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रायगढ़: शादी का झांसा देकर नाबालिग से दुष्कर्म, आरोपी को कोर्ट ने सुनाई 20 साल की सजा, जुर्माना भी लगाया
अमर उजाला नेटवर्क, रायगढ़
Published by: रायगढ़ ब्यूरो
Updated Wed, 21 Jan 2026 05:46 PM IST
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सार
छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में एक नाबालिग लड़की को शादी का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाने और फिर शादी से मुकरने के गंभीर मामले में अदालत ने आरोपी को 20 साल के सश्रम कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई है।
कोर्ट ने सुनाई सजा
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में एक नाबालिग लड़की को शादी का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाने और फिर शादी से मुकरने के गंभीर मामले में अदालत ने आरोपी को 20 साल के सश्रम कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई है। यह फैसला पीडिता को न्याय दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जिसने इस जघन्य अपराध के खिलाफ आवाज उठाई।
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घटना का विवरण और आरोप
अभियोजन पक्ष के अनुसार, घटना तब सामने आई जब पीडिता ने 7 दिसंबर 2024 को खरसिया थाने में एक रिपोर्ट दर्ज कराई। रिपोर्ट में उसने बताया कि उसके पड़ोस में रहने वाले कार्तिक जायसवाल, जो 25 वर्ष का है, पिछले दो साल से उससे प्रेम का इजहार कर रहा था और शादी करने का वादा कर रहा था। जुलाई 2024 की रात, कार्तिक ने पीडिता को बहला-फुसलाकर अपने घर बुलाया, जहां उसने उसके साथ कई बार संबंध बनाए। इसके बाद पीडिता अपने परिजनों के साथ कोरबा चली गई। वहां भी कार्तिक जायसवाल ने पीडिता के माता-पिता के घर से बाहर जाने के बाद उसके साथ संबंध बनाए। इस दौरान पीडिता कार्तिक जायसवाल के बच्चे से पांच महीने की गर्भवती हो गई। जब इस बात का पता चला तो कार्तिक ने उससे शादी करने से साफ इंकार कर दिया।
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न्यायिक प्रक्रिया और फैसला
पीडिता की शिकायत के आधार पर, खरसिया पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 64 (2) (एम) और 65(1) के तहत आरोपी कार्तिक जायसवाल के खिलाफ अपराध दर्ज किया। पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर प्रकरण न्यायालय में प्रस्तुत किया। अतिरिक्त सत्र न्यायालय एफटीएससी के न्यायाधीश देवेंद्र साहू ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद आरोपी को दोषी करार दिया। अदालत ने कार्तिक जायसवाल को 20 साल के सश्रम कारावास और 5,000 रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई है। यह भी निर्देश दिया गया है कि यदि वह जुर्माने की राशि अदा नहीं करता है, तो उसे अतिरिक्त चार महीने की सश्रम कारावास भुगतना होगा। इस मामले में अपर लोक अभियोजक मोहन सिंह ठाकुर ने अभियोजन पक्ष की ओर से पैरवी की। यह फैसला ऐसे मामलों में न्याय प्रणाली की गंभीरता और आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का संकेत देता है।