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रामचंद्र कह गए सिया से, ऐसा कलियुग आएगा: त्रेता की सिया और कलियुग की सिया पर एक चिंतन

Sun, 28 Jun 2026 01:31 PM IST
Krishna Guruji कृष्णा गुरुजी
Updated Sun, 28 Jun 2026 01:31 PM IST
सार

Siya Goyal: आज सोशल मीडिया, गूगल लोकेशन, सीसीटीवी कैमरे और डिजिटल साक्ष्य सत्य तक पहुंचने के महत्वपूर्ण साधन बन चुके हैं। समय की मांग है कि इन आधुनिक तकनीकों का समुचित उपयोग न्याय प्रक्रिया में हो, ताकि निर्दोष को न्याय मिले और दोषी को दंड। 

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siya goyal and ketan agarwal case news and politics update in hindi
siya goyal and ketan agarwal case - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

Siya Goyal: त्रेता की सिया त्याग, तपस्या, मर्यादा और पवित्रता की प्रतिमूर्ति थीं। उन्होंने निर्दोष होते हुए भी समाज और लोकमत के कारण वनवास का दुःख सहा। आज के दृष्टिकोण से उस निर्णय पर मतभेद हो सकते हैं, किन्तु उस युग में राजधर्म और प्रजा की भावना को सर्वोच्च माना गया। वहीं आज कलियुग की एक सिया पर गंभीर आरोप हैं कि उसने किसी परिवार का चिराग बुझा दिया और पूरे घर को गहरे दुःख में डाल दिया। वह दोषी है या निर्दोष, इसका अंतिम निर्णय न्यायालय करेगा और हम सभी को उस निर्णय का सम्मान करना चाहिए। फिर भी यह घटना समाज के सामने कई प्रश्न खड़े करती है। क्या आज सत्य की स्थापना सर्वोपरि है, या केवल मुकदमा जीतना ही सफलता का मापदंड बन गया है? क्या कानून का उद्देश्य केवल कानूनी दांव-पेंच के आधार पर विजय प्राप्त करना है, अथवा न्याय और सत्य की रक्षा करना भी उसका मूल धर्म है?

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निस्संदेह, वकीलों का कर्तव्य अपने मुवक्किल का पक्ष रखना है, जो न्याय व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है। किन्तु समाज को यह चिंतन अवश्य करना चाहिए कि न्याय का अंतिम उद्देश्य सत्य की विजय और जनविश्वास की रक्षा होना चाहिए।
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आज सोशल मीडिया, गूगल लोकेशन, सीसीटीवी कैमरे और डिजिटल साक्ष्य सत्य तक पहुंचने के महत्वपूर्ण साधन बन चुके हैं। समय की मांग है कि इन आधुनिक तकनीकों का समुचित उपयोग न्याय प्रक्रिया में हो, ताकि निर्दोष को न्याय मिले और दोषी को दंड। यदि अपराधों के निष्पक्ष निपटारे में जनता का विश्वास कमजोर पड़ने लगे, तो यह किसी भी लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है। कानून इसलिए बनाए गए थे कि उनके सम्मान और भय से लोग गलत कार्य करने से बचें, न कि कानून की जटिलताओं का लाभ उठाकर सत्य को धूमिल किया जाए।
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त्रेता की सिया ने निर्दोष होकर भी कष्ट सहे, और कलियुग की सिया पर आरोपों के बीच पूरा समाज सत्य और न्याय की प्रतीक्षा कर रहा है।

यह किसी व्यक्ति विशेष पर निर्णय देने का समय नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का समय है।

चिंतन

  • त्रेता की सिया ने अपने चरित्र से मर्यादा को अमर किया।
  • कलियुग की सिया को भी यह स्मरण रखना होगा कि नाम नहीं, कर्म इतिहास लिखते हैं।
  • न्याय केवल कानून की किताबों में नहीं, बल्कि समाज के विश्वास और सत्य की स्थापना में भी दिखाई देना चाहिए।


संदेश

"रामचंद्र कह गए सिया से, ऐसा कलियुग आएगा,
जहाँ मर्यादा और सत्य की रक्षा के लिए समाज को स्वयं भी जागरूक होना पड़ेगा।
नाम नहीं, कर्म ही व्यक्ति की वास्तविक पहचान बनते हैं।"



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 

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