पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
फ्री ई-पेपर
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Ram Temple embezzlement case theft of donations and resignations

चढ़ावा चोरी: असल चुनौती राम भक्तों के ‘ट्रस्ट’ को फिर से बहाल करने की है

Sun, 28 Jun 2026 04:29 PM IST
Ajay Bokil अजय बोकिल
Updated Sun, 28 Jun 2026 04:29 PM IST
सार

चढ़ावा चोरी की अवधि और एसआईटी गठन की मांग के दर्मियान यह खेल सवा साल तक क्यों, किसने और कैसे चलने दिया, यह असली जांच और दंड का मुद्दा है। 

विज्ञापन
Ram Temple embezzlement case theft of donations and resignations
राम मंदिर चंदा विवाद - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

राम मंदिर चढ़ावा चोरी कांड में अंतत: मंदिर की व्यवस्थाओं के लिए जिम्मेदार राम जन्मभूमि तीर्थ ट्रस्ट के महासचिव  चंपत राय, एक और ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्रा को राम भक्तों के दबाव में पद से इस्तीफा देना पड़ा। हालांकि इस इस्तीफे के पीछे किसी पश्चाताप अथवा नैतिक अपराध का भाव नहीं दिखाई देता।

विज्ञापन


इस बीच यूपी सरकार ने एसआईटी की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट के आधार पर राम मंदिर चढ़ावा राशि गणना से जुड़े 8 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया है, जिन्हें कोर्ट ने जेल भेज दिया है। लेकिन इस समूचे कांड के ‘सरगनाओं’ के खिलाफ किसी कार्रवाई की कोई संभावना अभी नहीं दिख रही है। हालांकि कहा यही जा रहा है कि ‘किसी दोषी को नहीं बख्शा जाएगा।‘ 
विज्ञापन


हैरानी की बात यह भी है कि इतना कांड होने और दो ट्रस्टियों के इस्तीफे के बाद ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद गिरी का पहली बार लिखित बयान आया है कि इस्तीफे मिल गए हैं और ट्रस्ट का सोने चांदी का  हिसाब काफी कुछ ठीक है, जिन्होंने गड़बड़ी की है, उन्हे दंड दिया जाएगा। गोविंद गिरी अब तक चुप क्यों थे, यह भी जांच का विषय है।
विज्ञापन
विज्ञापन


दरअसल इस पूरे प्रकरण में सरकार, रामजन्मभूमि तीर्थ ट्रस्ट, विश्व हिंदू परिषद और राम मंदिर प्रबंधन की अग्नि परीक्षा राम मंदिर में करोड़ों राम भक्तों का ‘ट्रस्ट’ कायम रखने की है। अगर दिखावे के लिए शक के घेरे में रहे चंपत राय, डॉ. अनिल मिश्रा और गोपाल राव को उनके ‘तपस्वी जीवन’ का हवाला देकर छोड़ दिया गया तो सरकार और मंदिर प्रबंधन की मंशा पर ही सवाल खड़े होंगे।

विपक्ष तो इसे राजनीतिक रूप से भुनाएगा ही, मंदिर पर से राम भक्तों का भरोसा अगर उठ गया तो वो फिर वापस लाना लगभग असंभव होगा। क्योंकि आरोपों के जो जवाब दिए जा रहे हैं, वह राजनीतिक ज्यादा हैं, बजाए राजधर्म का पालन सुनिश्चित करने  के।  

चढ़ावा चोरी कांड की टाइम लाइन

इस पूरे चढ़ावा चोरी कांड की टाइम लाइन को देखें तो शुरू से लेकर अब नरेटिव लगातार बदलते दिख रहे हैं। पहले तो यह साबित करने की कोशिश हुई कि कहीं कुछ हुआ ही है। जिनका राम में ही भरोसा नहीं है, वो चढ़ावा चोरी की बात फैला रहे हैं। जब गड़बड़ी के सबूत मिलने लगे तो कहा गया कि कुछ छोटे कर्मचारियों की ‘गलती’ को बड़े और नियोक्ता पदाधिकारियों की निष्ठा से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। या यूं कहें कि ऐसी गड़बडि़यों को लेकर शक करना भी अपने हिंदू होने पर ही संदेह करने जैसा है।

जब एसआईटी ने चढ़ावा चोरी और चोरों की बदलती माली हैसियत के प्रमाण दिए तो कहा गया कि ‘कुछ’ लोग गड़बड़ हो सकते हैं। इसके लिए ट्रस्टियों को दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए। फिर कहा गया कि जैसे ही गड़बड़ी का पता चला (जोकि सवा साल से बेखौफ चल रही थी, और जिसके तीन माह के फुटेज भी मिल गए) ट्रस्टियों ने खुद एसआईटी बनाने के लिए कहा। 

चढ़ावा चोरी की अवधि और एसआईटी गठन की मांग के दर्मियान यह खेल सवा साल तक क्यों, किसने और कैसे चलने दिया, यह असली जांच और दंड का मुद्दा है। जब यह भी साफ होने लगा कि 14 सदस्यीय ट्रस्ट को वास्तव में दो-तीन लोग ही चला रहे थे, बाकी ट्रस्टी को केवल मूक दर्शक थे, तो कहा जा रहा है कि ट्रस्ट को भंग करने की कोई आवश्यकता नहीं है। दो के इस्तीफे हुए हैं, उनकी जगह नए चेहरे बिठा दिए जाएं।

दूसरी तरफ जन दबाव लगातार बन रहा है कि कार्रवाई की पूर्णाहुति तभी समझी जाएगी, जब इस भारी घोटाले के लिए नैतिक और प्रशासनिक रूप से जिम्मेदार लोगों को सजा नहीं होती। क्योंकि इन लोगों उन राम भक्तों का विश्वास तोड़ा है, जो न किसी राजनीतिक, सांस्कृतिक अथवा सामाजिक संगठन में हैं। 

तर्क यह भी दिया जा रहा है कि चंपत राय जैसे लोग तपस्वी हैं। उनकी एक (महा) ‘त्रुटि’ उनके जीवन को कलंकित नहीं कर सकती। लेकिन ऐसी ‘लापरवाह तपस्विता’ किस काम की, जब मामला करोड़ों राम भक्तों की निश्छल आस्था से जुड़ा हो। जो खेल उनकी नाक के नीचे सवा साल से चल रहा था, उसकी जानकारी ट्रस्ट के महासचिव को न हो, इस पर तो कोई परम मूर्ख ही भरोसा कर सकता है। अगर उन्हें जानकारी थी तो तत्काल कार्रवाई में कौन सी बाधा थी? 

उठते कई सारे सवाल
 
क्यों पुलिस में उसकी रिपोर्ट नहीं हुई, क्यों चोरों को तत्काल मंदिर से बाहर का रास्ता क्यों नहीं दिखाया गया, क्यों खजाने की चाबियां एक ट्रस्टी के ड्राइवर के भरोसे थीं, इस सवालों के जवाब तो हर राम भक्त हिंदू पूछ रहा है। सवाल यह भी है कि जिम्मेदार पद पर तैनात कोई अपने अधीनस्थों पर अंधविश्वास कैसे कर सकता है? या तो उसने तपस्वी की माफिक आंखें मूंद ली हों या फिर खुद राम भक्ति में इतना लीन हो गया हो कि भीतर क्या चल रहा है, इससे कोई सरोकार न हो।

हो सकता है कि आरोपी ट्रस्टियों ने चढ़ावे की पाई भी न ली हो, लेकिन चोरों को चोरी करने देते रहने की नैतिक जिम्मेदारी से कैसे बचेंगे? यह तो आपराधिक लापरवाही है और दंडनीय है। 

ज्यों-ज्यों जांच और कार्रवाई आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे यह नरेटिव कमजोर पड़ता जा रहा है कि हिंदू मंदिरों के प्रबंधन में सरकार का कोई दखल नहीं होना चाहिए। एक सुझाव यह भी है कि राम मंदिर ट्रस्ट को भंग कर जम्मू- कश्मीर के ‘श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड’ की तर्ज पर नया राम मंदिर ट्रस्ट बनाया जाए, जिसमें राज्यपाल ही पदेन अध्यक्ष होते हैं। इसके अलावा कुछ धर्माचार्य, हिंदू समाज के प्रतिष्ठित व्यक्ति, प्रशासनिक और वित्तीय मामलों के जानकारी रिटायर्ड अधिकारी होते हैं। 

ट्रस्ट के संचालन और मंदिर प्रबंधन का संपूर्ण दायित्व सीईओं का होता है। कुछ सुझाव उन मंदिरों के ट्रस्ट अथवा प्रबंधन के भी हैं, जहां मंदिर प्रबंधन बेहतर ढंग से और भक्तों की आस्था के अनुरूप किया जा रहा है। अब देखना यह है कि केन्द्र और राज्य सरकार राम मंदिर ट्रस्ट के बारे में क्या फैसला लेती है। मंदिर प्रबंधन के लिए सीईओं की नियुक्ति की बात तो लगभग सभी मान रहे हैं। लेकिन ‘चढ़ावा चोरी’ के लिए जिम्मेदार एक और घटक यानी बैंक की भूमिका पर ज्यादा बात नहीं हो रही है।

चढ़ावा राशि की गणना और हिसाब में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की भी अहम भूमिका है। लेकिन उसने अभी तक अपने कर्मचारियों पर कोई कार्रवाई की हो, यह सुनने में नहीं आया। लेकिन इस प्रकरण में तो बैंक कर्मी ही शामिल दिखाई देते हैं।

इस घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण कोण राजनीतिक है। श्रीराम मंदिर चढ़ावा चोरी कांड ने विपक्ष को बैठे-बिठाए  मोदी योगी सरकार, भाजपा, संघ और विहिप को घेरने का एक ऐसा मुद्दा दे दिया है, जिसकी गूंज राम भक्तों के ह्रदय तक हो रही है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं।

अगर चढ़ावा चोरी कांड में निष्पक्ष जांच और सभी दोषियों के खिलाफ कठोर तो सभी संदेही आस्था के कठघरे में खड़े दिखाई देंगे। राम भक्तों के बीच यही संदेश जाएगा कि जब प्रभु श्रीराम के मंदिर में ही राम राज स्थापित नहीं हो पाया तो देश प्रदेश में कहां से आएगा?

भाजपा और राम मंदिर आंदोलन से जुड़े लोगों का यह जवाबी तर्क बोदा साबित होगा कि राम मंदिर को वो लोग बदनाम कर रहे हैं, जो श्रीराम मंदिर के खिलाफ रहे हैं या जो कभी रामलला के दर्शन करने गए ही नहीं। शुचिता पर उठी उंगली को यह कहकर नहीं मरोड़ा जा सकता कि उंगली ही गलत आदमी की है। 

इस पूरे मामले में एक सकारात्मक संकेत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भूमिका को लेकर है। देर से ही सही, लेकिन जिस दिशा में कार्रवाई आगे बढ़ रही है, उससे लगता है कि वो इसे परिणति तक पहुंचाएंगे। अगर योगी यह कर सके या उन्हें करने दिया गया तो भाजपा के अंदर भी उन्हें पद से हटाने को लेकर चल रही कुश्ती के भी वो केसरी साबित होंगे। वैसे भी भाजपा ने आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनाव के पहले योगी को यूपी से हटाने की हिमाकत की तो इसकी उसे बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

चढ़ावा चोरी कांड के दोषियों को कठोर दंड देना और राम मंदिर की व्यवस्थाओं में राम भक्तों का ट्रस्ट (विश्वास) फिर से कायम करना, योगी के लिए भी बड़ी चुनौती है। अपने पद को दांव पर लगाकर भी योगी अगर  यह कर पाए तो उनकी प्रतिष्ठा राम भक्तों की नजर में कई गुना बढ़ जाएगी। देखना यह है कि अव्यवस्था के ‘चंपत राय’ पर सुव्यवस्था के ‘संपत राय’ कितने भारी पड़ते हैं?



-------------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed