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मोदी सरकार के 12 वर्ष: उपलब्धियां, बदलाव और बहस के मुद्दे
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सार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार ने केंद्र में अपने 12 वर्ष पूरे कर लिए हैं। इस अवधि को समर्थक, भारत के शासन, अर्थव्यवस्था और वैश्विक भूमिका में एक निर्णायक बदलाव के दौर के रूप में देखते हैं, जबकि आलोचक इसके कुछ नीतिगत और संस्थागत प्रभावों पर सवाल उठाते रहे हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।
- फोटो : आईएएनएस
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विस्तार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय राजनीति में एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। वह लगातार सबसे लंबे समय तक पद पर रहने वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री बन गए हैं। इस मामले में उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू के उस रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है, जो प्रथम आम चुनाव के बाद निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल से जुड़ा था।
पंडित नेहरू ने 13 मई 1952 को निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने के बाद 27 मई 1964 तक लगातार 4,398 दिन पद पर रहते हुए देश का नेतृत्व किया था। नरेंद्र मोदी ने 26 मई 2014 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी और आज 4,399 दिन पूरे कर इस रिकॉर्ड को पार कर लिया है।
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यदि प्रधानमंत्री के कुल कार्यकाल की बात की जाए तो पंडित जवाहरलाल नेहरू अब भी सबसे आगे हैं। वे 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र भारत की अंतरिम सरकार के प्रमुख के रूप में प्रधानमंत्री बने थे और 27 मई 1964 को अपने निधन तक इस पद पर रहे। इस प्रकार उनका कुल कार्यकाल लगभग 6,130 दिनों का रहा।
इसमें 1947 से 1952 तक का अंतरिम सरकार का काल तथा 1952 के बाद निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल दोनों शामिल हैं। इसलिए नरेंद्र मोदी ने नेहरू का "सबसे लंबे समय तक लगातार निर्वाचित प्रधानमंत्री" रहने का रिकॉर्ड तोड़ा है, न कि "प्रधानमंत्री के कुल कार्यकाल" का रिकॉर्ड।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार ने केंद्र में अपने 12 वर्ष पूरे कर लिए हैं। इस अवधि को समर्थक, भारत के शासन, अर्थव्यवस्था और वैश्विक भूमिका में एक निर्णायक बदलाव के दौर के रूप में देखते हैं, जबकि आलोचक इसके कुछ नीतिगत और संस्थागत प्रभावों पर सवाल उठाते रहे हैं। ऐसे में इन 12 वर्षों का मूल्यांकन उपलब्धियों और चुनौतियों, दोनों के संदर्भ में किया जाना चाहिए।
2014 में सत्ता संभालने के समय सरकार ने नीतिगत गतिरोध, धीमी परियोजना क्रियान्वयन और कल्याणकारी योजनाओं में रिसाव जैसी समस्याओं को प्रमुख चुनौती बताया था। इसके बाद जन धन योजना, आधार और मोबाइल के संयोजन पर आधारित प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) प्रणाली को विस्तार दिया गया। सरकार का दावा है कि इससे लाभार्थियों तक सहायता सीधे पहुंची और सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता बढ़ी।
आर्थिक मोर्चे पर वस्तु एवं सेवा कर (GST), दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC), उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना और डिजिटल भुगतान प्रणाली जैसे कदमों को संरचनात्मक सुधारों के रूप में प्रस्तुत किया गया।
समर्थकों का तर्क है कि इनसे औपचारिक अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिला और भारत वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने की दिशा में आगे बढ़ा। हालांकि GST के शुरुआती क्रियान्वयन, छोटे कारोबारों पर प्रभाव और रोजगार सृजन की गति को लेकर बहस भी जारी रही।
सामाजिक क्षेत्र में स्वच्छ भारत मिशन, प्रधानमंत्री आवास योजना, जल जीवन मिशन और उज्ज्वला जैसी योजनाओं ने बुनियादी सुविधाओं के विस्तार पर जोर दिया। सरकार का कहना है कि इन कार्यक्रमों ने जीवन स्तर में सुधार और गरीब परिवारों को सम्मानजनक जीवन देने में योगदान दिया है।
कोविड-19 महामारी इस कार्यकाल की सबसे बड़ी चुनौती रही। महामारी के दौरान मुफ्त राशन वितरण, नकद सहायता और वैक्सीनेशन अभियान को सरकार की प्रमुख उपलब्धियों में गिना जाता है। दूसरी ओर, महामारी की दूसरी लहर के दौरान स्वास्थ्य ढांचे पर पड़े दबाव और उससे जुड़े अनुभवों ने सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर महत्वपूर्ण प्रश्न भी खड़े किए।
राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में सरकार ने अधिक आक्रामक और निर्णायक दृष्टिकोण अपनाने का दावा किया है। बालाकोट एयर स्ट्राइक, जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का निर्णय तथा रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता पर जोर इसी परिप्रेक्ष्य में देखे जाते हैं। समर्थकों के अनुसार इससे भारत की रणनीतिक स्थिति मजबूत हुई है, जबकि आलोचक कुछ निर्णयों के दीर्घकालिक राजनीतिक और सामाजिक प्रभावों पर चर्चा करते हैं।
विदेश नीति में भारत की सक्रिय भूमिका, G20 की अध्यक्षता, वैश्विक दक्षिण की आवाज़ के रूप में प्रस्तुति तथा प्रमुख शक्तियों के साथ संबंधों का विस्तार इस अवधि की उल्लेखनीय विशेषताएं रही हैं। इससे भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रोफाइल में वृद्धि हुई है।
डिजिटल परिवर्तन भी इस दौर की प्रमुख पहचान बना। UPI आधारित भुगतान प्रणाली ने वित्तीय लेनदेन के तरीके को बदल दिया और भारत को डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के वैश्विक उदाहरण के रूप में स्थापित किया। आज डिजिटल भुगतान, सरकारी सेवाओं की पहुंच और स्टार्टअप इकोसिस्टम भारतीय अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुके हैं।
इन 12 वर्षों का समग्र आकलन यह दर्शाता है कि भारत ने कल्याणकारी योजनाओं के वितरण, डिजिटल शासन, आधारभूत संरचना और वैश्विक उपस्थिति के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखे हैं। साथ ही रोजगार, आय असमानता, कृषि संकट, संघीय संबंधों और संस्थागत संतुलन जैसे मुद्दे भी राजनीतिक एवं सार्वजनिक बहस के केंद्र में बने हुए हैं।
बहरहाल, मोदी सरकार के 12 वर्षों को केवल उपलब्धियों या केवल आलोचनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि एक ऐसे दौर के रूप में देखा जाना चाहिए जिसने भारतीय राजनीति, शासन और विकास की दिशा को गहराई से प्रभावित किया है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।