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जंग का तिहरा आर्थिक प्रहार: कच्चे तेल में आग, रुपया पस्त और बाजार धड़ाम; पांच आसान सवालों में समझें पूरा संकट

बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Kumar Vivek Updated Mon, 09 Mar 2026 06:54 PM IST
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सार

पश्चिम एशिया में जारी लड़ाई के कारण कच्चे तेल में आग लग गई है। रुपया 92.33 के ऐतिहासिक निचले स्तर पर चला गया है और शेयर बाजार में भारी बिकवाली दर्ज की गई है। आइए पांच आसान सवालों में समझते हैं अर्थव्यवस्था पर इस तिहरे प्रहार का पूरा असर।

Share Market Crash Crude Oil Price Rupee Record Low Indian Economy Sensex Nifty Share Market Fall Analysis
ईरान युद्ध और अर्थव्यवस्था पर असर - फोटो : amarujala.com
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विस्तार

पश्चिम एशिया में ईरान से जुड़े युद्ध और बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने भारत समेत दुनियाभर के वित्तीय बाजारों को बुरी तरह झकझोर दिया है और अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। सोमवार को वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी के कारण भारतीय इक्विटी और मुद्रा (करेंसी) बाजार में चौतरफा बिकवाली दिखी। इस संकट ने निवेशकों को करीब 12 लाख करोड़ रुपये का चूना लगा दिया। अर्थशास्त्रियों के अनुसार, भारत इस समय एक 'तिहरे प्रहार'- महंगा कच्चा तेल, गिरते रुपये और शेयर बाजार में गिरावट का सामना कर रहा है।

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आइए समझते हैं कि यह संकट क्यों पैदा हुआ है और इसका आपकी जेब व देश की अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ सकता है।

शेयर बाजार में अचानक इतनी बड़ी गिरावट का मुख्य कारण क्या है?

पश्चिम एशिया में ईरान-इस्राइल-अमेरिका युद्ध के कारण कच्चे तेल की सप्लाई बाधित होने का भारी डर पैदा हो गया है। इस दहशत के कारण सोमवार को सेंसेक्स 2,400 अंकों का गोता लगा गया, जबकि निफ्टी करीब 3% टूटकर 24,028.05 के स्तर पर आ गया। भू-राजनीतिक अनिश्चितता के बीच विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) तेजी से अपना पैसा निकालकर सुरक्षित विकल्पों (जैसे डॉलर) का रुख कर रहे हैं। इससे बाजार में बिकवाली की सुनामी आ गई है। हालांकि, बाजार बंद होते समय सेंसेक्स और निफ्टी अपने निचले स्तरों से संभलकर बंद हुए।

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कच्चे तेल की कीमतों में उछाल से भारत को सबसे ज्यादा खतरा क्यों है?

भारत अपनी जरूरत का 89% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। युद्ध शुरू होने के बाद से ब्रेंट क्रूड 50% से अधिक उछलकर 117 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है। भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता 'होर्मुज जलडमरूमध्य' है, जहां से हमारा रोजाना 26 लाख बैरल तेल गुजरता है। कतर के ऊर्जा मंत्री ने चेतावनी दी है कि अगर खाड़ी देशों के ऊर्जा निर्यात पर असर पड़ा, तो तेल की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं।

रुपये के 92.33 के ऐतिहासिक निचले स्तर पर गिरने के क्या मायने हैं?

तेल महंगा होने से भारतीय आयातकों की ओर से डॉलर की भारी मांग पैदा हुई है। रिजर्व बैंक के दखल के बावजूद भारी दबाव के चलते रुपया 92.33 प्रति डॉलर के नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर लुढ़क गया। रुपये की इस कमजोरी से न सिर्फ हमारा आयात बिल बढ़ेगा, बल्कि चालू खाता घाटा भी बढ़ेगा।

क्या इस संकट से कॉरपोरेट कंपनियों और महंगाई पर सीधा असर पड़ेगा?

जी हां। कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से लॉजिस्टिक्स, ट्रांसपोर्टेशन, विमानन और मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टर्स की लागत बढ़ जाएगी। इसका सीधा असर महंगाई पर होगा, क्योंकि माल ढुलाई महंगी होने से आम जरूरत की चीजें महंगी हो जाएंगी। हालांकि वित्त मंत्री ने सोमवार को लोकसभा में देश को भरोसा दिया है कि क्रूड ऑयल की कीमतें भरते से तत्कालिक रूप से देश में महंगाई बढ़ने की आशंका नहीं है। दूसरी ओर, विश्लेषक निफ्टी की कंपनियों की आय में 12% वृद्धि की उम्मीद कर रहे थे, उनका मानना है कि अब कंपनियों के मार्जिन सिकुड़ेंगे और अर्निंग रिकवरी शिथिल पड़ सकती है।

क्या भारतीय अर्थव्यवस्था इस भारी झटके को सहने के लिए तैयार है?

राहत की बात यह है कि भारत इस बार पिछले संकटों की तुलना में काफी मजबूत स्थिति में है। सरकार के पास कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का 25 करोड़ (250 मिलियन) बैरल का बफर रिजर्व मौजूद है, जो सात से आठ हफ्ते की जरूरत पूरी कर सकता है। इसके अतिरिक्त, भारत ने अब 27 के मुकाबले करीब 40 देशों से तेल मंगाना शुरू कर दिया है। खाड़ी देशों के अलावा रूस, पश्चिम अफ्रीका, अमेरिका और मध्य एशियाई देशों से भी आपूर्ति हासिल हो रही है। हमारा 60% तेल अब वैकल्पिक रास्तों से आ रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार और मजबूत आर्थिक बुनियादी ढांचे (वित्तीय वर्ष की पहली छमाही में चालू खाता घाटा मात्र 0.8%) से भी अर्थव्यवस्था को एक सुरक्षा कवच मिला हुआ है।

अब आगे क्या हो सकता है?

फिलहाल भारत के मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार और विविध ऊर्जा स्रोतों ने अर्थव्यवस्था को एक ढाल प्रदान की है। लेकिन, अगर मध्य-पूर्व का यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो महंगाई, कॉरपोरेट आय और रुपये के मोर्चे पर भारतीय अर्थव्यवस्था की कड़ी परीक्षा होगी।

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