फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Kerala Governor Om Prakash Mathur banned non-vegetarian food in the Lok Bhavan kitchen

वेज या नॉनवेज : भोजन की थाली पर सियासत क्यों?

Mon, 26 Oct 2026 12:31 PM IST
Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Mon, 26 Oct 2026 12:31 PM IST
सार

भोजन को लेकर विवाद इसलिए जल्दी बढ़ जाते हैं, क्योंकि यह विषय लोगों की आस्था, परिवार और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा है। राजनीतिक दल भी कई बार ऐसे मुद्दों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करते हैं, लेकिन जब हर घटना को विचारधारा की लड़ाई बना दिया जाता है तो मूल सवाल पीछे छूट जाता है।

विज्ञापन
Kerala Governor Om Prakash Mathur banned non-vegetarian food in the Lok Bhavan kitchen
 के.सी. वेणुगोपाल, कांग्रेस के महासचिव - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

भारत में भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, अपितु हमारी परंपराओं और क्षेत्रीय पहचान का भी हिस्सा है। कहीं शाकाहार जीवनशैली और आस्था से जुड़ा है तो कहीं मछली-मांस रोजमर्रा के खान-पान और पारिवारिक परंपरा का हिस्सा है। देश में भोजन की इतनी विविधता है कि किसी एक तरीके को पूरे भारत की पहचान नहीं बनाया जा सकता। इसके बावजूद खान-पान को लेकर बार-बार राजनीतिक विवाद खड़े होते हैं।

विज्ञापन


कभी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का मेन्यू मुद्दा बन जाता है, कभी धार्मिक उपदेश पर टकराव शुरू हो जाता है और कभी किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की निजी पसंद पर सवाल उठने लगते हैं। आखिर भोजन की थाली को सियासत का अखाड़ा बनाने की जरूरत क्यों है?
विज्ञापन


हाल के दिनों में तीन घटनाओं ने इस सवाल को फिर चर्चा में ला दिया है।
 

  • सितंबर 2026 में नई दिल्ली में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान नेताओं के लिए आयोजित रात्रिभोज में केवल शाकाहारी व्यंजन परोसे गए। इसके बाद राहुल गांधी और कांग्रेस के अन्य नेताओं ने मेन्यू को लेकर सवाल उठाए।
  • विज्ञापन
    विज्ञापन
  • पश्चिम बंगाल में बागेश्वर धाम के प्रमुख धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की दुर्गा पूजा के दौरान मछली-मांस न खाने की अपील पर विवाद हुआ।
  • अब केरलम के नए राज्यपाल ओम प्रकाश माथुर के लोकभवन की रसोई में शाकाहारी भोजन बनाए जाने के निर्देश पर कांग्रेस ने आपत्ति जताई है।


तीनों घटनाओं का संदर्भ अलग है, लेकिन इनसे जुड़ा बड़ा सवाल एक ही है, खान-पान की पसंद को राजनीतिक संघर्ष में क्यों बदला जाए?

सितंबर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली के भारत मंडपम में ब्रिक्स नेताओं और प्रतिनिधियों के लिए रात्रिभोज आयोजित किया। इसमें कंडवी, मशरूम गलौटी, पनीर लबाबदार, हिमालयी गुच्छी से बने व्यंजन, बाजरे का पुलाव और पारंपरिक मिठाइयों सहित कई शाकाहारी पकवान परोसे गए। मेन्यू पूरी तरह शाकाहारी था।

अगले दिन लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर लिखा कि भारत के 80 प्रतिशत लोग मांसाहारी हैं और भारतीय मांसाहारी भोजन स्वादिष्ट है। उन्होंने छोले-भटूरे की तस्वीर भी साझा की। कांग्रेस के दूसरे नेताओं ने इस टिप्पणी को ब्रिक्स रात्रिभोज के मेन्यू से जोड़ते हुए सरकार की आलोचना की।

भारत में व्यंजनों की विविधता

इस विवाद में दो बातें अलग-अलग समझने की जरूरत है। पहली, भारत की खान-पान संस्कृति शाकाहारी और मांसाहारी, दोनों तरह के व्यंजनों से समृद्ध है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर इस विविधता को सामने रखने के लिए विभिन्न विकल्प उपलब्ध कराना अच्छी मेजबानी का हिस्सा हो सकता है। दूसरी, किसी आयोजन में केवल शाकाहारी भोजन परोसे जाने को अपने आप में किसी विचारधारा को थोपने का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

ब्रिक्स सम्मेलन की मेजबानी भारत कर रहा था। ऐसे आयोजन में मेन्यू तय करना मेजबान की व्यवस्थाओं का हिस्सा है। भारत अपने क्षेत्रीय व्यंजनों, पारंपरिक पकवानों और मोटे अनाज से बने भोजन को दुनिया के सामने रख सकता है। शाकाहारी भारतीय भोजन भी हमारी पाक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उसे विदेशी मेहमानों के सामने प्रस्तुत करने में कोई अस्वाभाविक बात नहीं है।

हां, मेहमानों की खान-पान संबंधी जरूरतों और पसंद का ध्यान रखना भी अच्छी मेजबानी का तकाजा है। यदि अलग-अलग विकल्प उपलब्ध हों तो यह और बेहतर हो सकता है, लेकिन किसी मेन्यू पर सवाल उठाने और उसे राजनीतिक विचारधारा थोपने का मामला घोषित करने के बीच अंतर है।

इसी तरह, शाकाहारी मेन्यू को भारत की पूरी खाद्य संस्कृति का प्रतिनिधि मान लेना भी सही नहीं होगा। ब्रिक्स जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर चर्चा का केंद्र आर्थिक सहयोग, व्यापार, तकनीक और वैश्विक चुनौतियां होनी चाहिए। भोजन पर अपनी राय रखने का अधिकार सबको है, लेकिन एक मेन्यू को राजनीतिक टकराव का विषय बनाने से मूल मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।

केरलम का मामला क्यों चर्चा में?

केरलम के राज्यपाल ओम प्रकाश माथुर ने 24 अक्टूबर को राज्यपाल पद की शपथ ली। उनके कार्यभार संभालने के साथ ही लोकभवन की रसोई में केवल शाकाहारी भोजन तैयार करने का निर्देश चर्चा में आ गया। कांग्रेस महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने इसकी आलोचना करते हुए इसे व्यक्तिगत खान-पान की स्वतंत्रता से जोड़ा।

हालांकि, केरलम के मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से इस विवाद पर कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं आई, जबकि सीपीआई(एम) के राज्य सचिव एम.वी. गोविंदन ने भोजन की पसंद को व्यक्तिगत मामला बताया। इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात निर्देश का वास्तविक दायरा है।

वैसे, लोकभवन के सूत्रों के अनुसार राज्यपाल शाकाहारी हैं। यह निर्देश उस रसोई के लिए था, जहां उनके और उनके परिवार के लिए भोजन तैयार किया जाता है। कर्मचारियों के अपने खान-पान पर कोई रोक नहीं लगाई गई थी। कुछ समाचार रिपोर्टों में यह भी बताया गया कि कर्मचारियों को अपना भोजन घर से लाने या बाहर खाने की स्वतंत्रता है। यदि ऐसा है तो कांग्रेस के महासचिव इसे राजनीतिक रंग क्यों देना चाहते हैं?

पश्चिम बंगाल का मामला

सितंबर में पश्चिम बंगाल में बागेश्वर धाम के प्रमुख धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की दुर्गा पूजा के दौरान मछली-मांस न खाने की अपील पर विवाद हुआ था। कोलकाता में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने दुर्गा पूजा के अवसर पर मांसाहारी भोजन से दूर रहने की बात कही और ऐसा करने वालों पर भी टिप्पणी की। उनकी बात का विरोध हुआ, क्योंकि बंगाल में मछली वहां के खान-पान और सांस्कृतिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

यहां भी एक अंतर समझना जरूरी है। किसी धार्मिक वक्ता को शाकाहार के पक्ष में अपनी बात रखने और लोगों से उसका पालन करने की अपील करने का अधिकार है, लेकिन किसी की भोजन संबंधी पसंद को धार्मिकता की कसौटी बनाना अलग बात है। किसी व्यक्ति के भोजन के आधार पर उसे पाखंडी या कम धार्मिक बताना अनावश्यक विवाद पैदा कर सकता है।

धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की अपील पर असहमति रखने वालों को भी अपनी बात रखने का अधिकार है, लेकिन असहमति का जवाब तर्क से दिया जाना चाहिए, न कि अपमान या हिंसा से। लोकतंत्र में किसी विचार को रखने और उससे असहमत होने, दोनों की जगह है।

इस घटना से एक व्यापक सवाल भी सामने आता है। क्या किसी क्षेत्र की परंपराओं को समझे बिना वहां के लोगों को खान-पान के बारे में निर्देश देना उचित है? धार्मिक विचारों का आदान-प्रदान समाज का हिस्सा है, लेकिन किसी एक परंपरा को सबके लिए अनिवार्य मान लेना भारत की विविधता के अनुरूप नहीं है।

आस्था, परिवार और सांस्कृतिक पहचान का विषय

भोजन को लेकर विवाद इसलिए जल्दी बढ़ जाते हैं, क्योंकि यह विषय लोगों की आस्था, परिवार और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा है। राजनीतिक दल भी कई बार ऐसे मुद्दों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करते हैं, लेकिन जब हर घटना को विचारधारा की लड़ाई बना दिया जाता है तो मूल सवाल पीछे छूट जाता है। शा

काहार अपनाने वाला व्यक्ति अपनी मान्यता और पसंद के अनुसार जीवन जीता है। मांसाहार करने वाला व्यक्ति भी अपनी परंपरा और पसंद के अनुसार भोजन करता है। किसी एक को दूसरे से श्रेष्ठ बताने की जरूरत नहीं है। भोजन की पसंद के आधार पर किसी की देशभक्ति, नैतिकता या धार्मिकता का फैसला नहीं किया जा सकता।

हालांकि, सरकारी संस्थानों में वेज-नॉनवेज का सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है। वहां किसी व्यक्ति की निजी पसंद और संस्थान के नियमों में अंतर होना चाहिए। किसी अधिकारी की निजी भोजन व्यवस्था का सम्मान किया जा सकता है, लेकिन उस आधार पर दूसरों की स्वतंत्रता सीमित नहीं की जानी चाहिए।



ब्रिक्स सम्मेलन का मेन्यू हो, केरलम के राज्यपाल की रसोई हो या बंगाल में धार्मिक अपील पर हुआ विवाद, इन सभी मामलों को उनके वास्तविक संदर्भ में देखना चाहिए। जहां व्यवस्था में कमी हो, वहां सवाल उठने चाहिए। जहां व्यक्तिगत पसंद का मामला हो, वहां उसका सम्मान होना चाहिए। और जहां दूसरों की स्वतंत्रता पर रोक लगाने की बात हो, वहां तथ्यों के आधार पर आपत्ति दर्ज की जानी चाहिए।

राजनीति में असहमति स्वाभाविक है, लेकिन हर असहमति को वैचारिक संघर्ष का रूप देना जरूरी नहीं है। देश के सामने रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों की आय और आर्थिक विकास जैसे अनेक महत्वपूर्ण सवाल हैं। सार्वजनिक विमर्श में इन विषयों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। भोजन को लेकर अनावश्यक टकराव पैदा करने से न लोगों की समस्याएं हल होती हैं और न ही सामाजिक सौहार्द मजबूत होता है।


--------------------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed