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आरबीआई की रिपोर्ट: महंगे प्रीमियम के चलते बीमा पॉलिसी सरेंडर कर रहे लोग, मैच्योरिटी तक सिर्फ 35% पॉलिसीधारक

अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली। Published by: निर्मल कांत Updated Wed, 21 Jan 2026 05:17 AM IST
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सार

महंगे प्रीमियम और गलत वादों के साथ बेची जा रही बीमा पॉलिसी से लोग तेजी से भरोसा खो रहे हैं और परिपक्वता से पहले ही पॉलिसी सरेंडर कर रहे हैं। आरबीआई की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट बताती है कि बीमा कंपनियों के कुल भुगतान में बड़ा हिस्सा अब मैच्योरिटी या मृत्यु दावों से नहीं, बल्कि समय से पहले पॉलिसी बंद करने से आ रहा है। सवाल यह है कि जिस बीमा को सुरक्षा का जरिया माना जाता था, वह आम पॉलिसीधारकों के लिए घाटे का सौदा क्यों बनता जा रहा है? पढ़िए रिपोर्ट-

RBI report: People surrendering insurance policies due to high premiums, only 35% policyholders reach maturity
भारतीय रिजर्व बैंक - फोटो : एएनआई (फाइल)
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विस्तार
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प्रीमियम महंगा होने और पॉलिसियों को गलत वादे के साथ बेचने से पॉलिसीधारक तेजी से परिपक्वता से पहले ही बीमा पॉलिसी सरेंडर कर रहे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट के मुताबिक, कभी-कभी मिलने वाला रिटर्न वादे के मुताबिक नहीं होता है। कई बार और भी कारणों से पॉलिसी फायदेमंद नहीं लगती है। इस कारण से पॉलिसी के सरेंडर में तेजी आ रही है।
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भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (इरडाई) कई वर्षों से इस समस्या पर ध्यान दिला रहा है। इसकी रिपोर्ट इस बात को दोहराती है कि जीवन बीमा क्षेत्र में गलत तरीके से बेची जाने वाली पॉलिसी बड़ी चिंता का विषय बनी हुई है। इसमें कहा गया है कि बीमा उत्पादों को नियमों, शर्तों या उपयुक्तता के बारे में उचित जानकारी दिए बिना बेचा जा रहा है। लेकिन गलत तरीके से बेची जाने वाली पॉलिसी से परे नए नियामक आंकड़े गहरी, अधिक संरचनात्मक समस्या की ओर इशारा करते हैं।
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वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट में कुछ चिंताजनक जानकारियां और आंकड़े सामने आए हैं। ये दर्शाते हैं कि भारत की बीमा प्रणाली कैसे काम करती है और वास्तव में इससे किसे लाभ मिलता है। जीवन बीमा भुगतान में तेज वृद्धि हो रही है। पहली नजर में यह एक स्वस्थ बीमा क्षेत्र का संकेत प्रतीत हो सकता है जो अपने वादों को पूरा कर रहा है। हालांकि, सच्चाई कुछ अधिक चिंताजनक है। बीमा कंपनियों की ओर से भुगतान किए गए कुल लाभ वित्त वर्ष 2020-21 में लगभग 4 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में 6.3 लाख करोड़ रुपये हो गए। हालांकि, इन भुगतानों का एक बढ़ता हुआ हिस्सा बीमा पॉलिसी परिपक्वता से नहीं, बल्कि समय से पहले पॉलिसी बंद करने, सरेंडर करने और पैसे की निकासी से आ रहा है। इसका मतलब यह है कि अधिक लोग समय से पहले पॉलिसी को नुकसान पर सरेंडर कर रहे हैं।

37% लोगों ने समय से पहले किया सरेंडर
आंकड़ों से पता चलता है कि बीमा कंपनियों ने 37 फीसदी का भुगतान (पेआउट) समय से पहले सरेंडर और निकासी वाली पॉलिसी के एवज में किया है। मृत्यु दावों के एवज में केवल 7.5 फीसदी पेआउट दिया गया है। सिर्फ 35 फीसदी पॉलिसीधारक ऐसे हैं जो मैच्योरिटी तक पॉलिसी को बनाए रखते हैं।

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बैंक एजेंटों के जाल में फंसे पॉलिसीधारक
कमीशन को बढ़ाने वाले बैंकों और एजेंटों के जाल में पॉलिसीधारक फंस रहे हैं। हालिया आंकड़े इस समस्या के मजबूत प्रमाण देते हैं। खासकर निजी क्षेत्र की कंपनियों में, चाहे वे जीवन बीमा हों या गैर-जीवन बीमा। पारंपरिक जीवन बीमा उत्पाद एक जाल की तरह बना है। बीमा करने वाले एजेंट ग्राहकों को पहले वर्ष में फंसाते हैं और फिर आगे बढ़ जाते हैं। उच्च सरेंडर दरें आकस्मिक नहीं हैं। ये कमीशन प्रधान वितरण मॉडल से गहराई से जुड़ी हुई हैं।


 
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