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शिक्षा का उद्देश्य बाजार नहीं, समाज और सोच का विकास होना चाहिए : डॉ. कुलदीप
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चंडीगढ़। शिक्षा की अवधारणा को धीरे-धीरे केवल रोजगार-योग्यता तक सीमित कर दिया गया है जिससे उसके बौद्धिक, सामाजिक और लोकतांत्रिक उद्देश्यों को क्षति पहुंची है। शिक्षा का उद्देश्य केवल बाजार की मांगों को पूरा करना नहीं बल्कि आलोचनात्मक सोच और सामाजिक जिम्मेदारी विकसित करना होना चाहिए। यह बात डॉ. कुलदीप पुरी ने पंजाब यूनिवर्सिटी के इंग्लिश ऑडिटोरियम में उच्च शिक्षा में बढ़ते संकट विषय पर कही। वीरवार को हुए कार्यक्रम में छात्र, प्राध्यापक, डॉक्टर, वकील समेत 600 से अधिक प्रतिभागियों ने भाग लिया। ऑडिटोरियम खचाखच भर गया और कई को मंच पर बैठकर व्याख्यान सुनना पड़ा।
डॉ. सरोज गिरी ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) की तीखी आलोचना करते हुए इसके कई पहलुओं पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि यह नीति उच्च शिक्षा में समानता, पहुंच और सार्वजनिक जवाबदेही की बुनियाद को कमजोर करती है।
मुख्य वक्ता प्रो. योगेन्द्र यादव ने आज की उच्च शिक्षा के समक्ष खड़े पांच प्रमुख संकटों को रेखांकित किया। उन्होंने उस समय आधारभूत ढांचे की गंभीर कमी की ओर ध्यान दिलाया, जब सामान्य और वंचित पृष्ठभूमि से आने वाले विद्यार्थी बड़ी संख्या में उच्च शिक्षा की ओर अग्रसर हो रहे हैं। प्रो. यादव ने सार्वजनिक वित्त में लगातार हो रही गिरावट का भी उल्लेख किया, जिसके चलते शिक्षकों की भारी कमी, नियुक्तियों का अभाव और अकादमिक दबाव जैसी समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। इसके साथ ही उन्होंने शैक्षणिक संस्थानों में लोकतांत्रिक स्पेस के सिमटने पर भी गहरी चिंता जताई। इस अवसर पर पीयूसीएससी के संयुक्त सचिव मोहित मंदेरणा ने छात्रों से अपनी आवाज बुलंद करने और सार्वजनिक शिक्षा की रक्षा की सामूहिक जिम्मेदारी निभाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि भविष्य में इस विषय पर ऐसी कई और चर्चाएं आयोजित की जाएंगी।
डॉ. सरोज गिरी ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) की तीखी आलोचना करते हुए इसके कई पहलुओं पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि यह नीति उच्च शिक्षा में समानता, पहुंच और सार्वजनिक जवाबदेही की बुनियाद को कमजोर करती है।
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मुख्य वक्ता प्रो. योगेन्द्र यादव ने आज की उच्च शिक्षा के समक्ष खड़े पांच प्रमुख संकटों को रेखांकित किया। उन्होंने उस समय आधारभूत ढांचे की गंभीर कमी की ओर ध्यान दिलाया, जब सामान्य और वंचित पृष्ठभूमि से आने वाले विद्यार्थी बड़ी संख्या में उच्च शिक्षा की ओर अग्रसर हो रहे हैं। प्रो. यादव ने सार्वजनिक वित्त में लगातार हो रही गिरावट का भी उल्लेख किया, जिसके चलते शिक्षकों की भारी कमी, नियुक्तियों का अभाव और अकादमिक दबाव जैसी समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। इसके साथ ही उन्होंने शैक्षणिक संस्थानों में लोकतांत्रिक स्पेस के सिमटने पर भी गहरी चिंता जताई। इस अवसर पर पीयूसीएससी के संयुक्त सचिव मोहित मंदेरणा ने छात्रों से अपनी आवाज बुलंद करने और सार्वजनिक शिक्षा की रक्षा की सामूहिक जिम्मेदारी निभाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि भविष्य में इस विषय पर ऐसी कई और चर्चाएं आयोजित की जाएंगी।