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एनपीए-निरीक्षण रिपोर्ट सार्वजनिक होंगी या नहीं?: CIC पहुंचे चार बड़े बैंक, RBI ने कहा- जानकारी साझा करने योग्य
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: निर्मल कांत
Updated Sun, 11 Jan 2026 04:42 PM IST
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सार
आरबीआई ने एनपीए, जुर्माने और बैंक निरीक्षण रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की तैयारी की है। लेकिन चार प्रमुख बैंक इसका विरोध कर रहे हैं। उन्होंने केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) में अपील दायर की है। यह मामला बैंकिंग पारदर्शिता, जमाकर्ताओं के अधिकार और नियामक जवाबदेही पर असर डाल सकता है। सीआईसी ने अब इसे बड़ी बेंच के पास भेजा है। पढ़िए पूरा मामला क्या है-
केंद्रीय सूचना आयोग
- फोटो : cic.gov.in
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विस्तार
चार बड़े बैंकों ने बैंक ऑफ बड़ौदा, आरबीएल बैंक, यस बैंक और भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) ने केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) का रुख किया है। इन बैंकों ने कर्ज न चुकाने वालों की सूची, एनपीए, जुर्माने और निरीक्षण रिपोर्ट जैसी जानकारी सार्वजनिक किए जाने पर आपत्ति जताई है। वहीं, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने कहा कि यह जानकारी आरटीआई कानून के तहत दी जा सकती है।
आरटीआई आवेदकों ने क्या जानकारी मांगी?
आरटीआई आवेदक धीरज मिश्रा, वथिराज, गिरीश मित्तल और राधा रमण तिवारी ने आरबीआई में अलग-अलग आवेदन दायर किए थे। इनमें यस बैंक के शीर्ष 100 एनपीए, उसके जानबूझकर कर्ज न चुकाने वालों की सूची, एसबीआई और आरबीएल की निरीक्षण रिपोर्ट और बैंक ऑफ बड़ौदा पर लगाए गए 4.34 करोड़ रुपये के जुर्माने से जुड़े दस्तावेज मांगे गए थे।
ये भी पढ़ें: FY26 के पहले 9 महीनों में 311 IPO के जरिए कंपनियों ने जुटाए ₹1.7 लाख करोड़, जानिए क्या बोले सेबी प्रमुख
आरबीआई का क्या कहना है?
जब आरबीआई ने यह राय दी कि मांगी गई जानकारी आरटीआई कानून के तहत दी जा सकती है, तो इन बैंकों ने इसके खिलाफ केंद्रीय सूचना आयोग में अपील दायर की। सूचना आयुक्त खुशवंत सिंह सेठी ने बैंकों की ओर से उठाए गए मुद्दों को देखते हुए मामले को सीआईसी की बड़ी पीठ के पास भेज दिया। उन्होंने कहा कि इस तरह के मामलों की सुनवाई पहले भी दो सदस्यीय पीठ कर चुकी है। सेठी ने कहा कि सभी मामलों को अंतिम फैसले के लिए मुख्य सूचना आयुक्त के पास भेजा गया है। तब तक जानकारी के खुलासे पर रोक रहेगी।
इन मामलों के फैसले का बैंकिंग क्षेत्र में पारदर्शिता, जमाकर्ताओं के अधिकार और नियामकीय जवाबदेही पर व्यापक असर पड़ने की संभावना है, खासकर ऐसे समय में जब एनपीए, जुर्माने और निगरानी में चूक को लेकर सार्वजनिक जांच तेज है।
आरबीआई ने आरटीआई कानून की धारा 11 के तहत जानकारी देने से पहले बैंकों से उनकी राय भी मांगी थी। इस प्रावधान के तहत जिस पक्ष से जुड़ी जानकारी मांगी जाती है, उससे उसकी सहमति या आपत्ति ली जाती है। बैंकों ने आरबीआई के इस रुख को सीआईसी में चुनौती दी है। आरबीआई ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के जयंतीलाल एन. मिस्त्री मामले के फैसले का हवाला दिया है।
बैंक क्यों विरोध कर रहे हैं?
बैंकों का तर्क है कि नियामकीय जानकारी सार्वजनिक होने से उनके व्यावसायिक हितों को नुकसान पहुंच सकता है। ऐसे ही एक मामले में बैंक ऑफ बड़ौदा ने आरबीआई के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें 4.34 करोड़ रुपये के जुर्माने से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक करने की बात कही गई थी। यह जुर्माना कानूनी जांज में सामने आई खामियों के आधार पर लगाया गया था।
ये भी पढ़ें: बीएसएफ इंस्पेक्टरों को 5400 'ग्रेड पे' का सपना टूटा, फोर्स हेडक्वार्टर के स्पीकिंग ऑर्डर में ये कैसा तर्क
आरटीआई आवेदक राधा रमण तिवारी ने 2021 की वैधानिक निरीक्षण रिपोर्ट में दर्ज गैर-अनुपालन के मामलों, कारण बताओ नोटिस और जुर्माने की वसूली से जुड़े रिकॉर्ड मांगे थे। बैंक ऑफ बड़ौदा ने इन जानकारियों को गोपनीय और संवेदनशील बताते हुए खुलासा करने का विरोध किया, लेकिन आरबीआई ने इस दलील को खारिज कर दिया। आरबीआई के केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी ने कहा कि यह कहना सही नहीं है कि जानकारी सार्वजनिक होने से बैंक के कारोबार, उत्पादों की बाजार स्थिति या प्रतिस्पर्धा पर नकारात्मक असर पड़ेगा।
आरबीआई ने यह भी स्पष्ट किया कि आरटीआई कानून की धारा 8(1)(डी), (ई) और (जे) के तहत जो जानकारी छूट के दायरे में आती है, उसे पहले ही अलग कर दिया गया है। इसलिए बैंक ऑफ बड़ौदा की आपत्तियां टिकाऊ नहीं हैं। इसके बाद बैंक ऑफ बड़ौदा ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और तर्क दिया कि जयंतीलाल एन. मिस्त्री के फैसले पर पुनर्विचार किया जा सकता है।
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आरटीआई आवेदकों ने क्या जानकारी मांगी?
आरटीआई आवेदक धीरज मिश्रा, वथिराज, गिरीश मित्तल और राधा रमण तिवारी ने आरबीआई में अलग-अलग आवेदन दायर किए थे। इनमें यस बैंक के शीर्ष 100 एनपीए, उसके जानबूझकर कर्ज न चुकाने वालों की सूची, एसबीआई और आरबीएल की निरीक्षण रिपोर्ट और बैंक ऑफ बड़ौदा पर लगाए गए 4.34 करोड़ रुपये के जुर्माने से जुड़े दस्तावेज मांगे गए थे।
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आरबीआई का क्या कहना है?
जब आरबीआई ने यह राय दी कि मांगी गई जानकारी आरटीआई कानून के तहत दी जा सकती है, तो इन बैंकों ने इसके खिलाफ केंद्रीय सूचना आयोग में अपील दायर की। सूचना आयुक्त खुशवंत सिंह सेठी ने बैंकों की ओर से उठाए गए मुद्दों को देखते हुए मामले को सीआईसी की बड़ी पीठ के पास भेज दिया। उन्होंने कहा कि इस तरह के मामलों की सुनवाई पहले भी दो सदस्यीय पीठ कर चुकी है। सेठी ने कहा कि सभी मामलों को अंतिम फैसले के लिए मुख्य सूचना आयुक्त के पास भेजा गया है। तब तक जानकारी के खुलासे पर रोक रहेगी।
इन मामलों के फैसले का बैंकिंग क्षेत्र में पारदर्शिता, जमाकर्ताओं के अधिकार और नियामकीय जवाबदेही पर व्यापक असर पड़ने की संभावना है, खासकर ऐसे समय में जब एनपीए, जुर्माने और निगरानी में चूक को लेकर सार्वजनिक जांच तेज है।
आरबीआई ने आरटीआई कानून की धारा 11 के तहत जानकारी देने से पहले बैंकों से उनकी राय भी मांगी थी। इस प्रावधान के तहत जिस पक्ष से जुड़ी जानकारी मांगी जाती है, उससे उसकी सहमति या आपत्ति ली जाती है। बैंकों ने आरबीआई के इस रुख को सीआईसी में चुनौती दी है। आरबीआई ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के जयंतीलाल एन. मिस्त्री मामले के फैसले का हवाला दिया है।
बैंक क्यों विरोध कर रहे हैं?
बैंकों का तर्क है कि नियामकीय जानकारी सार्वजनिक होने से उनके व्यावसायिक हितों को नुकसान पहुंच सकता है। ऐसे ही एक मामले में बैंक ऑफ बड़ौदा ने आरबीआई के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें 4.34 करोड़ रुपये के जुर्माने से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक करने की बात कही गई थी। यह जुर्माना कानूनी जांज में सामने आई खामियों के आधार पर लगाया गया था।
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आरबीआई ने यह भी स्पष्ट किया कि आरटीआई कानून की धारा 8(1)(डी), (ई) और (जे) के तहत जो जानकारी छूट के दायरे में आती है, उसे पहले ही अलग कर दिया गया है। इसलिए बैंक ऑफ बड़ौदा की आपत्तियां टिकाऊ नहीं हैं। इसके बाद बैंक ऑफ बड़ौदा ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और तर्क दिया कि जयंतीलाल एन. मिस्त्री के फैसले पर पुनर्विचार किया जा सकता है।