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जीवन के कैनवास को खाली मत छोड़िए: डर नहीं, साहस के रंगों से बनता है जीवन का चित्र
ऑस्कर वाइल्ड, अमर उजाला नेटवर्क
Published by: नितिन गौतम
Updated Wed, 10 Jun 2026 07:57 AM IST
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सार
सबसे बड़ी त्रासदी चित्र का बिगड़ जाना नहीं है, सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि मनुष्य डर के कारण ब्रश ही हाथ में न ले। जीवन आखिर में केवल उन रंगों को याद रखता है, जिन्हें हमने साहसपूर्वक चुना था।
ब्लॉग
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
मनुष्य इस संसार में किसी पूर्ण चित्र की तरह जन्म नहीं लेता। वह किसी संग्रहालय की दीवार पर टंगी हुई तैयार कृति भी नहीं है, जिसे केवल देखा जाए और सराहा जाए। मनुष्य तो एक खाली कैनवास है, भयावह रूप से खाली और उसी कारण असीम रूप से सुंदर। ईश्वर, प्रकृति या जो भी अदृश्य शक्ति हमें यहां भेजती है, वह हमें केवल सफेद विस्तार देती है, कोई निश्चित आकृति, अंतिम अर्थ या तय रंग नहीं। बाकी सब तो हमें खुद करना होता है। और यही स्वतंत्रता मनुष्य का सबसे बड़ा उपहार भी है और सबसे बड़ा अभिशाप भी। अधिकांश लोग अपने कैनवास को लगभग वैसा ही छोड़ देते हैं, जैसा उन्हें मिला था। वे दूसरों के बनाए हुए रंग उधार लेते हैं।
समाज उनसे कहता है- यह रंग शालीन है, धर्म कहता है- यह रंग पवित्र है, परिवार कहता है- यह रंग सुरक्षित है। और इस तरह धीरे-धीरे उनका जीवन किसी कलाकार की रचना नहीं, बल्कि किसी सरकारी दफ्तर की पपड़ी उतरती दीवार-सा बन जाता है। दुख संसार का सबसे गलत समझा गया रंग है। लोग उससे बचते हैं, जैसे कोई चित्रकार काले रंग से डरता-बचता हो। लेकिन बिना गहरे रंगों के कोई चित्र कभी गहराई प्राप्त नहीं करता। जिस व्यक्ति ने पीड़ा नहीं जानी, उसने अपनी आत्मा के गुप्त कक्ष नहीं देखे। दुख हमें तोड़ता अवश्य है, परंतु उसी टूटन से प्रकाश भीतर प्रवेश करता है। और जहां तक प्रेम की बात है, तो प्रेम वह रंग है, जिसे मनुष्य सबसे अधिक चाहता भी है और सबसे अधिक नष्ट भी करता है।
लोग प्रेम को सुरक्षा बनाना चाहते हैं, जबकि प्रेम स्वभाव से ही जोखिम है। असफल प्रेम भी उस जीवन से अधिक सुंदर है, जिसमें किसी ने प्रेम करने का साहस ही न किया हो। सपने क्या हैं? सपने मनुष्य की आत्मा के रंग हैं। सपनों के बिना तो मनुष्य केवल गणना करने वाली मशीन बन कर रह जाता! और पागलपन! वह शब्द जिससे समाज हर उस व्यक्ति को दंडित करता है, जो सामान्य होने से इन्कार कर दे। इतिहास में हर सुंदर चीज को कभी न कभी पागल कहा गया। कवि पागल, चित्रकार पागल, प्रेमी पागल। सामान्य लोग संसार को वैसा ही स्वीकार कर लेते हैं जैसा वह है, लेकिन कलाकार उस संसार की कल्पना करता है, जैसा वह हो सकता है।
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कितने लोग हैं, जो भीतर से संगीत सुनते हैं, परंतु नृत्य नहीं करते। और अंत में उनका कैनवास लगभग खाली रह जाता है, सुरक्षित, स्वच्छ और पूरी तरह अर्थहीन। मनुष्य को अपने जीवन का कलाकार होना चाहिए, उसका चौकीदार नहीं। और शायद मृत्यु के क्षण में ईश्वर हमसे यह नहीं पूछेगा कि हमने कितना सुरक्षित जीवन जिया। वह शायद सिर्फ यह देखेगा कि हमने अपने कैनवास को कितनी निडरता से भरा। सबसे बड़ी त्रासदी चित्र का बिगड़ जाना नहीं है, सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि मनुष्य डर के कारण ब्रश ही हाथ में न ले। जीवन यह याद नहीं रखता कि हमने कितनी सावधानी बरती थी, वह केवल उन रंगों को याद रखता है, जिन्हें हमने साहसपूर्वक चुना था।
डर के बावजूद बढ़ें
मनुष्य का जीवन एक खाली कैनवास की तरह है, जिसकी सुंदरता उसके साहसपूर्वक उठाए गए कदमों में है। जो व्यक्ति भय, असफलता, पीड़ा और प्रेम से बचता रहता है, वह शायद गलतियों से बच जाए, पर जीवन की गहराई भी खो देता है। जीवन उन लोगों को याद रखता है, जिन्होंने डर के बावजूद अपने हाथों में ब्रश उठाया और अपनी अनूठी कहानी रच दी।
समाज उनसे कहता है- यह रंग शालीन है, धर्म कहता है- यह रंग पवित्र है, परिवार कहता है- यह रंग सुरक्षित है। और इस तरह धीरे-धीरे उनका जीवन किसी कलाकार की रचना नहीं, बल्कि किसी सरकारी दफ्तर की पपड़ी उतरती दीवार-सा बन जाता है। दुख संसार का सबसे गलत समझा गया रंग है। लोग उससे बचते हैं, जैसे कोई चित्रकार काले रंग से डरता-बचता हो। लेकिन बिना गहरे रंगों के कोई चित्र कभी गहराई प्राप्त नहीं करता। जिस व्यक्ति ने पीड़ा नहीं जानी, उसने अपनी आत्मा के गुप्त कक्ष नहीं देखे। दुख हमें तोड़ता अवश्य है, परंतु उसी टूटन से प्रकाश भीतर प्रवेश करता है। और जहां तक प्रेम की बात है, तो प्रेम वह रंग है, जिसे मनुष्य सबसे अधिक चाहता भी है और सबसे अधिक नष्ट भी करता है।
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लोग प्रेम को सुरक्षा बनाना चाहते हैं, जबकि प्रेम स्वभाव से ही जोखिम है। असफल प्रेम भी उस जीवन से अधिक सुंदर है, जिसमें किसी ने प्रेम करने का साहस ही न किया हो। सपने क्या हैं? सपने मनुष्य की आत्मा के रंग हैं। सपनों के बिना तो मनुष्य केवल गणना करने वाली मशीन बन कर रह जाता! और पागलपन! वह शब्द जिससे समाज हर उस व्यक्ति को दंडित करता है, जो सामान्य होने से इन्कार कर दे। इतिहास में हर सुंदर चीज को कभी न कभी पागल कहा गया। कवि पागल, चित्रकार पागल, प्रेमी पागल। सामान्य लोग संसार को वैसा ही स्वीकार कर लेते हैं जैसा वह है, लेकिन कलाकार उस संसार की कल्पना करता है, जैसा वह हो सकता है।
कितने लोग हैं, जो भीतर से संगीत सुनते हैं, परंतु नृत्य नहीं करते। और अंत में उनका कैनवास लगभग खाली रह जाता है, सुरक्षित, स्वच्छ और पूरी तरह अर्थहीन। मनुष्य को अपने जीवन का कलाकार होना चाहिए, उसका चौकीदार नहीं। और शायद मृत्यु के क्षण में ईश्वर हमसे यह नहीं पूछेगा कि हमने कितना सुरक्षित जीवन जिया। वह शायद सिर्फ यह देखेगा कि हमने अपने कैनवास को कितनी निडरता से भरा। सबसे बड़ी त्रासदी चित्र का बिगड़ जाना नहीं है, सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि मनुष्य डर के कारण ब्रश ही हाथ में न ले। जीवन यह याद नहीं रखता कि हमने कितनी सावधानी बरती थी, वह केवल उन रंगों को याद रखता है, जिन्हें हमने साहसपूर्वक चुना था।
डर के बावजूद बढ़ें
मनुष्य का जीवन एक खाली कैनवास की तरह है, जिसकी सुंदरता उसके साहसपूर्वक उठाए गए कदमों में है। जो व्यक्ति भय, असफलता, पीड़ा और प्रेम से बचता रहता है, वह शायद गलतियों से बच जाए, पर जीवन की गहराई भी खो देता है। जीवन उन लोगों को याद रखता है, जिन्होंने डर के बावजूद अपने हाथों में ब्रश उठाया और अपनी अनूठी कहानी रच दी।