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सेवा और समर्पण की प्रेरक कहानियां : चिकित्सा नहीं, सेवा का मिशन निभा रहीं महिला डॉक्टर
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चंडीगढ़। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर शहर की इन दो महिला डॉक्टरों की कहानियां यह बताती हैं कि चिकित्सा सिर्फ पेशा नहीं बल्कि सेवा और संवेदनशीलता का मिशन भी है। एक डॉक्टर जहां बच्चों की जिंदगी बचाने के बाद अब बुजुर्गों के अकेलेपन और बीमारियों को कम करने के लिए घर-घर पहुंच रही हैं वहीं दूसरी डॉक्टर विरासत में मिली सुविधाओं के बावजूद लगातार मेहनत कर अपने काम से नई पहचान बना रही हैं। इन दोनों डॉक्टरों की कहानियां साबित करती हैं कि संवेदनशीलता, मेहनत और सेवा भाव से महिलाएं न सिर्फ अपने पेशे में, बल्कि समाज में भी बदलाव की मिसाल बन सकती हैं।
बच्चों के बाद अब बुजुर्गों का थाम रहीं हाथ
पीजीआई के एडवांस पीडियाट्रिक सेंटर की डॉ. भवनीत भारती पांच वर्षों तक मोहाली एम्स में डायरेक्टर का पद संभालने के बाद एक बार फिर पीजीआई से जुड़कर नई पहल में जुट गई हैं। बच्चों के जीवन को बचाने के मिशन के साथ काम करने वाली डॉ. भवनीत अब बुजुर्गों की जिंदगी आसान बनाने के लिए काम कर रही हैं। वे चंडीगढ़ सिटीजन फाउंडेशन के साथ मिलकर 75 वर्ष से अधिक आयु के बुजुर्गों के लिए एक विशेष प्रोजेक्ट चला रही हैं। इस पहल के तहत वे बुजुर्गों के घर जाकर उनके साथ समय बिताती हैं, उनकी समस्याएं सुनती हैं और उनकी स्वास्थ्य तथा सामाजिक जरूरतों की सूची तैयार करती हैं। डॉ. भवनीत बताती हैं कि यह आयु वर्ग ऐसा है जिसे सबसे ज्यादा देखभाल और सहारे की जरूरत होती है। कई बार दवा से ज्यादा जरूरी किसी का साथ और बातचीत होती है। करीब तीन महीने पहले शुरू हुए इस प्रोजेक्ट के तहत वे सेक्टर-27डी के बुजुर्गों के घर जाकर उनका हाल-चाल ले रही हैं। इस दौरान स्वास्थ्य जांच के साथ-साथ उनकी छोटी-बड़ी समस्याओं को समझकर समाधान की कार्य योजना भी बनाई जा रही है। उनका कहना है कि डॉक्टर होने के साथ समाज के प्रति जिम्मेदारी भी उतनी ही जरूरी है और बुजुर्गों के लिए किया गया यह काम उनके लिए सेवा का एक नया अध्याय है।
कई महिलाओं के लिए प्रेरणा बनीं डॉ. रवनीत दूसरी कहानी जीएमसीएच-32 की नई डायरेक्टर प्रिंसिपल डॉ. रवनीत कौर की है। वे आज कई महिलाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं। डायरेक्टर प्रिंसिपल बनने से पहले वे ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग में ब्लड बैंक की जिम्मेदारी संभाल रही थीं। ब्लड बैंक की 24 घंटे की इमरजेंसी सेवा में वे हमेशा सक्रिय रहती थीं और किसी भी आपातस्थिति में तुरंत उपलब्ध रहती थीं। डॉ. रवनीत बताती हैं कि मायके और ससुराल दोनों जगह का माहौल ऐसा था जहां उन्हें कभी किसी चीज की कमी नहीं रही। लेकिन यही स्थिति उनके लिए खुद को साबित करने की चुनौती भी बन गई। उन्होंने इसे मेहनत से पूरा करने का रास्ता चुना और मेडिकल क्षेत्र में लगातार काम करते हुए पहचान बनाई। जीएमसीएच-32 की डायरेक्टर प्रिंसिपल बनने के बाद उनका फोकस कॉलेज के विकास के साथ-साथ मरीजों को बेहतर चिकित्सा सुविधा दिलाने पर है। डॉ. रवनीत का मानना है कि पूर्वजों से मिली विरासत को संभालना जरूरी है लेकिन जीवन की असली सफलता तब होती है जब इंसान अपनी मेहनत से नई विरासत भी तैयार करे।
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पीजीआई के एडवांस पीडियाट्रिक सेंटर की डॉ. भवनीत भारती पांच वर्षों तक मोहाली एम्स में डायरेक्टर का पद संभालने के बाद एक बार फिर पीजीआई से जुड़कर नई पहल में जुट गई हैं। बच्चों के जीवन को बचाने के मिशन के साथ काम करने वाली डॉ. भवनीत अब बुजुर्गों की जिंदगी आसान बनाने के लिए काम कर रही हैं। वे चंडीगढ़ सिटीजन फाउंडेशन के साथ मिलकर 75 वर्ष से अधिक आयु के बुजुर्गों के लिए एक विशेष प्रोजेक्ट चला रही हैं। इस पहल के तहत वे बुजुर्गों के घर जाकर उनके साथ समय बिताती हैं, उनकी समस्याएं सुनती हैं और उनकी स्वास्थ्य तथा सामाजिक जरूरतों की सूची तैयार करती हैं। डॉ. भवनीत बताती हैं कि यह आयु वर्ग ऐसा है जिसे सबसे ज्यादा देखभाल और सहारे की जरूरत होती है। कई बार दवा से ज्यादा जरूरी किसी का साथ और बातचीत होती है। करीब तीन महीने पहले शुरू हुए इस प्रोजेक्ट के तहत वे सेक्टर-27डी के बुजुर्गों के घर जाकर उनका हाल-चाल ले रही हैं। इस दौरान स्वास्थ्य जांच के साथ-साथ उनकी छोटी-बड़ी समस्याओं को समझकर समाधान की कार्य योजना भी बनाई जा रही है। उनका कहना है कि डॉक्टर होने के साथ समाज के प्रति जिम्मेदारी भी उतनी ही जरूरी है और बुजुर्गों के लिए किया गया यह काम उनके लिए सेवा का एक नया अध्याय है।
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कई महिलाओं के लिए प्रेरणा बनीं डॉ. रवनीत दूसरी कहानी जीएमसीएच-32 की नई डायरेक्टर प्रिंसिपल डॉ. रवनीत कौर की है। वे आज कई महिलाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं। डायरेक्टर प्रिंसिपल बनने से पहले वे ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग में ब्लड बैंक की जिम्मेदारी संभाल रही थीं। ब्लड बैंक की 24 घंटे की इमरजेंसी सेवा में वे हमेशा सक्रिय रहती थीं और किसी भी आपातस्थिति में तुरंत उपलब्ध रहती थीं। डॉ. रवनीत बताती हैं कि मायके और ससुराल दोनों जगह का माहौल ऐसा था जहां उन्हें कभी किसी चीज की कमी नहीं रही। लेकिन यही स्थिति उनके लिए खुद को साबित करने की चुनौती भी बन गई। उन्होंने इसे मेहनत से पूरा करने का रास्ता चुना और मेडिकल क्षेत्र में लगातार काम करते हुए पहचान बनाई। जीएमसीएच-32 की डायरेक्टर प्रिंसिपल बनने के बाद उनका फोकस कॉलेज के विकास के साथ-साथ मरीजों को बेहतर चिकित्सा सुविधा दिलाने पर है। डॉ. रवनीत का मानना है कि पूर्वजों से मिली विरासत को संभालना जरूरी है लेकिन जीवन की असली सफलता तब होती है जब इंसान अपनी मेहनत से नई विरासत भी तैयार करे।