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चुनाव परिणाम और सरकार बनाने के समीकरण में बदलती सियासत

लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हरि वर्मा Updated Fri, 08 May 2026 04:47 PM IST
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सार

Tamil nadu Political Crisis: बंगाल में ममता ने मुख्यमंत्री पद न छोड़ने की जिद कर संवैधानिक संकट पैदा किया। बंगाल संकट से उबर गया लेकिन तमिलनाडु में नई सरकार के गठन को लेकर संकट बरकरार है। ऐसे में संवैधानिक परंपराओं का निर्वाह कर लोकतंत्र की मर्यादा बहाल हो।
 

Democracy vs Power Politics: Why Bengal and Tamil Nadu Sparked Constitutional Debate
टीवीके प्रमुख विजय - फोटो : ANI
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विस्तार

जनादेश के बाद उपजे सांविधानिक संकट से पश्चिम बंगाल उबर चुका है। पराजय के बावजूद ममता ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा न देने की जिद कर संवैधानिक परंपरा का निर्वाह नहीं किया। सांविधानिक व्यवस्था के तहत उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। नई सुबह के साथ नई सरकार बन रही है। इस बार के जनादेश के बाद दूसरा संवैधानिक संकट वाला राज्य तमिलनाडु है, जहां नई सुबह और नई सरकार के गठन का इंतजार है।  

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सांविधानिक परंपराओं को चोट
लोकतंत्र की परिभाषा है- जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा। लोकतंत्र के महापर्व के बाद बंगाल और तमिलनाडु में जनादेश के बाद जो परिस्थितियां उपजीं, वह कतई लोकतांत्रिक नहीं। हैरानी तो यह है कि दोनों जगह संवैधानिक पदों पर आसीन लोगों द्वारा ही सांविधानिक परंपराओं को चोट पहुंची है। बंगाल में ममता बनर्जी ने मुख्यमंत्री का पद छोड़ने से इनकार कर दिया। उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। लोकतंत्र के इतिहास में ममता पहली ऐसे मुख्यमंत्री हो गईं जिन्होंने जनादेश को नकारा।
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सियासत बनाम जनादेश

ममता से पहले भी कई मुख्यमंत्रियों ने पद छोड़ने से इन्कार कर दिया था लेकिन उसकी सियासी वजह थी । शराब घोटाले में जब दिल्ली में केजरीवाल उलझे थे, तब भी उन्होंने सीएम पद न छोड़ने की धमकी दी थी। हालांकि बाद में उन्होंने आतिशी (चेहरा-मोहरा) पारी शुरू की। बिहार में 2014 में नीतीश ने जीतन राम मांझी को सीएम (चेहरा-मोहरा) बनाया। 2015 में जब नीतीश फिर से सीएम बनना चाहें तो मांझी ने उनके लिए कुर्सी खाली करने से इनकार कर दिया। भस्मासुर साबित हो रहे मांझी को नीतीश ने पार्टी से किनारा किया। मांझी विधानसभा में अपने बूते बहुमत साबित नहीं कर पाए। इसी तरह कर्नाटक में 2007 में भाजपा-जद (एस) के बीच ढाई-ढाई साल का सत्ता समझौता हुआ। अपने हिस्से का कार्यकाल पूरा करने के बाद जद एस के कुमारस्वामी ने बारी आने पर भाजपा के येदियुरप्पा के लिए कुर्सी नहीं छोड़ी। दिल्ली, बिहार और कर्नाटक के ये घटनाक्रम आपसी सियासी उठापठक वाले थे लेकिन बंगाल में ममता ने जो किया, वह सीधे-सीधे जनादेश का अपमान था।


बंगाल के बाद तमिलनाडु में संकट
तमिलनाडु में भी संवैधानिक संकट बरकरार है । नई सरकार के गठन को लेकर पेंच फंसा है। सबसे बड़ी पार्टी के नाते टीवीके के विजय दो-दो बार राज्यपाल से मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश कर चुके हैं। विजय की झोली में 234 में से 107 विधायक और खुद दो जगह सीट मिलाकर 108 सीटें हैं। कांग्रेस ने भी उन्हें समर्थन दे दिया है। कांग्रेस के 5 विधायकों को मिलाकर विजय के पास 113 विधायक हैं, जबकि बहुमत के लिए 118 विधायकों की दरकार है। ऐसे में दावेदारी के बावजूद वहां के राज्यपाल विजय को सरकार बनाने नहीं दे रहे हैं।

राज्यपाल उन से बहुमत वाले गणित के हिसाब से 118 विधायकों का समर्थन चाहते हैं। हालांकि सांविधानिक परंपरा रही है कि बहुमत न मिलने की सूरत में सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने का मौका मिले और उसे सदन में बहुमत साबित करने के लिए कुछ मोहलत। नई सरकार के गठन के लिए महज 36 घंटे बचे हैं और राज्यपाल-टीवीके के बीच 36 का रिश्ता बरकरार है।

यदि वहां विजय को सरकार बनाने का मौका नहीं मिलता है तो यह मामला भी अदालत तक पहुंचेगा। गौरतलब है कि एस आर बोम्मई मामले में सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट आदेश है कि बहुमत सदन में साबित करना होता है। ऐसे में क्या तमिलनाडु के राज्यपाल जनादेश से उभरी सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने से रोक कर सांविधानिक परंपरा में खलल डाल रहे हैं।

बोने- काटने का खेल
तमिलनाडु की यह घटना क्या पहले जो बोया गया, उसके काटने का खेल है। 1998 में केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार बनाना चाहते थे। उन्हें बहुमत नहीं था। जयललिता से समर्थन की चिट्ठी नहीं मिली तो उन्हें भी दो दिन इंतजार करना पड़ा। 2005 में झारखंड में भाजपा बड़ी पार्टी थी लेकिन वहां के राज्यपाल ने झामुमो को कम सीटों (17) के बाद भी सरकार बनाने का मौका दे डाला। मामला अदालत पहुंचा। कोर्ट ने वहां के राज्यपाल के इस फैसले पर सवाल उठाया। आखिरकार कम सीटों के बाद भी बनी झामुमो की सरकार भी केंद्र में वाजपेयी सरकार की तर्ज पर औंधे मुंह गिर पड़ी।

यूपी में कल्याण सिंह बनाम जगदंबिका पाल की घटना भी उल्लेखनीय है। अदालत ने जगदंबिका पाल से इस्तीफा ले लिया था। 2018 में कर्नाटक में येदियुरप्पा सरकार को भी मुसीबत झेलनी पड़ी । ये घटनाएं गवाह हैं कि अदालतों ने हमेशा लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए बड़े दल का पक्ष रखा। सदन ने भी कोई पक्षपात नहीं किया और बहुमत के अभाव में सरकारें गिरीं।  

तमिलनाडु में पहल हो
ताजा घटनाक्रम तमिलनाडु का है। राज्यपाल स्थिर सरकार का हवाला देकर टीवीके के विजय की सरकार की दावेदारी को लेकर संशय में हैं। हालांकि, बहुमत से पहले विधायकों के समर्थन या परेड कराने की कोई सांविधानिक परंपरा नहीं है। खरीद-फरोख्त (हार्स ट्रेडिंग) या बराबरी की दावेदारी की स्थिति में ही विधायकों की परेड कराई जाती रही है। महाराष्ट्र में 2019 में विधायकों की परेड, तो बिहार व गोवा में समर्थित विधायकों  की मौजूदगी की घटना हो चुकी है।

एसआर बोम्मई मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा था कि राज्यपाल का काम विधायकों को गिनना नहीं बल्कि सदन में बहुमत परीक्षण कराना है। ऐसे में तमिलनाडु में जो संवैधानिक संकट है, वह चिंता का सबब है। राज्यपाल को इस जनादेश को देखते हुए परंपराओं का निर्वाह कर नई सरकार के गठन की दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए वरना 10 मई के बाद वहां कार्यकाल खत्म हो जाएगा और संवैधानिक संकट की सूरत में राष्ट्रपति शासन या फिर से चुनाव की तलवार लटक जाएगी। जहां एक देश, एक चुनाव के सपने बुने जा रहे हों, वहां बार-बार चुनाव की स्थिति पैदा होना भी खतरनाक है। ऐसे में बंगाल के सीएम ममता का मामला हो या तमिलनाडु के राज्यपाल का, सांविधानिक पदों पर आसीन लोगों की ज्यादा जिम्मेदारी बनती है कि वे लोकतंत्र की परिभाषा जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा हासिल जनादेश का सम्मान करें और हमेशा सबसे बड़े लोकतंत्र पर गौरवान्वित रहें।

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 

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