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पाक्सो मामले में दोषी की सजा बरकरार: हाईकोर्ट ने कहा-तीन दशक पुराने विवाद के नाम पर फंसाने का तर्क मान्य नहीं
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: Nivedita
Updated Wed, 11 Mar 2026 03:31 PM IST
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सार
अभियोजन के अनुसार 15 जून 2015 को आरोपित ने पड़ोस में रहने वाली दो नाबालिग बच्चियों, जिनकी उम्र सात और आठ वर्ष थी, उनको बहला-फुसलाकर अपने घर बुला लिया। वहां उसने दोनों को कमरे में बंद कर दिया और चाकू दिखाकर धमकाया।
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
नाबालिग बच्चियों से दुष्कर्म के दोषी की अपील खारिज करते हुए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने उसे सुनाई गई 14 वर्ष की कठोर कारावास की सजा को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि कोई भी व्यक्ति तीन दशक पुराने विवाद का बदला लेने के लिए अपनी बेटी की गरिमा और परिवार की प्रतिष्ठा को दांव पर नहीं लगाएगा।
याची ने वर्ष 2016 में कुरुक्षेत्र ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा को चुनौती दी थी। ट्रायल कोर्ट ने उसे पाक्सो एक्ट और भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत दोषी ठहराया था। अभियोजन के अनुसार 15 जून 2015 को आरोपित ने पड़ोस में रहने वाली दो नाबालिग बच्चियों, जिनकी उम्र सात और आठ वर्ष थी, उनको बहला-फुसलाकर अपने घर बुला लिया। वहां उसने दोनों को कमरे में बंद कर दिया और चाकू दिखाकर धमकाया। आरोप है कि आरोपी ने आठ वर्षीय बच्ची के साथ दुष्कर्म किया और दूसरी बच्ची के साथ दुष्कर्म का प्रयास किया। अपील में तर्क दिया गया कि उसे वर्ष 1981 में हुए जमीन विवाद के कारण बदले की भावना से इस मामले में फंसाया गया है।
हाईकोर्ट ने कहा कि घटना के समय पीड़ित बच्चियों की उम्र सात और आठ वर्ष थी और उनके मानसिक आघात को देखते हुए एफआइआर दर्ज कराने में हुई देरी स्वाभाविक है। मेडिकल रिपोर्ट में ताजा चोट के निशान न होना अपने आप में आरोपों को खारिज करने का आधार नहीं बन सकता। साथ्ज्ञ ही इतनी कम उम्र की बच्चियां 38 वर्षीय वयस्क व्यक्ति का विरोध करने की स्थिति में नहीं हो सकती थीं। अदालत ने कहा कि 1981 के कथित जमीन विवाद के आधार पर 2015 में किसी को झूठे मामले में फंसाने की दलील तर्कसंगत नहीं है।
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याची ने वर्ष 2016 में कुरुक्षेत्र ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा को चुनौती दी थी। ट्रायल कोर्ट ने उसे पाक्सो एक्ट और भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत दोषी ठहराया था। अभियोजन के अनुसार 15 जून 2015 को आरोपित ने पड़ोस में रहने वाली दो नाबालिग बच्चियों, जिनकी उम्र सात और आठ वर्ष थी, उनको बहला-फुसलाकर अपने घर बुला लिया। वहां उसने दोनों को कमरे में बंद कर दिया और चाकू दिखाकर धमकाया। आरोप है कि आरोपी ने आठ वर्षीय बच्ची के साथ दुष्कर्म किया और दूसरी बच्ची के साथ दुष्कर्म का प्रयास किया। अपील में तर्क दिया गया कि उसे वर्ष 1981 में हुए जमीन विवाद के कारण बदले की भावना से इस मामले में फंसाया गया है।
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हाईकोर्ट ने कहा कि घटना के समय पीड़ित बच्चियों की उम्र सात और आठ वर्ष थी और उनके मानसिक आघात को देखते हुए एफआइआर दर्ज कराने में हुई देरी स्वाभाविक है। मेडिकल रिपोर्ट में ताजा चोट के निशान न होना अपने आप में आरोपों को खारिज करने का आधार नहीं बन सकता। साथ्ज्ञ ही इतनी कम उम्र की बच्चियां 38 वर्षीय वयस्क व्यक्ति का विरोध करने की स्थिति में नहीं हो सकती थीं। अदालत ने कहा कि 1981 के कथित जमीन विवाद के आधार पर 2015 में किसी को झूठे मामले में फंसाने की दलील तर्कसंगत नहीं है।