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Chandigarh News: मछलियों के कान खोलेंगे पानी के जहर का राज
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चंडीगढ़। अब पानी की गुणवत्ता जांचने के लिए केवल नमूनों पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं होगी। भविष्य में मछलियां ही बता सकेंगी कि जिस जलाशय में वे रहती हैं, वहां वर्षों से कितना प्रदूषण रहा और पानी में कितनी जहरीली धातुएं मौजूद थीं। पंजाब यूनिवर्सिटी के जूलॉजी विभाग के वैज्ञानिकों ने अपने शोध में यह महत्वपूर्ण खुलासा किया है कि मछलियों के कान के भीतर मौजूद सूक्ष्म संरचना ओटोलिथ पानी में मौजूद जहरीली धातुओं का वर्षों तक रिकॉर्ड अपने भीतर सुरक्षित रखती है। विशेषज्ञों के मुताबिक यह तकनीक भविष्य में नदियों, झीलों और जलाशयों में प्रदूषण की निगरानी का सबसे भरोसेमंद वैज्ञानिक माध्यम बन सकती है।
यह शोध अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठित जर्नल मरीन पॉल्यूशन बुलेटिन के जुलाई-2026 अंक में प्रकाशित हुआ है। शोध का नेतृत्व पंजाब यूनिवर्सिटी के जूलॉजी विभाग की प्रोफेसर रवनीत कौर ने किया। शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने भाखड़ा बांध के गोबिंद सागर जलाशय में पाई जाने वाली दो प्रमुख मीठे पानी की मछलियों कॉमन कार्प और सिंगाड़ा (कैटफिश) का अध्ययन किया। जलाशय के तीन अलग-अलग स्थानों से विभिन्न मौसमों में पानी के नमूने लिए गए और उनमें 16 प्रकार की सूक्ष्म धातुओं (ट्रेस मेटल्स) की जांच की गई। इसके साथ ही मछलियों के ओटोलिथ का अत्याधुनिक आईसीपी-एमएस और ईडीएस तकनीक से विश्लेषण किया गया।
प्रो. रवनीत कौर ने बताया कि ओटोलिथ कैल्शियम से बनी ऐसी संरचना है जो मछली के पूरे जीवनकाल में लगातार बढ़ती रहती है और उसी दौरान पानी में मौजूद धातुओं की जानकारी भी अपने भीतर दर्ज करती रहती है। इस कारण यह केवल उस समय की नहीं, बल्कि लंबे समय तक हुए पर्यावरणीय बदलावों का भी सटीक रिकॉर्ड उपलब्ध कराती है। यही वजह है कि इसे जल प्रदूषण की निगरानी के लिए बायो मॉनिटरिंग टूल के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
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शोध में यह भी सामने आया कि पानी में मौजूद कई धातुओं का स्तर मौसम के अनुसार बदलता रहा। खासकर प्री-मानसून अवधि में पारा, कॉपर, जिंक, सेलेनियम और कैडमियम जैसी जहरीली धातुओं की मात्रा अधिक मिली। वहीं अधिक उम्र की मछलियों के ओटोलिथ में इन धातुओं का जमाव भी ज्यादा पाया गया। इससे संकेत मिलता है कि जलाशयों पर मानवीय गतिविधियों का प्रभाव लंबे समय तक बना रहता है और उसका रिकॉर्ड मछलियों में सुरक्षित रहता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक सामान्य जल परीक्षण केवल उस समय की स्थिति बताता है जबकि ओटोलिथ कई वर्षों के प्रदूषण का इतिहास सामने ला सकता है। इससे जल स्रोतों की गुणवत्ता का अधिक सटीक आकलन संभव होगा। भविष्य में इस तकनीक का उपयोग जल संसाधनों के संरक्षण, मत्स्य पालन, खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े निर्णयों में किया जा सकेगा। समय रहते प्रदूषण की पहचान होने पर उसके दुष्प्रभाव कम करने के लिए प्रभावी कदम भी उठाए जा सकेंगे।
आम लोगों के लिए क्यों अहम है शोध
जलाशयों में लंबे समय से मौजूद प्रदूषण का सटीक पता चलेगा।
मछलियों में जहरीली धातुओं के जमाव की निगरानी आसान होगी।
सुरक्षित मत्स्य पालन और खाद्य सुरक्षा को बढ़ावा मिलेगा।
पेयजल स्रोतों की गुणवत्ता का वैज्ञानिक आकलन संभव होगा।
पर्यावरण संरक्षण और जल प्रबंधन से जुड़े फैसलों को मिलेगा मजबूत वैज्ञानिक आधार।
यह शोध अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठित जर्नल मरीन पॉल्यूशन बुलेटिन के जुलाई-2026 अंक में प्रकाशित हुआ है। शोध का नेतृत्व पंजाब यूनिवर्सिटी के जूलॉजी विभाग की प्रोफेसर रवनीत कौर ने किया। शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने भाखड़ा बांध के गोबिंद सागर जलाशय में पाई जाने वाली दो प्रमुख मीठे पानी की मछलियों कॉमन कार्प और सिंगाड़ा (कैटफिश) का अध्ययन किया। जलाशय के तीन अलग-अलग स्थानों से विभिन्न मौसमों में पानी के नमूने लिए गए और उनमें 16 प्रकार की सूक्ष्म धातुओं (ट्रेस मेटल्स) की जांच की गई। इसके साथ ही मछलियों के ओटोलिथ का अत्याधुनिक आईसीपी-एमएस और ईडीएस तकनीक से विश्लेषण किया गया।
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प्रो. रवनीत कौर ने बताया कि ओटोलिथ कैल्शियम से बनी ऐसी संरचना है जो मछली के पूरे जीवनकाल में लगातार बढ़ती रहती है और उसी दौरान पानी में मौजूद धातुओं की जानकारी भी अपने भीतर दर्ज करती रहती है। इस कारण यह केवल उस समय की नहीं, बल्कि लंबे समय तक हुए पर्यावरणीय बदलावों का भी सटीक रिकॉर्ड उपलब्ध कराती है। यही वजह है कि इसे जल प्रदूषण की निगरानी के लिए बायो मॉनिटरिंग टूल के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
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शोध में यह भी सामने आया कि पानी में मौजूद कई धातुओं का स्तर मौसम के अनुसार बदलता रहा। खासकर प्री-मानसून अवधि में पारा, कॉपर, जिंक, सेलेनियम और कैडमियम जैसी जहरीली धातुओं की मात्रा अधिक मिली। वहीं अधिक उम्र की मछलियों के ओटोलिथ में इन धातुओं का जमाव भी ज्यादा पाया गया। इससे संकेत मिलता है कि जलाशयों पर मानवीय गतिविधियों का प्रभाव लंबे समय तक बना रहता है और उसका रिकॉर्ड मछलियों में सुरक्षित रहता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक सामान्य जल परीक्षण केवल उस समय की स्थिति बताता है जबकि ओटोलिथ कई वर्षों के प्रदूषण का इतिहास सामने ला सकता है। इससे जल स्रोतों की गुणवत्ता का अधिक सटीक आकलन संभव होगा। भविष्य में इस तकनीक का उपयोग जल संसाधनों के संरक्षण, मत्स्य पालन, खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े निर्णयों में किया जा सकेगा। समय रहते प्रदूषण की पहचान होने पर उसके दुष्प्रभाव कम करने के लिए प्रभावी कदम भी उठाए जा सकेंगे।
आम लोगों के लिए क्यों अहम है शोध
जलाशयों में लंबे समय से मौजूद प्रदूषण का सटीक पता चलेगा।
मछलियों में जहरीली धातुओं के जमाव की निगरानी आसान होगी।
सुरक्षित मत्स्य पालन और खाद्य सुरक्षा को बढ़ावा मिलेगा।
पेयजल स्रोतों की गुणवत्ता का वैज्ञानिक आकलन संभव होगा।
पर्यावरण संरक्षण और जल प्रबंधन से जुड़े फैसलों को मिलेगा मजबूत वैज्ञानिक आधार।