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Monsoon Rain: मानसून की बारिश से मिली राहत, जानिए क्या कृषि क्षेत्र पर संकट के बादल अब भी मंडरा रहे हैं

Fri, 10 Jul 2026 08:55 PM IST
कुमार विवेक बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: कुमार विवेक Updated Fri, 10 Jul 2026 08:55 PM IST
सार

क्रिसिल की रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई की बारिश से मानसून की चिंताएं कम हुई हैं, लेकिन असमान वर्षा, बुवाई में देरी और अल नीनो के कारण कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर जोखिम बना हुआ है। खरीफ की बुवाई 21 फीसदी कम है, और कर्नाटक, बिहार, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में कृषि तनाव अधिक है।

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Monsoon Rains Bring Relief, But Agricultural Sector Still Faces Risks says Crisil
मानसून - फोटो : PTI

विस्तार

नई दिल्ली। जुलाई की शुरुआत में हुई बारिश से इस साल के दक्षिण-पश्चिम मानसून को लेकर तत्काल चिंताएं कम हुई हैं। हालांकि, कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर जोखिम अभी भी बना हुआ है। क्रिसिल की क्विकोनॉमिक्स रिपोर्ट के अनुसार, असमान बारिश, बुवाई में देरी और अल नीनो की स्थिति के कारण हालात अनिश्चित बने हुए हैं। रिपोर्ट शुक्रवार को जारी की गई।

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जून में बारिश की भारी कमी के बाद, हाल ही में हुई भारी बारिश से राहत मिली है। लेकिन, रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि इस सुधार को खरीफ सीजन के लिए पूरी तरह से सुरक्षित नहीं मानना चाहिए। भारत मौसम विज्ञान विभाग ने जुलाई में सामान्य से 6 फीसदी कम बारिश का अनुमान लगाया है। इसका मतलब है कि जुलाई का दूसरा पखवाड़ा काफी सूखा रह सकता है।

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क्या सिर्फ मानसून की प्रगति ही पर्याप्त है?

मानसून की प्रगति के अलावा, चिंता इस बात की भी है कि प्रमुख कृषि क्षेत्रों में बारिश पर्याप्त और अच्छी तरह से वितरित है या नहीं। दक्षिण-पश्चिम मानसून ने 35 दिनों में पूरे देश को कवर कर लिया। यह इसके दीर्घकालिक औसत के अनुरूप है। हालांकि, क्रिसिल ने कहा कि केवल मानसून की प्रगति ही यह बताने के लिए विश्वसनीय संकेतक नहीं है कि सीजन कैसा रहेगा। अधिक चिंता बारिश की मात्रा और वितरण को लेकर है। कमी और अधिकता के बीच का उतार-चढ़ाव कृषि के लिए उतना ही विघटनकारी हो सकता है जितना कि कमजोर मानसून। यह बुवाई के निर्णयों, फसल के स्वास्थ्य और अंततः ग्रामीण आय को प्रभावित करता है।

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बुवाई पर क्या असर पड़ा है?

असमान बारिश के पैटर्न ने खरीफ की बुवाई को पहले ही प्रभावित किया है। 5 जुलाई तक, कुल बुवाई पिछले साल की तुलना में करीब 21 फीसदी कम थी। इसमें तिलहन, कपास, दलहन, मोटे अनाज और अन्य अनाजों में गिरावट देखी गई। जून में सूखे के बाद, पिछले कुछ हफ्तों में बारिश में काफी सुधार हुआ है। 8 जुलाई तक, अखिल भारतीय बारिश की कमी 40 फीसदी से घटकर 15 फीसदी हो गई। हालांकि, जून की बारिश की कमी 2014 के समान थी। वह भी एक मजबूत अल नीनो वर्ष था, जब पूरे सीजन में बारिश की कमी बनी रही और कृषि उत्पादन प्रभावित हुआ।

किन राज्यों में कृषि खेती के लिहाज से परेशानी अधिक है?

क्रिसिल ने अपने डेफिशिएंट रेनफॉल इंपैक्ट पैरामीटर का उपयोग किया है। यह बारिश की कमी को सिंचाई कवरेज के साथ जोड़कर फसल और राज्य-स्तर की भेद्यता का आकलन करता है। इसके अनुसार, देश के कई हिस्सों में कृषि तनाव बढ़ा हुआ है। वर्तमान डीआरआईपी स्कोर कर्नाटक, बिहार, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में महत्वपूर्ण तनाव दर्शाते हैं। हरियाणा में हल्का तनाव स्पष्ट है। तुअर और मोटे अनाजों पर सबसे अधिक दबाव है। अच्छी तरह से सिंचित गन्ना और अपेक्षाकृत लचीले सोयाबीन और मूंगफली कम प्रभावित हुए हैं। क्रिसिल ने कहा कि अल नीनो की स्थिति बारिश की कमी और अत्यधिक वर्षा दोनों ला सकती है।

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