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पंजाबी को पहली भाषा का दर्जा दिलाने के लिए चंडीगढ़ में विशाल मार्च, किसान आंदोलन का मुद्दा भी उठा 

संवाद न्यूज एजेंसी, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Sat, 20 Feb 2021 01:05 PM IST
चंडीगढ़ में पंजाबी भाषा के लिए मार्च निकाला गया।
चंडीगढ़ में पंजाबी भाषा के लिए मार्च निकाला गया। - फोटो : अमर उजाला
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चंडीगढ़ में पंजाबी को पहली भाषा का दर्जा दिलाने के लिए शनिवार को मार्च निकाला गया।  चंडीगढ़ पंजाबी मंच की ओर से धरती मां और मां बोली को बचाने के लिए विशाल मार्च का आयोजन किया गया है। चंडीगढ़ पंजाबी मंच के अध्यक्ष सुखजीत सिंह सुखा ने बताया कि यह रोष मार्च सेक्टर 30 के मक्खन शाह लोबाना भवन से शुरू होकर शहर के अलग-अलग भागों से होता हुआ सेक्टर 22 के गुरुद्वारा साहिब पहुंचा।


इस दौरान किसान नेता जोगिंदर सिंह उगराहां ने लोगों को संबोधित किया। उन्होंने कृषि कानूनों के बारे में कहा कि इस कानून में सफेद कुछ भी नहीं, केवल काला ही काला है। यह केवल किसानों का संघर्ष नहीं है। यह संघर्ष रोटी खाने वालों का संघर्ष है।




उगराहां ने कहा कि इस कानून से कॉरपोरेट का कब्जा हो जाएगा। पीडीएस सिस्टम खत्म हो जाएगा। प्राइवेट मंडी सरकारी मंडी को फेल कर देगी। सरकारी मंडी फेल होने पर एमएसपी भी खत्म हो जाएगी। सुखजीत सिंह ने कहा कि चंडीगढ़ में पंजाबी भाषा को पहली भाषा का दर्जा दिया जाए।

चंडीगढ़ में निकाला मार्च
चंडीगढ़ में निकाला मार्च - फोटो : अमर उजाला
सेक्टर 22 के गुरुद्वारा साहिब के महासचिव गुरजोत सिंह साहनी ने बताया कि मार्च में शामिल होने वालों के लिए लंगर की व्यवस्था की गई है। सुखजीत सिंह सुखा ने बताया कि इस मार्च में चंडीगढ़ समूह गुरुद्वारा प्रबंधक संगठन, पेंडू संघर्ष कमेटी चंडीगढ़, पंजाबी लेखक सभा चंडीगढ़, ट्रेड यूनियन, नौजवान सभा, बुद्धिजीवी, लेखक, कवि वकील शामिल हैं। 

उन्होंने बताया कि रोष मार्च में चंडीगढ़ पंजाबी मंच के कई नेता शामिल हैं। संरक्षक तारा सिंह, सुखदेव सिंह सिरसा, श्रीराम अर्स, सचिव गुरप्रीत सिंह सोमल, महासचिव देवी दयाल शर्मा सहित अन्य पदाधिकारी उपस्थित रहे। 

सुखजीत सिंह सुखा ने बताया कि कृषि कानूनों को रद्द करवाने और चंडीगढ़ में पंजाबी को पहली भाषा का दर्जा दिलाने के लिए चंडीगढ़ पंजाबी मंच ने रोष मार्च का आयोजन किया है। उन्होंने कहा कि पंजाब और हरियाणा के पुनर्गठन के समय तक यानी 1 नवंबर 1966 तक चंडीगढ़ की पहली और प्रशासनिक भाषा पंजाबी थी। जैसे-जैसे यहां बाहर के अधिकारी आते गए। उन्होंने एक सोची-समझी नीति के तहत धीरे-धीरे पंजाबी भाषा को किनारे लगाकर उसके जगह पर अंग्रेजी भाषा थोप दी है।

 
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