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पीजीआई का अहम शोध: टीका लगने के दाैरान मां करवाती रहे स्तनपान तो नवजात को दर्द से मिलती है निजात
वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Mon, 16 Feb 2026 08:24 AM IST
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सार
अध्ययन में पाया गया कि वेनिपंक्चर के दौरान स्तनपान कराने से नवजात के दर्द के स्कोर में सबसे अधिक कमी आती है। इसके बाद नॉन-न्यूट्रिटिव सकिंग (जैसे पैसिफायर) को दूसरा प्रभावी उपाय पाया गया।
ब्रेस्ट फीडिंग
- फोटो : Adobe Stock
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विस्तार
डिलीवरी के कुछ ही घंटों बाद, जब नर्स नवजात के नन्हे हाथ में सुई लगाने की तैयारी करती है, तो कमरे का माहौल अचानक बदल जाता है।
शिशु की हल्की-सी सिसकी भी मां के दिल की धड़कन बढ़ा देती है। अब इसी दर्द को कम करने को लेकर आई पीजीआई की एक बड़ी वैज्ञानिक स्टडी उम्मीद की ठोस वजह देती है। जिसमें ये परिणाम सामने आया है कि सुई लगाते समय स्तनपान ही नवजात के लिए सबसे प्रभावी और सुरक्षित दर्द निवारक है।
इस महत्वपूर्ण अध्ययन में पीजीआई के साथ ही ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, नई दिल्ली (एम्स, नई दिल्ली), जवाहरलाल इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्टग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (जिपमेर, पुडुचेरी) के विशेषज्ञ भी शामिल रहे। ये शोध अंतरराष्ट्रीय जर्नल जर्नल ऑफ वैस्कुलर एक्सेस में प्रकाशित है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, यह न सिर्फ असरदार बल्कि पूरी तरह सुरक्षित और हर स्तर के अस्पताल में लागू किया जा सकने वाला तरीका है। यानी कई बार सबसे बड़ी राहत किसी महंगी दवा में नहीं, बल्कि मां की गोद और उसके स्पर्श में छिपी होती है।
इस शोध में शामिल पीजीआई के एडवांस पीडियाट्रिक सेंटर के जोगिन्दर सिंह ने बताया कि जो बच्चे प्रीमेच्योर जन्म लेते हैं उन्हें कई तरह की जांच प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। उन बच्चों में सामान्य बच्चों के तुलना में ब्रिक या इंजेक्ट करने पर ज्यादा दर्द होता है। उस दर्द को कम करने के लिए दो उपाय होते हैं। जिसमें फॉर्मेलॉजिकल यानी कि दवावों का और नॉन फार्मोकोलॉजिकल मेजर शामिल है। ज्यादातर नॉन फार्मोकोलॉजिकल मेजर को प्रधानता दी जाती है।
इस दौरान शोध में शामिल बच्चों को जब इंजेक्शन देने से पहले दशमलव दो या दशमलव 3 एमएल दूध मुंह में दिया गया तो उन्हें दर्द में राहत मिली। डॉक्टर ने बताया कि दूध मीठा होता है जो ब्रेन को रिलेक्स का सिग्नल देता है और इससे दर्द कम होता है। इसलिए जो बच्चे ब्रेस्टफीडिंग कर पाते हैं उन्हें इंजेक्शन लगाने या ब्रेक करने से पहले ब्रेस्टफीडिंग करने के लिए कहा जाता है। वही जो समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चे मां का दूध नहीं पी पाते उन्हें इसकी कुछ बूंद ही दर्द से राहत दिला जाती है।
अध्ययन में किसी गंभीर दुष्प्रभाव की रिपोर्ट नहीं मिली। शोधकर्ताओं के अनुसार, स्तनपान ऐसा उपाय है जिसे सरकारी, निजी और ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में भी आसानी से लागू किया जा सकता है। यह शोध न केवल चिकित्सा समुदाय के लिए बल्कि आम माता-पिता के लिए भी महत्वपूर्ण है।
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शिशु की हल्की-सी सिसकी भी मां के दिल की धड़कन बढ़ा देती है। अब इसी दर्द को कम करने को लेकर आई पीजीआई की एक बड़ी वैज्ञानिक स्टडी उम्मीद की ठोस वजह देती है। जिसमें ये परिणाम सामने आया है कि सुई लगाते समय स्तनपान ही नवजात के लिए सबसे प्रभावी और सुरक्षित दर्द निवारक है।
इस महत्वपूर्ण अध्ययन में पीजीआई के साथ ही ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, नई दिल्ली (एम्स, नई दिल्ली), जवाहरलाल इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्टग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (जिपमेर, पुडुचेरी) के विशेषज्ञ भी शामिल रहे। ये शोध अंतरराष्ट्रीय जर्नल जर्नल ऑफ वैस्कुलर एक्सेस में प्रकाशित है।
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शोधकर्ताओं के अनुसार, यह न सिर्फ असरदार बल्कि पूरी तरह सुरक्षित और हर स्तर के अस्पताल में लागू किया जा सकने वाला तरीका है। यानी कई बार सबसे बड़ी राहत किसी महंगी दवा में नहीं, बल्कि मां की गोद और उसके स्पर्श में छिपी होती है।
इस शोध में शामिल पीजीआई के एडवांस पीडियाट्रिक सेंटर के जोगिन्दर सिंह ने बताया कि जो बच्चे प्रीमेच्योर जन्म लेते हैं उन्हें कई तरह की जांच प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। उन बच्चों में सामान्य बच्चों के तुलना में ब्रिक या इंजेक्ट करने पर ज्यादा दर्द होता है। उस दर्द को कम करने के लिए दो उपाय होते हैं। जिसमें फॉर्मेलॉजिकल यानी कि दवावों का और नॉन फार्मोकोलॉजिकल मेजर शामिल है। ज्यादातर नॉन फार्मोकोलॉजिकल मेजर को प्रधानता दी जाती है।
इस दौरान शोध में शामिल बच्चों को जब इंजेक्शन देने से पहले दशमलव दो या दशमलव 3 एमएल दूध मुंह में दिया गया तो उन्हें दर्द में राहत मिली। डॉक्टर ने बताया कि दूध मीठा होता है जो ब्रेन को रिलेक्स का सिग्नल देता है और इससे दर्द कम होता है। इसलिए जो बच्चे ब्रेस्टफीडिंग कर पाते हैं उन्हें इंजेक्शन लगाने या ब्रेक करने से पहले ब्रेस्टफीडिंग करने के लिए कहा जाता है। वही जो समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चे मां का दूध नहीं पी पाते उन्हें इसकी कुछ बूंद ही दर्द से राहत दिला जाती है।
ऐसे किया व्यापक शोध
शोधकर्ताओं ने पिछले दो दशकों में प्रकाशित अध्ययनों की व्यापक समीक्षा की। मेडलाइन, कोक्रेन, एम्सेज़ और सीआईएनएएचएल जैसे अंतरराष्ट्रीय डेटाबेस से मार्च 2023 तक के शोध जुटाए गए। 95 शोध पत्रों की समीक्षा के बाद 37 क्लिनिकल ट्रायल्स को अंतिम विश्लेषण में शामिल किया गया। इन ट्रायल्स में 18 अलग-अलग दर्द निवारक उपायों की तुलना की गई। नेटवर्क मेटा-एनालिसिस पद्धति से किए गए इस विश्लेषण में पाया गया कि वेनिपंक्चर के दौरान स्तनपान सबसे प्रभावी रहा। इसके बाद नॉन-न्यूट्रिटिव सकिंग (पैसिफायर या खाली चूसने की क्रिया) दूसरा सबसे असरदार उपाय रहा। दोनों के लिए साक्ष्य की गुणवत्ता उच्च पाई गई। विशेषज्ञों का कहना है कि नवजात शिशुओं में बार-बार होने वाली दर्दनाक प्रक्रियाएं उनके तंत्रिका विकास पर असर डाल सकती हैं। ऐसे में यदि सरल, सुरक्षित और प्राकृतिक उपाय से दर्द कम किया जा सके, तो यह नवजात देखभाल की दिशा में बड़ा बदलाव हो सकता है।अध्ययन में किसी गंभीर दुष्प्रभाव की रिपोर्ट नहीं मिली। शोधकर्ताओं के अनुसार, स्तनपान ऐसा उपाय है जिसे सरकारी, निजी और ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में भी आसानी से लागू किया जा सकता है। यह शोध न केवल चिकित्सा समुदाय के लिए बल्कि आम माता-पिता के लिए भी महत्वपूर्ण है।