Trade: ईयू से शुल्क छूट हटने का भारत पर न के बराबर असर, सरकार बोली- केवल 2.66% निर्यात होगा प्रभावित
Trade: वाणिज्य मंत्रालय ने कहा है ईयू की ओर से जीएसपी लाभ निलंबित करने से भारत के केवल 2.66% निर्यात पर असर पड़ेगा। टेक्सटाइल और केमिकल जैसे सेक्टर प्रभावित होंगे, जबकि कृषि क्षेत्र सुरक्षित रहेगा। आइए इस बारे में विस्तार से जानें।
विस्तार
यूरोपीय संघ (ईयू) की ओर से भारत के लिए व्यापार वरीयता योजना के तहत मिलने वाले लाभों को निलंबित करने के फैसले पर सरकार ने प्रतिक्रिया दी है। वाणिज्य मंत्रालय ने शुक्रवार को साफ किया कि इसका भारत पर बहुत सीमित प्रभाव पड़ेगा। मंत्रालय के अनुसार, इस कदम से यूरोपीय संघ को होने वाले भारत के कुल निर्यात का केवल 2.66 प्रतिशत हिस्सा ही प्रभावित होगा।
क्या है मामला?
यूरोपीय संघ की 'जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेस' (जीएसपी) एक ऐसी योजना है, जिसके तहत विकासशील देशों से आने वाले सामानों पर कम या शून्य सीमा शुल्क (कस्टम ड्यूटी) लगाया जाता है. यूरोपीय आयोग ने नए नियम अपनाए हैं, जिसके तहत भारत सहित कुछ देशों के लिए विशिष्ट टैरिफ लाभों को निलंबित कर दिया गया है। यह नियम 1 जनवरी 2026 से 31 दिसंबर 2028 तक लागू रहेगा।
किन सेक्टरों पर पड़ेगा असर?
मंत्रालय ने बताया कि भारत के निर्यात की बढ़ती प्रतिस्पर्धात्मकता के कारण उसे कुछ श्रेणियों से 'ग्रेजुएट' (बाहर) कर दिया गया है। निलंबन के दायरे में 13 विशिष्ट GSP खंड शामिल हैं, जिनमें प्रमुख हैं:
- खनिज उत्पाद
- रसायन और प्लास्टिक
- कपड़ा
- सिरेमिक उत्पाद, कांच और कांच के बने पदार्थ
- मोती और कीमती धातुएं
- लोहा और इस्पात
हालांकि, कृषि क्षेत्र को इस सूची से बाहर नहीं किया गया है, इसलिए कृषि उत्पादों को शुल्क लाभ मिलता रहेगा। गैर-कृषि क्षेत्र में, केवल चमड़े को फिर से बहाल किया गया है, यानी इस पर लाभ मिलेगा।
2023 के आंकड़ों के अनुसार, भारत से ईयू का कुल आयात लगभग 62.2 बिलियन यूरो था। इसमें से 12.9 बिलियन यूरो का व्यापार GSP के तहत लाभ का पात्र था। नए नियमों के तहत:
- लगभग 1.66 बिलियन यूरो का व्यापार GSP व्यवस्था से बाहर हो जाएगा।
- इसके बावजूद, 11.24 बिलियन यूरो का व्यापार अभी भी GSP लाभ के लिए पात्र रहेगा।
- इस प्रकार, नए नियम का असर भारत के कुल निर्यात के 2.66 प्रतिशत हिस्से तक ही सीमित है।
मंत्रालय ने साफ किया है कि यह फैसला देश के निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मकता पर आधारित है, जिसकी समय-समय पर EU की ओर से समीक्षा की जाती है। जैसे-जैसे भारत का निर्यात मजबूत हो रहा है, वह रियायती दरों की सूची से स्वाभाविक रूप से बाहर आ रहा है।