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Delhi: ईंधन बचाने की अपील पर कैसे होगा अमल, संसाधन सीमित, सफर मुश्किल; गर्मी में सार्वजनिक परिवहन पर बढ़ा दबाव
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Published by: Digvijay Singh
Updated Tue, 19 May 2026 06:26 AM IST
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सार
गर्मियों और स्कूल-ऑफिस पीक सीजन में अतिरिक्त बसें और मेट्रो फेरे बढ़ाने की जरूरत है, वरना आने वाले दिनों में हालात और बिगड़ सकते हैं। दिल्ली-एनसीआर में बड़ी आबादी अब निजी वाहनों से हटकर मेट्रो पर निर्भर हो रही है।
बस में सीटें पूरी तरह पैक रही।
- फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
प्रधानमंत्री की ईंधन बचत और सार्वजनिक परिवहन अपनाने की अपील के बीच राजधानी का आम यात्री सोमवार को मुश्किल सवाल से जूझता नजर आया। मेट्रो पहले से ही क्षमता से ज्यादा बोझ उठा रही है और सड़कों पर बसों की संख्या जरूरत के मुकाबले कम है। ऐसे में निजी वाहनों से दूरी कैसे बनाएं? सुबह-शाम की भीड़ में मेट्रो स्टेशन से लेकर बस स्टॉप तक लंबी कतारें रोजमर्रा की तस्वीर बन चुकी हैं। ऐसे में चुनौती सिर्फ अपील पर अमल की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की भी है जिस पर करोड़ों लोगों का रोज का सफर टिका हुआ है।
दिल्ली सरकार सोमवार सुबह बेशक सार्वजनिक परिवहन से दफ्तर पहुंची लेकिन आम दिल्लीवासी सड़कों पर पस्त और पसीना लथपथ नजर आया। साप्ताहिक छुट्टी के बाद सार्वजनिक परिवहन पर बोझ बढ़ा तो मेट्रो से लेकर डीटीसी बसें तक कम पड़ गईं। पर्याप्त सांसाधनों की कमी से वाकिफ लोग अपने वाहनों से ही दफ्तर पहुंचे। अपने वाहन से दफ्तर आने-जाने वाले लोगों का कहना है कि अगर सार्वजनिक परिवहन के भरोसे रहे तो कार्यालय रोज देर से पहुंचेंगे।
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दिल्ली सरकार और केंद्र की ओर से लगातार लोगों से निजी वाहनों की बजाय सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करने की अपील की जा रही है ताकि ईंधन की बचत हो और प्रदूषण कम किया जा सके। जमीनी हकीकत कुछ और ही हकीकत बयां कर रही है। मेट्रो के अतिरिक्त ट्रेन चलाने और फेरे बढ़ाने के बावजूद सोमवार सुबह ब्लू लाइन, येलो लाइन और रेड लाइन पर सबसे ज्यादा दबाव देखने को मिला। राजीव चौक, कश्मीरी गेट, आनंद विहार, सेंट्रल सेक्रेटेरिएट जैसे इंटरचेंज स्टेशनों पर यात्रियों की भारी भीड़ रहीं। ऑफिस जाने वाले यात्रियों का कहना था कि ट्रेनें पहले से भरी हुई आ रही थीं, जिसके कारण कई बार प्लेटफॉर्म पर लंबा इंतजार करना पड़ा। बसों के बीच अंतराल बढ़ गया है और कई रूटों पर जरूरत के मुकाबले कम बसें चल रही हैं। इसका असर मेट्रो पर अतिरिक्त दबाव के रूप में दिखा।
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दिल्ली-गाजियाबाद,नोएडा-दिल्ली, गुरुग्राम-दिल्ली और आउटर रिंग रोड समेत राजधानी के प्रमुख मार्गों पर सुबह और शाम के समय लंबा जाम लगा रहा। भीषण गर्मी में जाम में फंसे लोगों को घंटों वाहन में बैठना पड़ा। कई जगहों पर वाहन चालकों ने एसी बंद कर ईंधन बचाने की कोशिश की लेकिन उमस और गर्मी ने उन्हें फिर से गाड़ी स्टार्ट करने और एसी ऑन करने पर विवश कर दिया।
11 हजार से ज्यादा की जरूरत, बसें 6300 ही
वर्तमान में डीटीसी के बेड़े में लगभग 6,300 बसें हैं। शहर की विशाल आबादी के लिए यह बसें नाकाफी हैं। एक अनुमान के मुताबिक 11,000 से अधिक बसों की सख्त जरूरत है। पर्याप्त बसों के अभाव में यात्रियों का अतिरिक्त बोझ मेट्रो पर बढ़ जाता है और सड़कों पर निजी वाहनों की संख्या बढ़ने से जाम का दम निकलता है। यात्रियों का कहना है कि सरकार सार्वजनिक परिवहन के इस्तेमाल की अपील तो कर रही है, लेकिन मौजूदा व्यवस्था बढ़ती भीड़ संभालने के लिए पर्याप्त नहीं दिख रही।
गर्मियों और स्कूल-ऑफिस पीक सीजन में अतिरिक्त बसें और मेट्रो फेरे बढ़ाने की जरूरत है, वरना आने वाले दिनों में हालात और बिगड़ सकते हैं। दिल्ली-एनसीआर में बड़ी आबादी अब निजी वाहनों से हटकर मेट्रो पर निर्भर हो रही है, लेकिन अंतिम मील कनेक्टिविटी और बस नेटवर्क कमजोर होने के कारण पूरा दबाव एक ही सिस्टम पर आ रहा है। कई किमी तक सड़कों पर बस स्टॉप तक नहीं बने हैं। जहां बस स्टॉप बने हैं वहां सफाई का अभाव है। ऐसे में सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने के साथ उसकी क्षमता और सुविधा बढ़ाना भी जरूरी है।
-डॉ. अनिल छिकारा, परिवहन विशेषज्ञ
आंकड़ों में दिल्ली की परिवहन सेवा
416 किमी का है दिल्ली और एनसीआर को मिलाकर मेट्रो का नेटवर्क
303 कुल मेट्रो स्टेशन हैं दिल्ली और एनसीआर में
275 से अधिक मेट्रो ट्रेनों को रोजाना होता है संचालन
89 लाख के करीब निजी वाहन पंजीकृत हैं
89 लाख वाहनों में 65% दोपहिया वाहन हैं
522 वाहन हैं, दिल्ली में प्रति 1000 लोगों पर जो राष्ट्रीय औसत से करीब 3.2 गुना अधिक है
6300 के करीब डीटीसी की बसें हैं दिल्ली में
बस स्टॉप पर इंतजार करते यात्री
सरकार चाहती है कि लोग पब्लिक ट्रांसपोर्ट इस्तेमाल करें लेकिन बसें समय पर नहीं मिलतीं। आज मैं करीब 40 मिनट से बस का इंतजार कर रहा हूं। ऐसे में ऑफिस समय पर पहुंचना मुश्किल हो जाता है। - लवकुश, दैनिक यात्री, लक्ष्मी नगर
अगर सरकार सच में पेट्रोल बचाना चाहती है तो पहले बसों की फ्रीक्वेंसी चाहिए। लोग मजबूरी में बाइक और कार निकालते हैं, शौक से नहीं।- शंकर जैन, दैनिक यात्री, आईटीओ
मेट्रो ठीक है, लेकिन हर जगह मेट्रो कनेक्टिविटी नहीं है। बसों की संख्या कम होने से काफी दिक्कत होती है। कई बार भीड़ इतनी ज्यादा होती है कि बस में चढ़ना तक मुश्किल हो जाता है। आदिल, यात्री, प्रीत विहार
सिर्फ अभियान चलाने से लोग निजी वाहन छोड़कर सार्वजनिक परिवहन की तरफ नहीं आएंगे। बेहतर वस सेवा, समयबद्ध संचालन और अंतिम मील कनेक्टिविटी मजबूत करना जरूरी है।
कुंदन सिंह, दैनिक यात्री, गोल डाकखाना