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सेमरा गांव बना आकर्षण का केंद्र: हर त्योहार मनाया जाता है तारीख से पहले, दीवाली में हफ्ते पहले ही जगमगाए दीये
Wed, 15 Oct 2025 07:43 PM IST
Lalit Kumar Singh
अमर उजाला नेटवर्क, धमतरी
अमर उजाला नेटवर्क, धमतरी
Published by: Lalit Kumar Singh
Updated Wed, 15 Oct 2025 07:43 PM IST
सार
गांव के बुजुर्गों का कहना है कि सदियों पहले गांव के देवता सिदार ने सपने में आदेश दिया था कि किसी भी त्यौहार को मनाने से पहले उन्हें हूम-धूप देना जरूरी है। इसी वजह से यहां आज भी हर त्यौहार निर्धारित तिथि से सात दिन पहले ही मनाया जाता है।
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धमतरी के सेमरा गांव में दिवाली एक हफ्ते पहले ही मना ली गई।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
जहां पूरे देश में दीपावली का पर्व 20 अक्टूबर को मनाया जाएगा, वहीं धमतरी से लगभग 22 किलोमीटर दूर स्थित सेमरा गांव में मंगलवार को ही धूमधाम से दीपावली मना ली गई। सदियों से चली आ रही इस अनोखी परंपरा में गांववाले हर त्यौहार को एक हफ्ता पहले ही मनाते हैं। चाहे वह होली हो, दशहरा या दीवाली।
गांव के बुजुर्गों का कहना है कि सदियों पहले गांव के देवता सिदार ने सपने में आदेश दिया था कि किसी भी त्यौहार को मनाने से पहले उन्हें हूम-धूप देना जरूरी है। इसी वजह से यहां आज भी हर त्यौहार निर्धारित तिथि से सात दिन पहले ही मनाया जाता है। ग्रामीणों का मानना है कि इस परंपरा को तोड़ने से अनहोनी हो सकती है।
मंगलवार को पूरे सेमरा गांव ने दिवाली की तैयारियां सुबह से ही शुरू कर दीं। घर-आंगनों को सजाया गया, पूजा-पाठ के बाद शाम को गांव दीपों और आतिशबाजी से जगमगा उठा। लोग एक-दूसरे से मिलकर खुशियाँ साझा करते रहे। इस अवसर पर पटाखों और आतिशबाजी ने माहौल को और भी उल्लासपूर्ण बना दिया।
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पहचान बन चुकी परंपरा
यह अनूठा दस्तूर अब सेमरा गांव की पहचान बन चुका है। त्योहार की तिथि से पहले ही उत्सव मनाए जाने की वजह से यह गांव आसपास के इलाकों में काफी मशहूर है। हर साल यहां त्योहार देखने और परंपरा का अनुभव करने दूर-दराज़ से लोग आते हैं। गांव का युवा वर्ग भी इस परंपरा को आस्था और पहचान से जोड़कर देखता है। उनका कहना है कि यह सिर्फ धार्मिक मान्यता ही नहीं, बल्कि परिवार और रिश्तेदारों को जोड़ने का अवसर भी है। त्योहार के बहाने उन्हें अपनों से मिलने और मेहमाननवाजी का मौका मिलता है। सेमरा गांव की यह परंपरा आस्था, संस्कृति और लोक जीवन की झलक पेश करती है, जो आज भी नई पीढ़ी द्वारा पूरे उत्साह के साथ निभाई जा रही है।
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गांव के बुजुर्गों का कहना है कि सदियों पहले गांव के देवता सिदार ने सपने में आदेश दिया था कि किसी भी त्यौहार को मनाने से पहले उन्हें हूम-धूप देना जरूरी है। इसी वजह से यहां आज भी हर त्यौहार निर्धारित तिथि से सात दिन पहले ही मनाया जाता है। ग्रामीणों का मानना है कि इस परंपरा को तोड़ने से अनहोनी हो सकती है।
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मंगलवार को पूरे सेमरा गांव ने दिवाली की तैयारियां सुबह से ही शुरू कर दीं। घर-आंगनों को सजाया गया, पूजा-पाठ के बाद शाम को गांव दीपों और आतिशबाजी से जगमगा उठा। लोग एक-दूसरे से मिलकर खुशियाँ साझा करते रहे। इस अवसर पर पटाखों और आतिशबाजी ने माहौल को और भी उल्लासपूर्ण बना दिया।
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पहचान बन चुकी परंपरा
यह अनूठा दस्तूर अब सेमरा गांव की पहचान बन चुका है। त्योहार की तिथि से पहले ही उत्सव मनाए जाने की वजह से यह गांव आसपास के इलाकों में काफी मशहूर है। हर साल यहां त्योहार देखने और परंपरा का अनुभव करने दूर-दराज़ से लोग आते हैं। गांव का युवा वर्ग भी इस परंपरा को आस्था और पहचान से जोड़कर देखता है। उनका कहना है कि यह सिर्फ धार्मिक मान्यता ही नहीं, बल्कि परिवार और रिश्तेदारों को जोड़ने का अवसर भी है। त्योहार के बहाने उन्हें अपनों से मिलने और मेहमाननवाजी का मौका मिलता है। सेमरा गांव की यह परंपरा आस्था, संस्कृति और लोक जीवन की झलक पेश करती है, जो आज भी नई पीढ़ी द्वारा पूरे उत्साह के साथ निभाई जा रही है।