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सीआरपीएफ जवान का बर्खास्तगी आदेश रद्द: HC ने कहा-शादी के कारण तीन दिन की अनुपस्थिति पर सेवा से हटाना असंगत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Sat, 31 Jan 2026 03:15 PM IST
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सार
कोर्ट ने माना कि तीन दिन की अनुपस्थिति, वह भी विवाह जैसे व्यक्तिगत कारण से, अत्यंत मामूली है। कोर्ट ने जवान को सेवा में पुन बहाल करने, पूरी सेवा निरंतरता देने और बकाया वेतन पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित भुगतान का आदेश दिया है।
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के जवान को बड़ी राहत देते हुए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने उसकी बर्खास्तगी को अवैध करार दिया है।
जस्टिस संदीप मौदगिल ने कहा कि शादी के कारण केवल तीन दिन की अनुपस्थिति के आधार पर सेवा से हटाना न केवल असंगत है बल्कि यह प्राकृतिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों का भी उल्लंघन है। कोर्ट ने जवान को सेवा में पुन बहाल करने, पूरी सेवा निरंतरता देने और बकाया वेतन पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित भुगतान का आदेश दिया है।
भिवानी निवासी नवीन की सीआरपीएफ में 5 जनवरी 2015 को अस्थायी आधार पर नियुक्ति हुई थी। उन्होंने गुरुग्राम, बिहार, केरल, महाराष्ट्र (लातूर) और ग्वालियर में प्रशिक्षण लिया। प्रशिक्षण के दौरान उनके पैर में चोट भी लगी, जिसे कोर्ट आफ इन्क्वायरी ने दुर्घटनावश बताया।
अप्रैल 2017 में उनकी शादी तय थी, जिसके लिए उन्होंने अवकाश मांगा, लेकिन अनुमति नहीं मिली। इसके बावजूद वे 26 से 29 अप्रैल 2017 तक तीन दिन अनुपस्थित रहे, 28 अप्रैल को विवाह किया और तुरंत वापस ड्यूटी ज्वाइन कर ली। बिना कोई शो काज नोटिस दिए और बिना विभागीय जांच कराए, ग्वालियर स्थित ग्रुप सेंटर के कमांडेंट ने 19 मई 2017 को उन्हें सीसीएस (टेंपरेरी सर्विस) रूल्स के तहत सेवा से हटा दिया। उनकी अपील 18 जनवरी 2018 को खारिज कर दी गई।
कोर्ट ने कहा कि जब बर्खास्तगी का आधार कथित अनुशासनहीनता है, तो उसे टर्मिनेशन सिम्प्लिसिटर बताकर जांच से बचा नहीं जा सकता। ऐसे मामलों में बिना जांच की गई कार्रवाई न केवल दंडात्मक होती है, बल्कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का भी खुला उल्लंघन करती है। कोर्ट ने माना कि तीन दिन की अनुपस्थिति, वह भी विवाह जैसे व्यक्तिगत कारण से, अत्यंत मामूली है।
कोर्ट ने माना कि 2 साल से अधिक प्रशिक्षण और सेवा देने वाले जवान को इस आधार पर निकालना अनुपातहीन, मनमाना और अनुच्छेद 14 व 16 का उल्लंघन है। कोर्ट ने कहा कि अनुशासन के नाम पर मानवता और न्याय को कुचला नहीं जा सकता। वर्दी पहनने से कोई नागरिक अपने मौलिक अधिकार नहीं खो देता।
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जस्टिस संदीप मौदगिल ने कहा कि शादी के कारण केवल तीन दिन की अनुपस्थिति के आधार पर सेवा से हटाना न केवल असंगत है बल्कि यह प्राकृतिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों का भी उल्लंघन है। कोर्ट ने जवान को सेवा में पुन बहाल करने, पूरी सेवा निरंतरता देने और बकाया वेतन पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित भुगतान का आदेश दिया है।
भिवानी निवासी नवीन की सीआरपीएफ में 5 जनवरी 2015 को अस्थायी आधार पर नियुक्ति हुई थी। उन्होंने गुरुग्राम, बिहार, केरल, महाराष्ट्र (लातूर) और ग्वालियर में प्रशिक्षण लिया। प्रशिक्षण के दौरान उनके पैर में चोट भी लगी, जिसे कोर्ट आफ इन्क्वायरी ने दुर्घटनावश बताया।
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अप्रैल 2017 में उनकी शादी तय थी, जिसके लिए उन्होंने अवकाश मांगा, लेकिन अनुमति नहीं मिली। इसके बावजूद वे 26 से 29 अप्रैल 2017 तक तीन दिन अनुपस्थित रहे, 28 अप्रैल को विवाह किया और तुरंत वापस ड्यूटी ज्वाइन कर ली। बिना कोई शो काज नोटिस दिए और बिना विभागीय जांच कराए, ग्वालियर स्थित ग्रुप सेंटर के कमांडेंट ने 19 मई 2017 को उन्हें सीसीएस (टेंपरेरी सर्विस) रूल्स के तहत सेवा से हटा दिया। उनकी अपील 18 जनवरी 2018 को खारिज कर दी गई।
कोर्ट ने कहा कि जब बर्खास्तगी का आधार कथित अनुशासनहीनता है, तो उसे टर्मिनेशन सिम्प्लिसिटर बताकर जांच से बचा नहीं जा सकता। ऐसे मामलों में बिना जांच की गई कार्रवाई न केवल दंडात्मक होती है, बल्कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का भी खुला उल्लंघन करती है। कोर्ट ने माना कि तीन दिन की अनुपस्थिति, वह भी विवाह जैसे व्यक्तिगत कारण से, अत्यंत मामूली है।
कोर्ट ने माना कि 2 साल से अधिक प्रशिक्षण और सेवा देने वाले जवान को इस आधार पर निकालना अनुपातहीन, मनमाना और अनुच्छेद 14 व 16 का उल्लंघन है। कोर्ट ने कहा कि अनुशासन के नाम पर मानवता और न्याय को कुचला नहीं जा सकता। वर्दी पहनने से कोई नागरिक अपने मौलिक अधिकार नहीं खो देता।
