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स्वतंत्रता वास्तविक सांविधानिक अधिकार: सजा रद्द होने के बावजूद 15 साल जेल में रहा, हाईकोर्ट ने दी जमानत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: Nivedita
Updated Thu, 14 May 2026 08:14 AM IST
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सार
याची को कैथल में हत्या के मामले में पहले निचली अदालत ने दोषी ठहराया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसकी दोषसिद्धि को निरस्त कर दिया और उसके बरी होने की स्थिति बहाल हो गई।
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट से दोषसिद्धि रद्द किए जाने के बावजूद 15 साल से अधिक समय तक जेल में बंद आरोपी को राहत देते हुए जमानत दे दी है।
कोर्ट ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता केवल दिखावटी अवधारणा नहीं बल्कि यह वास्तविक सांविधानिक अधिकार है और बिना वैध दोषसिद्धि के किसी व्यक्ति को जेल में रखना न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि याची ने व्यवस्था का दोष भुगता है।
कोर्ट को बताया गया कि याची को कैथल में हत्या के मामले में पहले निचली अदालत ने दोषी ठहराया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसकी दोषसिद्धि को निरस्त कर दिया और उसके बरी होने की स्थिति बहाल हो गई। इसके बावजूद प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रियाओं में उलझे रहने के कारण वह वर्षों तक हिरासत में रहा।
हाई कोर्ट ने इस पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को इस प्रकार अनिश्चितकाल तक बाधित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि संविधान में मिला स्वतंत्रता का अधिकार केवल कागजी नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ अब कोई प्रभावी दोषसिद्धि शेष नहीं है तो उसकी निरंतर कैद को न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने यह भी माना कि लंबे समय तक हिरासत में रखना व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
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कोर्ट ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता केवल दिखावटी अवधारणा नहीं बल्कि यह वास्तविक सांविधानिक अधिकार है और बिना वैध दोषसिद्धि के किसी व्यक्ति को जेल में रखना न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि याची ने व्यवस्था का दोष भुगता है।
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कोर्ट को बताया गया कि याची को कैथल में हत्या के मामले में पहले निचली अदालत ने दोषी ठहराया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसकी दोषसिद्धि को निरस्त कर दिया और उसके बरी होने की स्थिति बहाल हो गई। इसके बावजूद प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रियाओं में उलझे रहने के कारण वह वर्षों तक हिरासत में रहा।
हाई कोर्ट ने इस पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को इस प्रकार अनिश्चितकाल तक बाधित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि संविधान में मिला स्वतंत्रता का अधिकार केवल कागजी नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ अब कोई प्रभावी दोषसिद्धि शेष नहीं है तो उसकी निरंतर कैद को न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने यह भी माना कि लंबे समय तक हिरासत में रखना व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।