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पीजीआई रिसर्च डे....मरीजों की बेहतर देखभाल ही शोध का अंतिम लक्ष्य: प्रो. निखिल टंडन
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चंडीगढ़। चिकित्सा शोध धैर्य, जुनून और लगातार प्रयासों की लंबी यात्रा है जिसका असली उद्देश्य मरीजों की बेहतर देखभाल और समाज के स्वास्थ्य में सुधार होना चाहिए। यह बात एम्स नई दिल्ली के डीन प्रो. निखिल टंडन ने शनिवार को पीजीआई के 12वें वार्षिक रिसर्च डे पर मुख्य अतिथि के रूप में कही। उन्होंने पीजीआई में हो रहे शोध कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि यहां का वैज्ञानिक काम व्यापक, विविध और उच्च गुणवत्ता वाला है।
कार्यक्रम में पिछले एक वर्ष में प्रकाशित 329 शोध पत्र, 250 बाहरी फंडेड रिसर्च प्रोजेक्ट और 59 इनोवेशन मुख्य आकर्षण रहे। विभिन्न श्रेणियों में 35 शोधकर्ताओं को शोध प्रकाशन और 59 को इनोवेशन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। प्रो. टंडन ने कहा कि भारत में डॉक्टरों की भूमिका दोहरी होती है। उन्हें एक ओर मरीजों का इलाज करना होता है और दूसरी ओर शोध भी करना पड़ता है। इन दोनों के बीच संतुलन बनाना बड़ी चुनौती है लेकिन चिकित्सा विज्ञान को आगे बढ़ाने के लिए यह जरूरी है। उन्होंने कहा कि अच्छा शोध अकेले संभव नहीं होता, बल्कि मजबूत मेंटरशिप और सहयोगी शोध वातावरण से ही नए विचार और नवाचार सामने आते हैं।
पीजीआई के निदेशक प्रो. विवेक लाल ने कहा कि भारी क्लीनिकल वर्कलोड के बावजूद संस्थान में शोध की मजबूत संस्कृति बनी हुई है। हर साल करीब 40 लाख मरीजों का इलाज करने के साथ-साथ डॉक्टर उच्च गुणवत्ता का वैज्ञानिक कार्य भी कर रहे हैं। उन्होंने रिसर्च डे को संस्थान के लिए रिसर्च का दीवाली उत्सव बताया। डीन रिसर्च प्रो. संजय जैन ने बताया कि पिछले एक साल में आईसीएमआर, डीबीटी, डीएसटी और सीएसआईआर जैसी एजेंसियों से करीब 140 करोड़ की फंडिंग के साथ 250 बाहरी परियोजनाएं शुरू की गई हैं। इस वर्ष 329 शोध पत्र राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हुए, जबकि 59 नवाचार विकास के विभिन्न चरणों में हैं।
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कार्यक्रम में पिछले एक वर्ष में प्रकाशित 329 शोध पत्र, 250 बाहरी फंडेड रिसर्च प्रोजेक्ट और 59 इनोवेशन मुख्य आकर्षण रहे। विभिन्न श्रेणियों में 35 शोधकर्ताओं को शोध प्रकाशन और 59 को इनोवेशन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। प्रो. टंडन ने कहा कि भारत में डॉक्टरों की भूमिका दोहरी होती है। उन्हें एक ओर मरीजों का इलाज करना होता है और दूसरी ओर शोध भी करना पड़ता है। इन दोनों के बीच संतुलन बनाना बड़ी चुनौती है लेकिन चिकित्सा विज्ञान को आगे बढ़ाने के लिए यह जरूरी है। उन्होंने कहा कि अच्छा शोध अकेले संभव नहीं होता, बल्कि मजबूत मेंटरशिप और सहयोगी शोध वातावरण से ही नए विचार और नवाचार सामने आते हैं।
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पीजीआई के निदेशक प्रो. विवेक लाल ने कहा कि भारी क्लीनिकल वर्कलोड के बावजूद संस्थान में शोध की मजबूत संस्कृति बनी हुई है। हर साल करीब 40 लाख मरीजों का इलाज करने के साथ-साथ डॉक्टर उच्च गुणवत्ता का वैज्ञानिक कार्य भी कर रहे हैं। उन्होंने रिसर्च डे को संस्थान के लिए रिसर्च का दीवाली उत्सव बताया। डीन रिसर्च प्रो. संजय जैन ने बताया कि पिछले एक साल में आईसीएमआर, डीबीटी, डीएसटी और सीएसआईआर जैसी एजेंसियों से करीब 140 करोड़ की फंडिंग के साथ 250 बाहरी परियोजनाएं शुरू की गई हैं। इस वर्ष 329 शोध पत्र राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हुए, जबकि 59 नवाचार विकास के विभिन्न चरणों में हैं।