यांमार के 'कोको द्वीप' से इस प्रोजेक्ट का क्या कनेक्शन है?
जवाब:
भारत की इस आक्रामक सामरिक नीति के पीछे चीन की बढ़ती घेराबंदी मुख्य कारण है। चीन लंबे समय से भारत को घेरने के लिए 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' रणनीति पर काम कर रहा है, जिसके तहत वह श्रीलंका और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों में बंदरगाह बना रहा है। 

भारत के लिए सबसे तत्काल खतरा म्यांमार का 'ग्रेट कोको द्वीप' है, जो भारत के उत्तरी लैंडफॉल द्वीप से मात्र 35 किमी दूर है। सैटेलाइट इमेजरी से यह खुलासा हुआ है कि चीन की मदद से म्यांमार ने वहां अपना सैन्यीकरण तेज कर दिया है, रनवे को 2,300 मीटर तक बढ़ा लिया है और नए रडार स्टेशन स्थापित कर लिए हैं। इससे चीन बंगाल की खाड़ी में भारतीय नौसेना पर आसानी से नजर रख सकता है। इसी खतरे को बेअसर करने के लिए ग्रेट निकोबार को भारत के 'रिवर्स पर्ल' के रूप में विकसित किया जा रहा है, ताकि अंडमान सागर और 'मलक्का जलडमरूमध्य' के पास भारतीय नौसेना की मजबूत उपस्थिति दर्ज की जा सके।

सवाल: क्या प्रोजेक्ट के लिए आदिवासियों से कानूनी सहमति ली गई है और इसे लेकर क्या विवाद है?
जवाब:
यह कानूनी तौर पर इस प्रोजेक्ट का सबसे उलझा हुआ पहलू है। 'वन अधिकार अधिनियम, 2006' (एफआरए) के तहत किसी भी आदिवासी भूमि को विकास कार्यों के लिए इस्तेमाल करने से पहले स्थानीय समुदायों की 'स्वतंत्र, पूर्व और सूचित सहमति' (एफपीआईसी) लेना अनिवार्य है। 

सरकार का पक्ष है कि 73.07 वर्ग किमी आदिवासी रिजर्व भूमि लेने के बदले में 76.98 वर्ग किमी अतिरिक्त भूमि को नए रिजर्व के रूप में अधिसूचित किया गया है, और किसी भी वैधानिक प्रक्रिया का उल्लंघन नहीं हुआ है। हालांकि, निकोबारी समुदाय की जनजातीय परिषद के अध्यक्ष का आरोप है कि उनसे दबाव में अनापत्ति प्रमाण पत्र पर हस्ताक्षर करवाए गए थे, जिसे वास्तुकला और भूमि विस्तार की हकीकत जानने के बाद उन्होंने आधिकारिक तौर पर वापस ले लिया। निकोबारी समुदाय का दर्द यह है कि 2004 की सुनामी के बाद वे जिन पैतृक तटीय जमीनों को छोड़कर आए थे, वे अब हमेशा के लिए इस परियोजना में अधिग्रहित हो जाएंगी।



सवाल: पर्यावरण को होने वाले नुकसान की भरपाई और वन्यजीवों को बचाने के लिए सरकार क्या उपाय कर रही है?
जवाब:
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) ने 42 सख्त अनुपालन शर्तों के साथ इस परियोजना को मंजूरी दी है। सरकार का दावा है कि जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ZSI) और वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (डब्ल्यूआईआई) जैसे संस्थानों की सलाह पर एक मजबूत 'पर्यावरण प्रबंधन योजना' (ईएमपी) तैयार की गई है। 

प्रोजेक्ट की निगरानी के लिए तीन स्वतंत्र समितियां बनाई गई हैं, जो मुख्य रूप से प्रदूषण नियंत्रण, जैव विविधता संरक्षण और शोम्पेन व निकोबारी समुदायों के कल्याण की देखरेख करेंगी। इसके अलावा, मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक ओवरआर्चिंग कमिटी का गठन किया गया है ताकि सभी संस्थाओं के बीच तालमेल सुनिश्चित हो सके। हालांकि, वन्यजीव विशेषज्ञों ने इन शमन उपायों (जैसे कछुओं के घोंसलों को दूसरी जगह शिफ्ट करना और रात में निर्माण रोकना) को नाकाफी और अवैज्ञानिक करार दिया है।

कुल मिलाकर ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट देश के सामने 'भू-राजनीतिक जरूरत' और 'पर्यावरण संरक्षण' के बीच का सबसे बड़ा द्वंद्व है। एक तरफ चीन की घेराबंदी का जवाब देने और मजबूत अर्थव्यवस्था के लिए यह प्रोजेक्ट अपरिहार्य लगता है। वहीं दूसरी तरफ, इसके एवज में सदियों पुरानी आदिवासी विरासत, लाखों पेड़ और लेदरबैक कछुओं के अस्तित्व की भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार जमीन पर विकास और विनाश के बीच का यह संतुलन कैसे साध पाती है।

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