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आपातकाल के 51 वर्ष: लोकतंत्र की रक्षा एक नेता-दल या संस्था का कार्य नहीं, पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी
सार
आज का भारत 1975 का भारत नहीं है। देश की आबादी बढ़ी है, तकनीक बदली है, संचार क्रांति आई है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नागरिकों की राजनीतिक चेतना कहीं अधिक विकसित हुई है। एक समय था, जब सूचना के सीमित साधन थे।
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आपातकाल
- फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
25 जून 1975 की रात भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक ऐसे अध्याय की शुरुआत हुई, जिसकी चर्चा आज भी राजनीतिक विमर्श, संवैधानिक बहसों और लोकतांत्रिक मूल्यों के संदर्भ में होती है। उस रात देश में आपातकाल लागू किया गया और अगले 21 महीनों तक भारत ने सत्ता के केंद्रीकरण, नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध, प्रेस सेंसरशिप और विपक्ष के दमन का एक ऐसा दौर देखा, जिसने लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति और उसकी कमजोरियों, दोनों को उजागर कर दिया।
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आज, जब उस घटना को 51 वर्ष पूरे हो चुके हैं, तब यह केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि यह मूल्यांकन करने का भी समय है कि भारत ने उस अनुभव से क्या सीखा, लोकतंत्र कितना मजबूत हुआ और भविष्य के लिए क्या सावधानियां आवश्यक हैं?
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लोकतंत्र का मूल आधार असहमति को स्वीकार करना है, लेकिन आपातकाल के दौरान असहमति को व्यवस्था के लिए खतरा मान लिया गया। विपक्षी नेताओं को जेलों में भेजा गया, समाचार पत्रों की सुर्खियां सरकारी अनुमति से तय होने लगीं और नागरिक अधिकार सीमित कर दिए गए। संविधान की व्यवस्थाएं मौजूद थीं, लेकिन लोकतंत्र की आत्मा दबाव में थी।
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उस दौर ने यह स्पष्ट कर दिया कि लोकतंत्र केवल संस्थाओं के अस्तित्व से नहीं चलता, बल्कि उन संस्थाओं की स्वतंत्रता और उनके प्रति सत्ता के सम्मान से चलता है।
आज का भारत 1975 का भारत नहीं है। देश की आबादी बढ़ी है, तकनीक बदली है, संचार क्रांति आई है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नागरिकों की राजनीतिक चेतना कहीं अधिक विकसित हुई है। एक समय था, जब सूचना के सीमित साधन थे।
आज मोबाइल फोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया के युग में किसी भी सरकार के लिए सूचनाओं पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित करना लगभग असंभव है। सत्ता के निर्णयों पर तुरंत चर्चा होती है, आलोचना होती है और जनता अपनी राय खुलकर व्यक्त करती है।
भारतीय मतदाता भी पहले से कहीं अधिक जागरूक हुआ है। वह जाति, क्षेत्र और भावनात्मक मुद्दों के साथ-साथ विकास, सुशासन और जवाबदेही जैसे विषयों पर भी निर्णय लेने लगा है। यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है।
आपातकाल ने भारतीय समाज को कई महत्वपूर्ण सबक दिए। पहला सबक यह कि लोकतंत्र में कोई भी नेता, दल या सरकार संविधान से बड़ी नहीं हो सकती। सत्ता चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसे संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर ही कार्य करना पड़ता है। दूसरा सबक यह कि मजबूत विपक्ष लोकतंत्र की आवश्यकता है।
सत्ता और विपक्ष लोकतंत्र की दो रेल पटरियों की तरह हैं। यदि एक कमजोर हो जाए तो व्यवस्था का संतुलन बिगड़ सकता है। तीसरा सबक स्वतंत्र मीडिया का महत्व है। प्रेस केवल समाचार देने का माध्यम नहीं, बल्कि जनता और सत्ता के बीच जवाबदेही का सेतु भी है।
चौथा और सबसे महत्वपूर्ण सबक यह है कि लोकतंत्र की अंतिम सुरक्षा जनता करती है। 1977 के चुनावों में भारतीय मतदाताओं ने यह साबित कर दिया था कि जनता यदि ठान ले तो सबसे शक्तिशाली सरकार को भी सत्ता से बाहर कर सकती है।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस स्वतंत्रता आंदोलन की सबसे प्रमुख राजनीतिक शक्ति रही है। देश के निर्माण और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थापना में उसका महत्वपूर्ण योगदान रहा है, लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि आपातकाल उसके राजनीतिक इतिहास का सबसे विवादास्पद अध्याय बन गया।
1975 में कांग्रेस देश की निर्विवाद राजनीतिक शक्ति थी। आज स्थिति अलग है। वह राष्ट्रीय राजनीति में एक प्रमुख विपक्षी दल है, लेकिन उसका प्रभाव पहले जैसा व्यापक नहीं रह गया है। कई राज्यों में उसका संगठन कमजोर हुआ है और राष्ट्रीय स्तर पर उसे लगातार नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
आपातकाल की स्मृति आज भी कांग्रेस की राजनीतिक छवि को प्रभावित करती है। हर वर्ष 25 जून आते ही यह बहस फिर शुरू हो जाती है कि लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति राजनीतिक दलों की प्रतिबद्धता कितनी गहरी है।
यह प्रश्न स्वाभाविक है और हर पीढ़ी इसे पूछती है। संविधान में आपातकाल का प्रावधान आज भी है, क्योंकि किसी राष्ट्र को असाधारण परिस्थितियों में विशेष अधिकारों की आवश्यकता पड़ सकती है, लेकिन 1975 जैसी परिस्थितियों की पुनरावृत्ति आज पहले की तुलना में कहीं अधिक कठिन है।
इसके पीछे कई कारण हैं। आपातकाल के बाद संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से कुछ महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय जोड़े गए। न्यायपालिका पहले से अधिक स्वतंत्र और सक्रिय हुई। मीडिया का दायरा बढ़ा। डिजिटल युग में सूचनाओं को नियंत्रित करना लगभग असंभव हो गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय समाज अब राजनीतिक रूप से कहीं अधिक सजग है।
फिर भी लोकतंत्र में कोई गारंटी स्थायी नहीं होती। संस्थाओं की मजबूती, नागरिकों की जागरुकता और सत्ता की जवाबदेही ही लोकतंत्र की वास्तविक सुरक्षा हैं। यदि समाज सतर्क रहना छोड़ दे तो लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं भी कमजोर पड़ सकती हैं।
आपातकाल की 51वीं वर्षगांठ केवल एक राजनीतिक घटना की स्मृति नहीं है। यह लोकतंत्र की उस शक्ति का स्मरण है, जिसने कठिन परिस्थितियों के बावजूद स्वयं को पुनः स्थापित किया। यह भारतीय जनता की राजनीतिक परिपक्वता का भी प्रमाण है कि उसने लोकतंत्र पर आए संकट का उत्तर लोकतांत्रिक तरीके से दिया।
आज आवश्यकता अतीत की कटुता को दोहराने की नहीं, बल्कि उससे सीख लेने की है। लोकतंत्र तब मजबूत होता है, जब सत्ता विनम्र हो, विपक्ष जिम्मेदार हो, संस्थाएं स्वतंत्र हों और नागरिक सजग हों। भारत ने पिछले 51 वर्षों में लंबी यात्रा तय की है। यह यात्रा बताती है कि लोकतंत्र की रक्षा किसी एक नेता, दल या संस्था का कार्य नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
आपातकाल की स्मृति हमें यही याद दिलाती है कि स्वतंत्रता और लोकतंत्र कभी स्थायी रूप से प्राप्त उपलब्धियां नहीं होते। उन्हें हर पीढ़ी को अपने विवेक, साहस और जागरुकता से सुरक्षित रखना पड़ता है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।