इंडिया गठबंधन: आखिर इस बिखराव के बीच एकजुटता की राह कैसे निकलेगी?
सुखेंदु शेखर के बाद अब तृणमूल कांग्रेस की सांसद सुष्मिता देव ने भी पार्टी और राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। वह जल्द भाजपा की हो जाएंगी। 28 वर्षों के संघर्ष से उपजी ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ताश के पत्ते की तरह बिखर रही है। चुनाव नतीजे के महज एक महीने बाद ही पार्टी में बगावत इस कदर बढ़ गई है कि अब ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी कांग्रेस की शरण में हैं।
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सुखेंदु शेखर के बाद अब तृणमूल कांग्रेस की सांसद सुष्मिता देव ने भी पार्टी और राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। वह जल्द भाजपा की हो जाएंगी। 28 वर्षों के संघर्ष से उपजी ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ताश के पत्ते की तरह बिखर रही है। चुनाव नतीजे के महज एक महीने बाद ही पार्टी में बगावत इस कदर बढ़ गई है कि अब ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी कांग्रेस की शरण में हैं। विपक्षी एकजुटता की कोशिशों के बीच ममता दिल्ली में दो बार सोनिया गांधी से मिल चुकी हैं। अभिषेक बनर्जी ने भी राहुल गांधी से मुलाकात की। बताया तो यह जा रहा है कि भेंट-मुलाकात का यह सिलसिला विपक्षी दलों को और मजबूत करने की कोशिश भर है लेकिन सियासी गलियारे में यह चर्चा आम है कि अब तृणमूल और कांग्रेस एक होने जा रही हैं।
दरअसल यह महज संयोग ही है कि जब विपक्षी इंडिया गठबंधन एकजुटता की पटकथा लिख रहा था तभी क्षेत्रीय क्षत्रप ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस में बड़ी फूट पड़ गई। तृणमूल कांग्रेस के 80 में से 58 विधायक और 28 में से 20 तृणमूल सांसद बागी हो गए। बगावती तेवर अख्तियार करने वाली कोकिला घोष साफ कर चुकी हैं कि उनके साथ 20 तृणमूल सांसद भाजपा-एनडीए का साथ देंगे। तृणमूल के इन बागी विधायकों-सांसदों पर दल-बदल कानून की तलवार का भी डर नहीं है। ऐसे में माना जा रहा है कि पश्चिम बंगाल भी महाराष्ट्र के नक्शे कदम पर चल पड़ा है।
पश्चिम बंगाल की तरह ही महाराष्ट्र में शरद पवार के राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में दरार पड़ी और अजित पवार शरद पवार से अलग हो गए। शिवसेना में उद्धव ठाकरे के खिलाफ एकनाथ शिंदे ने बगावत कर दी और शिवसेना दो फाड़ हो गई। अदालत और चुनाव आयोग की लड़ाई के बाद असली एनसीपी अजित पवार और असली शिवसेना एकनाथ शिंदे साबित हो गए।
ऐसा नहीं कि बगावत के ऐसे किस्से सिर्फ क्षेत्रीय दलों में ही हैं। 1995 में गुजरात में भाजपा को भी शंकर सिंह वघेला से ऐसी ही बगावत का सामना करना पड़ा था, तो 1969 में इंदिरा गांधी के समय कांग्रेस टूट गई। मध्यप्रदेश में कमलनाथ को छोड़कर ज्योतिरादित्य सिंधिया बागी हो गए तो राजस्थान में अशोक गहलोत के खिलाफ सचिन पायलट। आम आदमी पार्टी भी राघव चड्ढा की बगावत के बाद पंजाब में सियासी संकट के दौर से गुजर रही है। केजरीवाल दिल्ली का राजपाट गंवा चुके हैं। ममता बंगाल हार चुकी हैं।
तमिलनाडु में डीएमके सत्ता से बेदखल है, तो केरल में वाम दल का आखिरी किला ढह चुका है। ऐसे में विपक्षी एकजुटता की पहल मजबूरी भी है और जरूरी भी। लेकिन 2024 लोकसभा चुनाव से पहले जब साझा विपक्षी इंडिया गठबंधन की सुगबुगाहट हुई तो नीतीश कुमार ने बढ़-चढ़कर अगुवाई की । 8 फरवरी 2023 को इंडिया गठबंधन ने आकार तो ले लिया लेकिन सूत्रधार नीतीश को इसका संयोजक नहीं बनाया गया । अंततः नीतीश ने कदम पीछे खींच लिए और वापस एनडीए के साथ चले गए । इधर इंडिया गठबंधन में सभी की अपनी डफली-अपना राग का सिलसिला जारी रहा। इंडिया गठबंधन बनने के बाद 2023 से अब तक के हुए चुनावों में कहीं भी विपक्ष एकजुट नहीं दिखा और बारी-बारी से दिल्ली, राजस्थान, मध्यप्रदेश, हरियाणा, छत्तीसगढ़, बिहार, बंगाल के विधानसभा चुनावों में उसे हार का सामना करना पड़ा।
अब जब विपक्ष ने फिर से एकजुट होने की ठानी है, तभी इंडिया गठबंधन की ताजा बैठक से आम आदमी पार्टी और द्रमुक ने दूरी बना ली। शुरू में इंडिया गठबंधन में 26 दल थे, जो घटकर 23 हो गए हैं। जदयू पहले से अलग है और आप, द्रमुक ने अब अलग राह पकड़ रखी है। इंडिया गठबंधन बने तीन साल तीन महीने बीत गए लेकिन आज तक संयोजक के नाम पर सहमति नहीं बन सकी। अभी भी इन दलों को जुटाने-मिलाने में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की भूमिका ही रहती है । करीब दस महीने बाद इंडिया गठबंधन के जुटे नेताओं में गिले-शिकवे का दौर ज्यादा रहा। हालांकि, दिल्ली अभी दूर है। लोकसभा चुनाव 2029 में होंगे। उससे पहले सबसे बड़ा चुनाव यूपी का अगले साल 2027 में होने वाला है। यूं भी दिल्ली की राह यूपी से होकर गुजरती है। इससे पहले संसद का मानसून सत्र अब आने ही वाला है।
विपक्षी फूट से संसद के मानसून सत्र से पहले सत्ता पक्ष की स्थिति और मजबूत होती दिख रही है। राज्यसभा चुनाव में भी मध्यप्रदेश और झारखंड में विपक्ष को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में विपक्षी एकजुटता की परीक्षा की घड़ी बार-बार आने वाली है लेकिन उससे ज्यादा चुनौती है विपक्षी दलों को अपने-अपने दलों के भीतर उपज रहे अंसतोष और बगावत को थामने की।
केजरीवाल और ममता की मिसाल सामने है। यदि कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन न होता तो शायद कांग्रेस को वहां भी नाटक का सामना करना पड़ता। ऐसे में यदि दलों के भीतर दिल ही नहीं मिलेंगे तो कमजोर कड़ियों को जोड़कर मजबूत विपक्षी किले के सपने भला कैसे साकार हो सकेंगे, ताश के पत्तों की तरह भरभराकर बिखरने का डर तो बना रहेगा। ऐसे में विपक्षी दलों के बीच एकजुटता की चुनौती जितनी बाहर है, उतनी ही अंदर भी।