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देव की डायरी: जिसका गला सबसे अंत में बैठता है, वही सबसे बड़ा बुद्धिमान !
सार
कुछ दिनों से मेरा ध्यान टीवी पर होने वाले ‘डिबेट’ पर अटका हुआ है। हमारे युग की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि हमने 'बुद्धि' का विकल्प 'फेफड़ों' में खोज लिया है। पहले लोग बहस के लिए पुस्तकालय जाते थे, अब लोग बहस के लिए 'गले के डॉक्टर' के पास जा रहे हैं, ताकि उनका ‘वोकल कॉर्ड’ बीच डिबेट में दगा न दे जाए।
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डिबेट में ‘वोकल कॉर्ड’ मजबूत रहना जरूरी
- फोटो : Amarujala.com/AI
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विस्तार
मेरे पास एक तोता है। नाम है अल्फा। दिन भर घर में फुदकता रहता है। कुछ दिनों से वह शोर बहुत कर रहा था। हम सब परेशान। ऐसा तांडव मचा रखा था कि मुझे लगने लगा था कि मोहल्ले का बिजली विभाग का दफ्तर मेरे ही ड्रॉइंग रूम में खुल गया है। जब घबराहट हदों को पार कर गई,तो मैंने बीकानेर में बैठे अपने जीव वैज्ञानिक भाई को फोन मिलाया। संकट बड़ा था, इसलिए भाई ने भी इस पर एक अदद 'कमेटी' गठित करने जैसी गंभीरता दिखाई।
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सारे इनपुट लेने के बाद भाई ने जो कहा, उसने मेरी रीढ़ में एक 'क्लर्क-मार्का' डर पैदा कर दिया। भाई बोला,"यह लाइफस्टाइल की बीमारी है।"
अब आप ही बताइए, जिस आदमी के पास 'लाइफ' के नाम पर घर से दफ्तर और दफ्तर से घर की दूरी भर हो और 'स्टाइल' के नाम पर कार में पेट्रोल भरवाने के लिए अलग अलग पेट्रोल पंपों का जायजा लेने की कला हो, वह अब अपनी कौन सी लाइफस्टाइल बदले ?
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खैर, जल्द ही उस महान शोर का असली स्रोत समझ में आ गया। हुआ यह था कि कुछ दिनों से हमारे यहां एक रिश्तेदार पधारे हुए थे। उन्हें समाचार चैनलों पर होने वाली 'बहस' देखने की पुरानी आदत थी। वे घंटों टीवी के सामने जम जाते। अल्फा भी पास के सोफे के हत्थे पर बैठकर बड़े ध्यान से उन बहसों को देखता।
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रिश्तेदार तो गांव लौट गए, लेकिन उन कुछ ही दिनों में अल्फा' अपडेट' हो गया। शोर का गणित उसे समझ में आ गया। उसने टीवी के उन शूरवीर प्रवक्ताओं से सीख लिया था कि अपनी बात मनवाने के लिए तर्क की नहीं, बल्कि फेफड़ों की ताकत और गले की खराश की जरूरत होती है।
'बुद्धि' का विकल्प 'फेफाड़ा'!
अब कुछ दिनों से मेरा ध्यान टीवी पर होने वाले ‘डिबेट’ पर अटका हुआ है। हमारे युग की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि हमने 'बुद्धि' का विकल्प 'फेफड़ों' में खोज लिया है। पहले लोग बहस के लिए पुस्तकालय जाते थे, अब लोग बहस के लिए 'गले के डॉक्टर' के पास जा रहे हैं, ताकि उनका ‘वोकल कॉर्ड’ बीच डिबेट में दगा न दे जाए।
जब हम छोटे थे, तो हमारे गांव मोतिया के स्कूल में ‘बहस प्रतियोगिता’ होती थी। तर्क जुटाने होते थे। शिक्षक कहते थे, गरिमा के साथ अपने पक्ष में तथ्य और प्रमाण रखो। धीरे-धीरे वह बहस प्रतियोगिता कम से कम गांव के स्कूलों से खत्म हो गई। टीवी ने इस दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है। टीवी ने हमें बताया है कि 'तर्क' का अर्थ है, सामने वाले की आवाज को अपनी आवाज के मलबे के नीचे दबा देना।
इस परंपरा ने समाज में विद्वान की एक नई परिभाषा सप्लाई की है। अब वह व्यक्ति सबसे बड़ा विद्वान माना जाता है, जिसकी आवाज सुनकर मोहल्ले भर की नींद टूट जाए। लोग कहते हैं, "क्या शेर की तरह दहाड़ रहा था!" कोई यह नहीं पूछता कि उस दहाड़ में कोई बात भी थी या सिर्फ हवा का दबाव था?
मेरा एक क्लासमेट है। अब बड़ा नेता हो गया है। हर दिन कहीं न कहीं टीवी की बहस में अड़ा हुआ दिखता है। उसको पहली बार मैंने भागलपुर के शंकर टॉकीज में मैटनी शो के लिए भयानक भीड़ में टिकट की कतार में चिल्लाते हुए सुना था। वाह, क्या चीख थी। पल भर में टिकट हमारे हाथ में। हम सब दोस्तों ने उस दिन उसके उज्ज्वल भविष्य की कामना की थी। परिणाम सामने है। टीवी पर अंत तक बुलंद आवाज के साथ अड़े रहने वाले प्रवक्ताओं में उसका नाम शुमार है।
'टीआरपी' बढ़ाने के लिए चिल्लाना जरूरी
कल उससे बात हो रही थी। मैंने पूछा, "भाई, यह तुम टीवी पर क्या करते रहते हो? सिर्फ चिल्लाते हो। दूसरे की भी तो सुनो।"
वह हंसने लगा, "महाराज, कभी जरूर सुनने से ज्ञान बढ़ता होगा, पर चिल्लाने से अब 'टीआरपी' बढ़ती है। और आज के युग में टीआरपी ही ब्रह्म है, बाकी सब मिथ्या है।"
मैं इस दिव्यज्ञान से तृप्त हो गया। टीवी पर बहस को लगातार देखने वाले जानते हैं कि एंकर और मेहमान के बीच का रिश्ता अब अतिथि और आतिथेय का रिश्ता नहीं रह गया है। एंकर और मेहमान अब उन दो इंजन चालकों की तरह हैं, जो अपनी-अपनी पटरी पर ट्रेन दौड़ा रहे हैं और लगातार हॉर्न बजा रहे हैं, ताकि दूसरे को कुछ सुनाई न दे।
अब सबको बोलने की आजादी वाली बात तो लोग बोलते जरूर हैं, पर असलियत यह है कि यहां सिर्फ उसे बोलने की आजादी है, जिसकी आवाज एयरक्राफ्ट के इंजन से ज्यादा तेज है। बाकी सब तो सिर्फ उस शोर को सुनने के लिए 'टैक्स' भरने वाले दर्शक हैं। आदमी जानता है कि अगर आप किसी की बात नहीं काट पा रहे, तो कम से कम इतना शोर तो कर ही सकते हैं कि सामने वाले कोे खुद की बात सुनाई देना बंद हो जाए।
एक किस्सा याद आता है। दो दोस्त जंगल गए थे। एक के पास बंदूक थी। उसने जंगल में शेर देखकर अपनी बंदूक नहीं चलाई, बल्कि जोर-जोर से चिल्लाने लगा। उसके दोस्त ने पूछा, "भाई यह क्या बात हुई?" दोस्त बोला, "भाई, आज के दौर में वार करने से ज्यादा जरूरी है यह जताना कि आप मैदान में मौजूद हैं।"
मैदान में मौजूद एंकर बार-बार सबको 'शांत' रहने के लिए कहता है, और वह खुद इतना जोर से चिल्लाता है कि बगल वाले पैनलिस्ट के कान का परदा किसी पुराने अखबार की तरह फटने लगता है। इसे ही आजकल 'निष्पक्ष पत्रकारिता' और 'प्रखर बहस' कहा जाता है। ...और पते की बात तो यह भी है कि जनता भी तालियां उसी के लिए बजाती है, जिसका गला सबसे अंत में बैठता है।
अंत में, क्योंकि मेरे फेफड़े उतने मजबूत नहीं हैं कि मैं 'विद्वान' कहला सकूं, मैं अपनी साधारण बुद्धि और धीमी आवाज के साथ ही खुश हूं। मैंने तय किया कि मैं किसी बहस में नहीं पडूंगा। न देखूंगा और न ही अल्फा को देखने दूंगा।
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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।