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चार साल की बच्ची का दुष्कर्म-हत्या: बिना रियायत 50 साल की जेल, रेयरेस्ट ऑफ रेयर की परिभाषा की सीमा पर मामला

Sat, 21 Mar 2026 09:29 AM IST
Nivedita न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: Nivedita Updated Sat, 21 Mar 2026 09:29 AM IST
सार

लुधियाना में दिसंबर 2023 को एक चार साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म के बाद उसकी हत्या कर दी गई थी। हाईकोर्ट ने मामले को रेयरेस्ट ऑफ रेयर की परिभाषा की सीमा पर खड़ा माना।

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Misdeed Murder of child Girl Prison Without Remission highcourt Case on Edge of "Rarest of Rare" Definition
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

लुधियाना के बहुचर्चित दुष्कर्म एवं हत्या मामले में अहम फैसला सुनाते हुए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने दोषी की फांसी की सजा को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि मामला रेयरेस्ट ऑफ रेयर की परिभाषा की सीमा पर खड़ा है।

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जांच में कुछ कमियां और संदेह की गुंजाइश मौजूद है। ऐसे में जस्टिस अनूप चितकारा और जस्टिस सुखविंदर कौर की खंडपीठ ने दोषी को कम से कम 50 वर्ष की वास्तविक कैद भुगतने का आदेश दिया है जिसमें किसी प्रकार की रियायत नहीं दी जाएगी। साथ ही पाक्सो अधिनियम के तहत 25 वर्ष की सजा भी सुनाई गई है। अदालत ने पीड़ित परिवार को 75 लाख रुपये का मुआवजा देने का भी निर्देश दिया।

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बहलाकर अपने साथ ले गया था आरोपी

28 दिसंबर 2023 को चार वर्षीय बच्ची को उसके दादा के चाय स्टाल से बहला-फुसलाकर ले जाया गया, जहां उसके साथ दुष्कर्म कर हत्या कर दी गई। बाद में शव को छिपा दिया गया था। 20 दिन बाद आरोपी को गिरफ्तार किया गया था और निचली अदालत ने उसे फांसी की सजा सुनाई थी।

हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए कहा कि आरोपी के खिलाफ सबूत पर्याप्त हैं लेकिन जांच के दौरान कुछ गंभीर खामियां सामने आईं। अदालत ने फर्जी अतिरिक्त न्यायिक स्वीकारोक्ति, मुख्य गवाह के बयान में विरोधाभास और एक महत्वपूर्ण गवाह की गैर-पेशी को ऐसे कारक माना, जो मौत की सजा के खिलाफ जाते हैं।

पीड़िता एक असहाय बच्ची थी

कोर्ट ने कहा कि हत्या पूर्व नियोजित नहीं थी बल्कि दुष्कर्म के बाद सबूत मिटाने की घबराहट में की गई। सजा तय करते समय समाज की सुरक्षा भी अहम है, लेकिन इसके लिए अपरिवर्तनीय दंड देना जरूरी नहीं है। कोर्ट ने भावुक टिप्पणी करते हुए कहा कि पीड़िता की गलती सिर्फ इतनी थी कि वह एक कमजोर और असहाय बच्ची थी। यह समाज और व्यवस्था की विफलता को दर्शाता है कि ऐसी घटनाएं हो रही हैं।

कोर्ट ने कहा कि हमें शिक्षा और सामाजिक मूल्यों में सुधार की आवश्यकता है ताकि जीवन के प्रति सम्मान विकसित हो सके। सजा निर्धारण पर अदालत ने कहा कि कम उम्र के पीड़ित मामलों में सख्त सजा जरूरी है। इसी आधार पर पांच वर्ष से कम उम्र की पीड़िता के मामलों में कम से कम 25 वर्ष की सजा को उचित माना गया। अदालत ने यह भी दोहराया कि न्याय का सिद्धांत यह है कि कोई निर्दोष दंडित न हो और कोई दोषी बच न सके।

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