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पीजीआई में मॉनिटरिंग फेल: रिसर्च फंड आया, खाते भरते रहे; मरीजों की उम्मीदों का ब्याज खा गया सिस्टम
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: Nivedita
Updated Mon, 25 May 2026 10:28 AM IST
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सार
ऑडिट के दौरान वर्ष 2021-22 से 2024-25 तक के रिसर्च प्रोजेक्ट्स की जांच में पाया गया कि करीब 2.10 करोड़ रुपये की राशि सेविंग और करंट अकाउंट में पड़ी रही। यह राशि 152 रिसर्च प्रोजेक्ट्स से संबंधित थी।
चंडीगढ़ पीजीआई
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
चंडीगढ़ पीजीआई में रिसर्च प्रोजेक्ट्स और फंड मैनेजमेंट को लेकर गंभीर अनियमितताएं सामने आई हैं। ऑडिट रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि रिसर्च प्रोजेक्ट्स के लिए मिले करोड़ों रुपये लंबे समय तक बैंक खातों में बिना उपयोग पड़े रहे जबकि संस्थान के पास प्रोजेक्ट्स की निगरानी के लिए कोई प्रभावी सिस्टम तक मौजूद नहीं था।
यह मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि मेडिकल रिसर्च सीधे तौर पर मरीजों के इलाज, नई तकनीकों और आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी होती है। ऐसे में रिसर्च फंड का समय पर उपयोग न होना और मॉनिटरिंग में खामियां भविष्य में मरीजों को मिलने वाली बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं को प्रभावित कर सकती हैं। पूरे मामले पर पीजीआई प्रशासन की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
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यह मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि मेडिकल रिसर्च सीधे तौर पर मरीजों के इलाज, नई तकनीकों और आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी होती है। ऐसे में रिसर्च फंड का समय पर उपयोग न होना और मॉनिटरिंग में खामियां भविष्य में मरीजों को मिलने वाली बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं को प्रभावित कर सकती हैं। पूरे मामले पर पीजीआई प्रशासन की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
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152 रिसर्च प्रोजेक्ट्स से संबंधित थी राशि
ऑडिट के दौरान वर्ष 2021-22 से 2024-25 तक के रिसर्च प्रोजेक्ट्स की जांच में पाया गया कि करीब 2.10 करोड़ रुपये की राशि सेविंग और करंट अकाउंट में पड़ी रही। यह राशि 152 रिसर्च प्रोजेक्ट्स से संबंधित थी। रिपोर्ट के अनुसार रकम लंबे समय तक बैंक खातों में पड़े रहने के बावजूद उस पर कोई ब्याज भी नहीं मिला।ऑडिट में यह भी सामने आया कि प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद बची राशि और खरीदे गए उपकरणों के उपयोग को लेकर कोई साफ नीति नहीं थी। संस्थान के पास रिसर्च प्रोजेक्ट्स की निगरानी के लिए प्रभावी मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम तक उपलब्ध नहीं मिला। न वित्तीय प्रगति की समेकित रिपोर्ट तैयार हो रही थी और न ही यह रिकॉर्ड उपलब्ध था कि कितने प्रोजेक्ट सक्रिय हैं, कितने पूरे हो चुके हैं और कितने लंबित हैं।
टीडीएस रिफंड भी वर्षों तक पड़ा रहा
ऑडिट रिपोर्ट में फंडिंग एजेंसियों की ओर से काटे गए टीडीएस को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक कई एजेंसियों ने रिसर्च ग्रांट जारी करते समय टीडीएस काटा लेकिन संस्थान ने राशि को नेट अमाउंट के रूप में दर्ज कर खर्च किया। बाद में वर्ष 2020-21 से 2022-23 के बीच करीब 181.82 लाख रुपये का आयकर रिफंड मिला लेकिन यह राशि भी मुख्य ग्रांट खाते में ही पड़ी रही और उसका समय पर उपयोग नहीं हो सका।उपकरणों का केंद्रीय रिकॉर्ड तक नहीं
ऑडिट में यह भी सामने आया कि रिसर्च प्रोजेक्ट्स के दौरान खरीदे गए उपकरणों और अन्य एसेट्स का कोई केंद्रीय रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था। रिकॉर्ड केवल संबंधित प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर स्तर पर रखा जा रहा था। इससे यह तय करना मुश्किल हो गया कि कौन-से उपकरण अन्य रिसर्च प्रोजेक्ट्स या मरीजों के इलाज में दोबारा उपयोग किए जा सकते हैं।ऑडिट टीम ने यह मुद्दा भी उठाया कि यदि कोई प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर रिटायर हो जाए तो अधूरे रिसर्च प्रोजेक्ट्स की निगरानी और ट्रांसफर के लिए संस्थान में कोई व्यवस्था नहीं है। इसे संस्थागत स्तर की गंभीर कमी माना गया है। कैश मैनेजमेंट को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2023-24 और 2024-25 में संस्थान को क्रमशः करीब 3322 करोड़ और 3719 करोड़ रुपये विभिन्न खातों में मिले लेकिन इन फंड्स की नियमित समीक्षा और बेहतर उपयोग के लिए कोई साफ नीति नहीं मिली। ऑडिट में कहा गया है कि बड़ी रकम लंबे समय तक सेविंग और करंट अकाउंट में पड़े रहने से संभावित ब्याज आय का भी नुकसान हुआ।