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गैर-विभागीय अफसरों को पद: बीजापुर जनपद पंचायतों में नियमों का उल्लंघन, सीईओ के बजाय डिप्टी कलेक्टरों को प्रभार
अमर उजाला नेटवर्क, बीजापुर
Published by: बीजापुर ब्यूरो
Updated Tue, 16 Jun 2026 03:01 PM IST
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सार
राज्य शासन के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद बीजापुर जिले की भोपालपटनम, भैरमगढ़ और बीजापुर जनपद पंचायतों में डिप्टी कलेक्टर व डीडी पंचायत को सीईओ का प्रभार सौंप दिया गया। अनुसूचित क्षेत्रों में विभागीय अधिकारियों को ही प्रभार देने के आदेश की अनदेखी से प्रशासनिक विवाद गहराने की आशंका है।
बीजापुर में शासन के निर्देशों की अवहेलना
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
राज्य शासन के प्रमुख सचिव के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद बीजापुर जिले की तीनों प्रमुख जनपद पंचायतों में विभागीय व्यवस्था सवालों के घेरे में है। 11 अप्रैल 2025 को जारी निर्देशों में अनुसूचित क्षेत्रों में जनपद पंचायतों के सीईओ का प्रभार विभागीय अधिकारियों को ही देने को कहा गया था। हालांकि, जिले में अब भी डिप्टी कलेक्टर और डीडी पंचायत जैसे अन्य विभागों के अधिकारी इन पदों पर काबिज हैं।
भैरमगढ़ जनपद पंचायत में डिप्टी कलेक्टर अभिषेक तंबोली को प्रभार सौंपा गया है। भोपालपटनम जनपद पंचायत में डिप्टी कलेक्टर आदित्य कुंजाम को जिम्मेदारी दी गई है। बीजापुर जनपद पंचायत में डीडी पंचायत हिमांशु साहू को यह पदभार मिला है। इसे शासन के निर्देशों की खुली अनदेखी माना जा रहा है।
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प्रमुख सचिव ने अपने आदेश में सहायक आयुक्त आदिवासी विकास के पद को प्रथम श्रेणी का बताया था। उन्होंने स्पष्ट किया था कि अनुसूचित क्षेत्रों की 85 जनपद पंचायतों में सीईओ पद विभागीय रूप से स्वीकृत हैं। इन अधिकारियों का चयन छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग के माध्यम से होता है। ये अधिकारी अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्गों की विकास योजनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके बावजूद जिले में बिना शासन की अनुमति प्रभार परिवर्तन किया गया है।
जिला पंचायत सीईओ नम्रता चौबे ने इस संबंध में जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि मूल सीईओ ने स्वास्थ्यगत कारणों से पद मुक्त करने का आवेदन दिया था। इसी वजह से उनकी जगह डिप्टी कलेक्टर को प्रभार दिया गया है। यह प्रभार परिवर्तन बिना शासन की अनुमति के किया गया है। इससे प्रशासनिक विवाद बढ़ने की आशंका व्यक्त की गई है।
शासन ने अपने आदेश में चेतावनी दी थी कि ऐसे मामलों से न्यायालयीन विवाद उत्पन्न होते हैं। इससे स्थापना संबंधी मामलों के निराकरण में भी बाधाएं आती हैं। सूत्रों के अनुसार, शासन की अनुमति के बिना हुए इन परिवर्तनों से विभागीय अधिकारियों में नाराजगी है। यह स्थिति नियमों के उल्लंघन को दर्शाती है। प्रमुख सचिव के निर्देशों को ठंडे बस्ते में डालने का आरोप है।