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13 साल बाद इंसाफ: कैंपस की दीवार गिरने से 100% दिव्यांग हुई थी छात्रा, HC ने दिलवाया 1.37 करोड़ का मुआवजा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Tue, 17 Feb 2026 08:48 AM IST
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सार
संदीप कौर बीएससी अंतिम वर्ष की छात्रा थीं, जब कैंपस के बाथरूम की दीवार गिरने से वह मलबे के नीचे दब गईं। रीढ़ की हड्डी में गंभीर फ्रैक्चर के कारण वह स्थायी रूप से 100 प्रतिशत दिव्यांग हो गईं।
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
2013 में कैंपस की दीवार गिरने से 100 प्रतिशत दिव्यांग हुई छात्रा को 13 साल बाद न्याय मिला है।
पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने मंडी गोबिंदगढ़ की देश भगत यूनिवर्सिटी और उसे संचालित करने वाली आसरा फाउंडेशन को लापरवाही का दोषी मानते हुए 1.37 करोड़ रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि शिक्षण संस्थानों की जिम्मेदारी केवल शिक्षा तक सीमित नहीं, बल्कि परिसर में विद्यार्थियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी उनका कानूनी दायित्व है।
जस्टिस एचएस सेठी और जस्टिस विकास सूरी की खंडपीठ के समक्ष दायर याचिका में संदीप कौर ने बताया कि वह बीएससी अंतिम वर्ष की छात्रा थीं, जब कैंपस के बाथरूम की दीवार गिरने से मलबे के नीचे दब गईं। रीढ़ की हड्डी में गंभीर फ्रैक्चर के कारण वह स्थायी रूप से 100 प्रतिशत दिव्यांग हो गईं।
हादसे के बाद उनका इलाज मंडी गोबिंदगढ़, चंडीगढ़ और पंचकूला के अस्पतालों में चला। विश्वविद्यालय ने पूरा खर्च उठाने का आश्वासन दिया था, लेकिन केवल 2.25 लाख रुपये ही दिए। कोर्ट ने मेडिकल रिकॉर्ड, स्थायी दिव्यांगता, भविष्य की आय की हानि और उपचार खर्च को ध्यान में रखते हुए मुआवजा बढ़ाकर 1.37 करोड़ रुपये तय किया और तीन माह में भुगतान का निर्देश दिया।
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पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने मंडी गोबिंदगढ़ की देश भगत यूनिवर्सिटी और उसे संचालित करने वाली आसरा फाउंडेशन को लापरवाही का दोषी मानते हुए 1.37 करोड़ रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि शिक्षण संस्थानों की जिम्मेदारी केवल शिक्षा तक सीमित नहीं, बल्कि परिसर में विद्यार्थियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी उनका कानूनी दायित्व है।
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जस्टिस एचएस सेठी और जस्टिस विकास सूरी की खंडपीठ के समक्ष दायर याचिका में संदीप कौर ने बताया कि वह बीएससी अंतिम वर्ष की छात्रा थीं, जब कैंपस के बाथरूम की दीवार गिरने से मलबे के नीचे दब गईं। रीढ़ की हड्डी में गंभीर फ्रैक्चर के कारण वह स्थायी रूप से 100 प्रतिशत दिव्यांग हो गईं।
हादसे के बाद उनका इलाज मंडी गोबिंदगढ़, चंडीगढ़ और पंचकूला के अस्पतालों में चला। विश्वविद्यालय ने पूरा खर्च उठाने का आश्वासन दिया था, लेकिन केवल 2.25 लाख रुपये ही दिए। कोर्ट ने मेडिकल रिकॉर्ड, स्थायी दिव्यांगता, भविष्य की आय की हानि और उपचार खर्च को ध्यान में रखते हुए मुआवजा बढ़ाकर 1.37 करोड़ रुपये तय किया और तीन माह में भुगतान का निर्देश दिया।