देव की डायरी: डिजिटल श्रद्धा के दौर में कतार का श्राद्ध काल
डिजिटल श्रद्धा के इस दौर में जिंदगी से कतारें गायब हो रही हैं। लेकिन कतार हमें बराबरी सिखाती थी और हम बराबरी को भी अपने हिसाब से समझते थे। हम चाहते थे कि सब बराबर हों, बस हम थोड़े अधिक बराबर रहें। इसीलिए हम जहां खड़े होते थे, तो जान लगा देते थे कि कतार वहीं से शुरू हो।
भारतीय कतार में दो लोगों के बीच हवा गुजरने की जगह भी नहीं होती थी। आगे वाला जैसे ही आधा इंच आगे खिसकता, पीछे वाला अपनी पूरी तोंद और छाती के दबाव से उसकी पीठ पर चढ़ जाता था। यह कोई धक्का-मुक्की नहीं थी, यह 'परम स्नेह' था।
उस कतार में एक जीवंतता होती थी। आगे वाले की पीठ की गंध से हम उसकी आर्थिक स्थिति का अंदाजा लगा लेते थे। पीछे वाले की कोहनी की चुभन से समझ आ जाता था कि देश में बेरोजगारी का स्तर क्या है। लेकिन अब हमारी जिंदगी में कतार ने 'भौतिक रूप' त्याग कर 'डिजिटल आत्मा' धारण कर ली है।
विस्तार
कतारें या तो गायब हो रही हैं या छोटी हो रही हैं। कतार का गायब होना भारतीय अध्यात्म की बड़ी हार है। कुछ वर्ष पहले तक कतार सिर्फ टिकट या राशन पाने का साधन नहीं थी, वह धैर्य-योग की प्रयोगशाला थी। अपने देश में कतार वह अखाड़ा था, जहां हर आदमी मुकाबले में नहीं, सिर्फ कब्जा करने उतरता था। तब हर आदमी के कान में कालिया का डायलॉग गूंजता था- "हम जहां खड़े हो जाते हैं, लाइन वहीं से शुरू होती है।"
प्रगति को महसूस करने वाले कहते हैं कि यह कतार का श्राद्ध काल है। जिस देश ने दुनिया को शून्य दिया, उसी ने इंसान को कतार में खड़ा करके उसकी कीमत भी शून्य बनाना सिखाया था। लेकिन सच्चाई यह भी है कि वे कतारें अक्सर थकान, समय की बर्बादी और अव्यवस्था से भरी होती थीं। धक्का-मुक्की में कई बार बुजुर्ग और कमजोर पीछे छूट जाते थे।
कतारों की 'डिजिटल आत्मा'
अब कतारें लुप्त नहीं हुईं, उन्होंने 'भौतिक रूप' त्याग कर 'डिजिटल आत्मा' धारण कर ली है। रेलवे की कतार में तीन घंटे खड़े रहकर आदमी जान जाता था कि संसार नश्वर है, बाबू सनकी है और कन्फर्म टिकट सिर्फ किस्मत वालों को मिलता है।
अब आईआरसीटीसी नाम का भूत खड़ा है, जहां कोई आदमी नहीं दिखता, पर एक खास समय पर पूरे देश की उंगलियां की-बोर्ड पर तांडव करने लगती हैं। आदमी घर बैठे कतार में लगा है। डिजिटल व्यवस्था ने बुजुर्गों और विकलांगों के लिए काम आसान जरूर बना दिया है।
याद करें पुराना जमाना। सुबह-सुबह थैला लटकाकर राशन या टिकट की कतार में लगने वाले का चेहरा संत जैसा गंभीर होता था। दो लोगों के बीच हवा की जगह नहीं होती थी। आगे वाला आधा इंच खिसके तो पीछे वाला तोंद और छाती के दबाव से उसकी पीठ पर चढ़ जाता। यह धक्का-मुक्की नहीं, परम स्नेह था। अगर आप आगे वाले की पीठ से सटे नहीं तो मतलब आप कतार के प्रति निष्ठावान नहीं और बीच की आधी इंच जगह में कोई तीसरा अमिताभ जन्म ले सकता था। उस कतार में जीवंतता थी।
आगे वाले की पीठ की गंध से आर्थिक स्थिति का अंदाजा लग जाता, पीछे वाले की कोहनी से बेरोजगारी का स्तर समझ आ जाता। बहस होती, झगड़े होते, कभी-कभी शादियां तक तय हो जातीं। आदमी आगे बढ़ने की कला, पीछे हटने की विवशता और बीच में परिचित देखकर नियम भूलने की सुविधा सीखता था।
कतार के विशेषज्ञ
हर गांव में कतार के विशेषज्ञ होते थे। मेरे गांव मोतिया में गुजरी गुरु सबसे बड़े थे। देवी दर्शन की छोटी कतार देख मायूस होकर बोले- "कतार प्रथा के लुप्त होने से सबसे बड़ा नुकसान जुगाड़शास्त्र को हुआ।" फर्स्ट डे फर्स्ट शो के लिए टिकट कटाने में उनकी प्रतिभा देखकर लोग उस्ताद मानते थे। वह बताते, "पहले कतार में घुसने की दस विधियां थीं। सबसे आगे वाले को दूर का रिश्तेदार बना लेना सबसे लोकप्रिय था। रेलवे काउंटर पर अनजान बुजुर्ग को सहारा देकर आगे पहुंच जाना भी एक तरीका था।"
गुजरी गुरु कहते हैं, "दो दशक पहले भारतीयों को कतार में खड़े होने की आदत थी। राशन, टिकट, अस्पताल, मंदिर, बैंक- कहीं सुविधा न हो तो तुरंत कतार बना लेते। लेकिन खड़े होना और हिस्सा बनना अलग बातें हैं। आगे दस आदमी हों तो व्यवस्था खराब लगती, पीछे बीस हों तो व्यवस्था अच्छी लगती थी।"
सबसे बड़ी समस्या यह थी कि हर भारतीय को अपनी कतार छोटी और दूसरे की लंबी चाहिए होती। सामने वाली लाइन तेजी से बढ़े तो देशभक्ति जाग जाती। गर्दन घुमाकर देखते और कहते, "उधर जल्दी हो रहा है।" फिर शरीर भी उधर मुड़ जाता। कतार बदलना अवसरवाद को जगाता। कुछ देर पहले तक धैर्य से झेल रहे थे, अचानक वही गलत लगने लगती। सामने वाली में घुसकर गर्व होता, जैसे कोई राष्ट्रीय उपलब्धि हासिल की हो।
कतार में हर आदमी निरीक्षक होता है। किसी को आगे बढ़ते देख आवाज आती- "भाई साहब, लाइन पीछे से है।" यह वाक्य संविधान जगा देता। कतार बराबरी सिखाती और हम बराबरी को अपने हिसाब से समझते। सब बराबर हों, बस हम थोड़े अधिक बराबर रहें। जहां खड़े होते, जान लगा देते कि कतार वहीं से शुरू हो। कोई पहले खड़ा मिले तो वह गलत जगह खड़ा आदमी था।
डिजिटल युग और कतारें
खड़े-खड़े देश बदलने की बातें करते, फिर जगह खाली होते ही देश को थोड़ा अपने पक्ष में बदल लेते। डिजिटल युग ने सुविधा दे दी कि घर बैठे टिकट लें, बिल जमा करें, खाना मंगाएं, बैंक का काम करें, लेकिन कतार समाप्त नहीं हुई। अब वह मोबाइल के भीतर चली गई है। पहले सामने खड़े लोगों को गिनते थे, अब स्क्रीन पर बारी देखते हैं, ओटीपी ढूंढ़ते हैं।
कतार के साथ धैर्य चला गया, बातचीत चली गई और वह अनुभव भी, जब चार घंटे खड़े रहने के बाद पता चलता कि आज छुट्टी है। अब एप खुद बता देता है- सर्वर डाउन है। अब सब जल्दी में हैं। कतार की जगह ले ली है रिफ्रेश बटन ने। सिर्फ भंडारे में कतार अभी दिखाई देती है, क्योंकि तकनीक भूख को पूरी तरह हरा नहीं पाई है। मतदान में लंबी कतार देखकर कुछ चेहरे खुश भी होते हैं।
हमने जीवन को कतार मुक्त बनाने के लिए इंटरनेट पैदा कर दिया। टिकट, पैसा, सामान, खाना- सब घर बैठे आ गया। प्रेम में भी मिलने से पहले लोकेशन भेजी जाने लगी, लेकिन लोकतंत्र को हमने अभी तक कतार में ही रखा है।
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