The Kashmir Files: आखिर कैसे थे उस समय कश्मीर के राजनीतिक हालात? कश्मीरी पंडितों को लेकर क्या थी राज्यपाल जगमोहन की भूमिका?
विवेक अग्निहोत्री की फिल्म द कश्मीर फाइल्स इन दिनों चर्चा में है। फिल्म को लेकर कश्मीर के कई पक्षों पर बातें हो रहीे हैं। अतीत की कई घटनाएं और राजनीतिक प्रश्न भी सामने हैं। इसी संदर्भ में पढ़ें वरिष्ठ पत्रकार विष्णु शर्मा का ब्लॉग।
विवेक अग्निहोत्री की फिल्म द कश्मीर फाइल्स इन दिनों चर्चा में है। फिल्म को लेकर कश्मीर के कई पक्षों पर बातें हो रहीे हैं। अतीत की कई घटनाएं और राजनीतिक प्रश्न भी सामने हैं। इसी संदर्भ में पढ़ें वरिष्ठ पत्रकार विष्णु शर्मा का ब्लॉग।
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विस्तार
अचानक से कांग्रेस के नेताओं, समान विचारधारा वाली पार्टियों के नेताओं, बीजेपी के विरोधी पूर्व पत्रकारों-बुद्धिजीवियों ने कश्मीरी पंडितों के कश्मीर घाटी से निष्कासन के लिए एक नया विलेन ढूंढ लिया है, ऐसा विलेन जो कभी इंदिरा गांधी, संजय गांधी, राजीव गांधी, यहां तक कि वीपी सिंह सरकार के गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद तक की आंखों का तारा हुआ करता था। ‘कश्मीर फाइल्स’ मूवी को कई सीरियस नहीं ले रहा था, लेकिन जब सोशल मीडिया पर तूफान खड़ा हुआ तो निशाने पर कांग्रेस भी आ गई और उसकी कई वजह थीं।
शुरुआत से कश्मीर नीति, धारा 370 और फौरी कारण में मकबूल बट को मौत की सजा देने वाले जज के हत्यारे यासीन मलिक को इतनी तबज्जों देना कि पीएम मनमोहन सिंह से मिला दिया, ऐसे में बीजेपी के विरोधियों ने कश्मीर के उस दौर के गर्वनर जगमोहन पर तब ठीकरा फोड़ा, जब वो जिंदा नहीं हैं।
आखिर कश्मीर का सच क्या है? क्या वाकई जगमोहन जिम्मदार हैं? अगर हैं तो कश्मीरी पंडितों के संगठन उन्हें अपना रक्षक क्यों मानते हैं? फिर क्यों अमित शाह धारा 370 को हटाने के बाद उनसे मिलने गए थे?
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दिल्ली कायापलट कर दी जगमोहन ने
इन्हीं 2 आखिरी सवालों में मोटे तौर पर जवाब है, जो एक पक्ष का हीरो है, उसे दूसरे पक्ष विलेन बना देता है। पहले जानें सिविल सेवा के अधिकारी जगमोहन मल्होत्रा ने कश्मीर से पहले दिल्ली का कायापलट कैसे किया था? मोरारजी देसाई को याद था कि इस व्यक्ति ने मास्टर प्लान के लिए केवल 5 करोड़ रुपए ‘रिवॉल्विंग फंड’ के तौर पर उनके वित्त मंत्री रहते लिए थे, जबकि बजट 732 करोड़ था और उसी से दिल्ली में हजारों एकड़ जमीन डीडीए के लिए जुटा ली थी।
मोरारजी ने पूछागांधी मां-बेटे को क्यों सपोर्ट कर रहे हो? तो जैसे कल्याण सिंह ने बाबरी का दोष अपने ऊपर लिया, जगमोहन ने भी स्लम हटाने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली, एक तरह से ये श्रेय भी था।
एशियाड के दौरान 2 साल के अंदर नेहरू स्टेडियम, इंदिरा गांधी इनडोर स्टेडियम, तालकटोरा पूल, करणी सिंह शूटिंग रेंज, गेम्स विलेज जैसे इनफ्रास्ट्क्चर खड़ा करना जगमोहन के बस की ही बात थी। दिल्ली में मेट्रो लाने का आइडिया भी उन्हीं का था। पुराने किले में लोग लकड़ी की टालें और कोयला डिपो चलाते थे, उन्हें हटाया गया।
डीडीए के उपाध्यक्ष बने तो दिल्ली में ग्रुप हाउसिंग स्कीम लांच की गईं, मयूर विहार और बसंत कुंज जैसे इलाके बने, लोगों को मदनगीर, दक्षिणपुरी और त्रिलोकपुरी में बसाया गया। दिल्ली में हाउसिंग योजना देखकर तो मार्गेट थैचर तक ने इंदिरा गांधी को लिखकर तारीफ की थी।
कयामत की रात जगमोहन ने संभाला था जम्मू-कश्मीर का चार्ज
जो लोग कश्मीरी पंडितों को लेकर ये सवाल पूछे रहे हैं कि कश्मीरी पंडितों ने घाटी को जगमोहन के गवर्नर रहते छोड़ा? उनको ये पता होना चाहिए या पता होते भी जनता को वो जानबूझकर नहीं बता रहे हैं कि कश्मीरी पंडित 19 जनवरी 1990 को ‘पलायन दिवस’ के तौर पर मनाते हैं, और जगमोहन ने अपने दूसरे कार्यकाल में कश्मीर के गर्वनर के तौर पर चार्ज लिया था, वो तारीख भी यही थी- 19 जनवरी 1990 की रात, लेकिन घाटी में नहीं, बल्कि जम्मू में, क्योंकि सर्दियों की राजधानी जम्मू होती थी।
उस रात वो वहां पहुंचे ही थे और लगभग सभी बड़े सिविल व सैन्य अधिकारी उनके स्वागत के लिए जम्मू में मौजूद थे और उसी रात ये खेल हो गया।
आपको समझना होगा कि जगमोहन पहली बार इस कार्यकाल में एक कमजोर प्रधानमंत्री और गठबंधन सरकार के साथ काम कर रहे थे। इससे पहले वो नेहरू, इंदिरा और राजीव गांधी के साथ काम कर चुके थे, और बड़े बड़े प्रोजेक्ट्स को उन्होंने अंजाम दिया था। कैसे उन्होंने यमुना किनारे की गंदी बस्तियों और श्मशान घाटों की तस्वीर बदल दी थी, ये पूरे देश को पता है।
इमरजेंसी के दौरान भी वो विवादों मे रहे, लेकिन हर बार उनके साथ उनके काम के चलते सरकार मजबूती से खड़ी रहती थी। यूं भी उनके जाने से पहले ही कश्मीर के हालात काफी खराब हो चले थे। 4 जनवरी को ही आतंकी संगठनों का हिंदुओं को घाटी छोड़ने का फरमान अखबारों में छप गया था।
जगमोहन को कश्मीर भेजने के पीछे मुफ्ती की मंशा
जब गांधी परिवार के करीबी थे, तब वीपी सिंह ने उन्हें कश्मीर क्यों भेजा? इस सवाल के जवाब कश्मीरी पंडितों के पलायन के बीच छुपे हैं। ये समझना होगा-
दरअसल वीपी सिंह सरकार में गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद पहले कांग्रेस में थे, उनकी और अरुण नेहरू की जगमोहन से अच्छी दोस्ती थी। उस वक्त कश्मीर में सरकार थी मुफ्ती के दुश्मन और उनकी बेटी महबूबा के वर्तमान में शुभचिंतक फारुख अब्दुल्ला की। मुफ्ती को अच्छे से पता था कि अगर जगमोहन को गर्वनर बनाकर कश्मीर भेजा गया तो फारुख अब्दुल्ला फौरन इस्तीफा दे देंगे, क्योंकि उन्हें जगमोहन पसंद नहीं थे। मुफ्ती खुद मुख्यमंत्री बनना चाहते थे।
जिस जगमोहन को आज आतंकियों के सामने कमजोर साबित किया जा रहा है, उसी जगमोहन को कभी गर्वनर बनाकर इंदिरा गांधी ने अप्रैल 1984 में कश्मीर भेजा था और खालिस्तानी आतंकियों से रिश्ते बनाने जैसी हरकतों के चलते उनकी पार्टी को तुड़वाकर उनके ही बहनोई गुलाम मोहम्मद शाह की सरकार बनवा दी थी।
आप जगमोहन की हिम्मत का इस बात से बखूबी अंदाजा लगा सकते हैं कि जब गुलाम मोहम्मद शाह ने साउथ कश्मीर में हिंदुओं के खिलाफ दंगे भड़काए, एक प्राचीन मंदिर के अंदर मस्जिद बनवा दी तो उनकी सरकार को 2 साल भी पूरे नहीं करने दिए और राजीव गांधी से कहकर 6 मार्च 1986 को उनकी सरकार भी गिरवा दी थी। लेकिन उस दौरान केन्द्र सरकार का पूरा सहयोग ऊपर से जगमोहन के साथ था, वीपी सिंह की कमजोर सरकार की तरह नहीं कि कश्मीर में क्या हो रहा है?
वो बस मुफ्ती मोहम्मद सईद को रिपोर्ट करना था, क्योंकि वो देश के गृहमंत्री थे और जिसकी बेटी को आतंकियों ने उठा लिया हो, वो गृहमंत्री या तो अपने साम्प्रदायिक स्वार्थों के चलते एक्शन नहीं ले रहा था, या डरपोक था। इसके लिए केवल जगमोहन को निशाने पर लेने की क्या जरुरत?
वैसे भी जगमोहन को फिर से गर्वनर बुलाकर कश्मीर बुलाने के पीछे मुफ्ती की मंशा थी। अब सोचिए क्या फारुख अब्दुल्ला को गुस्सा नहीं आया होगा? क्या वही गुस्सा 19 जनवरी 1990 को आतंकियों को खुली छूट के तौर पर सामने आया? क्योंकि कश्मीर फाइल्स में भी आप देखेंगे कि कैसे इस पलायन का सबसे बड़ा विलेन बिट्टा कराटे उर्फ फारुख अहमद डार, फारुख अब्दुल्ला के घर आता जाता था।
मुफ्ती और फारुख दोनों को ही बखूबी पता था कि गर्वनर के स्वागत के लिए सारे बड़े अधिकारी, यहां तक कि सेना के भी उस रात जम्मू जाएंगे, और उस रात जो कहर कश्मीरी पंडितों पर टूटा, वो आप ‘कश्मीर फाइल्स’ में देखेंगे। उस रात कुछ और भी हुआ था, जिसके चलते आतंकियों को श्रीनगर में तमाम समर्थक मिल गए।
अचानक से छोटा बाजार में रात को एक सर्च ऑपरेशन केन्द्रीय सुरक्षा बलों ने चलाया, जिसके बारे में जगमोहन को तो कतई पता नहीं था। एक अधिकारी ने बाद में बताया कि वो पहले से योजनाबद्ध था, जबकि सारे अधिकारी उससे पहले ही जम्मू चले गए। ठंड में हुए इस सर्च ऑपरेशन से परेशान लोगों को भड़काना आतंकियों के लिए आसान हो गया और फिर तो आम मुसलमान भी कश्मीरी पंडितों के खिलाफ दंगे में शामिल हो गया।
मंडल मसीहा वीपी सिंह और मुफ्ती मोहम्मद सईद को क्यों कर दिया माफ?
आज अगर कश्मीर में कुछ होता है तो जिम्मेदारी क्या अकेले मनोज सिन्हा की होगी? क्या बीजेपी विरोधी अमित शाह पर नहीं चढेंगे? क्या मोदी का इस्तीफा नहीं मांगेंगे? लेकिन आज तक मुफ्ती मोहम्मद सईद तो दूर वीपी सिंह से भी किसी ने माफी मांगना तो दूर उन्हें दोषी तक नहीं ठहराया, वो उन सबके लिए मंडल मसीहा हैं। हां जिम्मेदार बाहर से समर्थन दे रही बीजेपी को मानते हैं, जबकि पहला कार्यकर्ता जो मरा सतीश टिक्कू, वो आरएसएस का था। पहला नेता जो मरा वहां, वो बीजेपी का था।
लोग कहते हैं कि युवाओं में उफान क्यों नहीं आया? इतना बड़ा पलायन हुआ तो किसी को देश में पता क्यों नहीं चला, गुस्सा क्यों नहीं आया? मूवी देखकर आप समझ सकते हैं कि मीडिया उस वक्त क्या कर रही थी, कैसे खबरें दबाई जा रही थीं। सोशल मीडिया का युग नहीं था।
दूसरे वीपी सिंह ने देश को मंडल की आग की झोंक दिया, युवा उसमें व्यस्त हो गया और बेचारे कश्मीरी पंडित अपनी व्यथा खुद ही झेलने को मजबूर हो गए। शरणार्थी कैम्पों में ही 6000 लोगों की मौत गंदगी जनित बीमारियों से हुई थी।
फिर सवाल उठता है कि कश्मीरी पंडित जगमोहन को रक्षक या मसीहा क्यों मानते हैं?
वो ही जगमोहन थे, जिन्होंने माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड बनाकर वैष्णो देवी धाम पर तमाम सुविधाएं दी थीं, इससे हजारों लोगों को वहां रोजगार मिला। इससे आने वाले हिंदू श्रद्धालुओं और पर्यटकों की संख्या में कई गुना बढ़ोत्तरी तेजी से हुई। जिस जगमोहन को ये लोग कमजोर बता रहे हैं, उसी ने सबसे पहले कश्मीर में देशविरोधी गतिविधियों में भाग लेने के लिए सरकारी कर्मचारियों को नौकरी से ही निकाल देने की शुरूआत की थी, उससे पहले किसी में हिम्मत ही नहीं थी। अब्दुल गनी बट समेत 3 प्रोफेसर्स को बर्खास्त कर दिया था क्योंकि वो भारत विरोधी अभियान चला रहे थे। कश्मीरियों को पहली बार साफ पानी अगर पीने को मिला तो जगमोहन की वजह से, उन्होंने पूरे जम्मू-कश्मीर की संकरी गलियों को चौड़े रास्तों में बदला, नया एयरपोर्ट बनवाया और कश्मीर के ड्रेनेज सिस्टम को आधुनिक बनाया। नेताओ को वो भले ही पसंद ना आए हों, लेकिन आम कश्मीरियों के वो दुलारे बन गए थे।
राजीव गांधी भी कम जिम्मेदार नहीं
पब्लिक और नेताओं दोनों को खुश करना आसान भी नहीं था। इधर राजीव गांधी ने फिर से फारुख अब्दुल्ला से दोस्ती कर ली, कांग्रेस और नेशनल कान्फ्रेंस का फिर से टाईअप हुआ और एक संयुक्त सरकार बन गई। ये जगमोहन थे, जो पीएम को साफ लिखते थे कि धारा 370 कश्मीर और कश्मीरियों के विकास में इकलौता रोड़ा है। शेख अब्दुल्ला की दोहरी राजनीति के बारे में उन्होंने कहा था, शेख अब्दुल्ला दिल्ली में नेशनलिस्ट, जम्मू में कम्युनिस्ट और कश्मीर में कम्युनलिस्ट बन जाता है।
जगमोहन ने जमकर इस बारे में लिखा है कि कैसे नेशनल कॉन्फ्रेंस अपने साम्प्रदायिक रुख के चलते आतंकवादियों और अलगगाववादियों को बढ़ावा दे रही थी, फिर देश ने देखा कि कैसे राजीव गांधी से हाथ मिलाकर नेशनल कांफ्रेंस ने 1987 के चुनावों में जमकर धांधली की, दोनों की संयुक्त सरकार बनी और केन्द्र ने धांधली की शिकायतों पर कोई ध्यान नहीं दिया।
बाद में भी कश्मीर के बिगड़ते हालातों पर जगमोहन ने राजीव गांधी को दो पत्र लिखे, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।
वैसे भी आईबी के अधिकारी रहे मलय कृष्ण धर ने अपनी किताब ‘ओपन सीक्रेट्स: इंडियाज इंटेलीजेंस अनवेल्ड’ में लिखा है-
अफगानिस्तान के नजीबुद्दौला ने कई बार भारत सरकार को संदेश दिया कि कश्मीर के लड़कों की अफगानिस्तान के ट्रेनिंग कैम्पों में पाकिस्तान ट्रेनिंग करवा रहा है, लेकिन बेनजीर भुट्टो पर राजीव गांधी को इतना भरोसा था कि उन्होंने इस पर ध्यान नहीं दिया और बाद में यही ल़ड़के 1990 में कश्मीर में आतंक के बड़े चेहरे बन गए।
किसी को शायद पता ना हो 19 जनवरी 1990 को गर्वनर बनने से पहले 11 जुलाई 1889 को वो इसी पद से वापस दिल्ली लौटे थे, पूरे पांच साल कश्मीर को संभालकर। इन पांच सालों में उन्होंने 2 सरकारें भी गिराईं और आतंकियों पर काबू भी रखा, लेकिन जुलाई से जनवरी के बीच केन्द्र में कमजोर सरकार और कश्मीर में फारुख अब्दुल्ला सरकार के बेकाबू होने से हालात भी बेकाबू हो गए थे।
हालांकि कश्मीर फाइल्स में दिखाई गई कुछ घटनाएं 19 जनवरी के बाद की भी हैं, लेकिन तब तक कश्मीरी पंडित काफी डर गए थे।जगमोहन ने जम्मू चले गए शरणार्थियों के लिए श्रीनगर, अनंतनाग, बारामूला और कुपवाड़ा 4 शहरों में भारी सुरक्षा के साथ उनके लिए शरणार्थी कैम्प भी बनवाए ताकि वो जम्मू से वापस आ जाएं, लेकिन बहुत ही कम लोग वापस आए। स्पेशल कमिश्नर्स और स्पेशल डीआईजी कश्मीरी पंडितों के लिए नियुक्त किए, लेकिन उनके दिलों में 19 जनवरी की रात की जो दहशत फैल गई थी, वो नहीं निकली।जगमोहन के सवालों से भी केन्द्र परेशान था, सो उनको भी 4 महीने के अंदर वापस दिल्ली बुला लिया गया था।
जगमोहन को केन्द्र से ना सहयोग मिला और ना ही मीडिया ने यहां की खबरें दिल्ली तक पहुंचाईं, स्थानीय रिपोर्टर्स कैसे खौफ में थे, आप मूवी देखकर या उस दौर की किताबें पढ़कर अंदाजा लगा सकते हैं। कश्मीर पर बनी वामपंथी संगठन पीयूसीएल की कमेटी ने अपनी ही सेना और प्रशासन पर कश्मीरियों पर अत्याचार के आरोप लगा दिए और ये तक कह दिया कि जगमोहन ने कश्मीरियों को पलायन करवाया है, उन्हें सरकारी ट्रक मुहैया करवाए।
लेकिन कमेटी से चीफ सेक्रेट्री ने जब उन ट्रकों के नंबर या ऐसा कोई सुबूत उपलब्ध करवाने के लिए पूछा तो उस कमेटी की सदस्यों ने कभी कोई सुबूत नहीं दिया और ना ही आरोप लगाने वालों के नाम बताए। उस कमेटी की काफी आलोचना भी हुई क्योंकि उन्होंने जितनी कहानियों को कश्मीर फाइल्स में पिरोया गया है, एक भी पीड़ित कश्मीरी पंडित से बात नहीं की।
कश्मीर फाइल्स में इनकी हैं सच्ची कहानियां
आपने ‘कश्मीर फाइल्स’ देखी होगी, उसका मूल किरदार कृष्णा पंडित का पिता आतंकियों के आने पर गेंहूं के एक बड़े ड्रम में छुप जाता है, लेकिन एक पड़ोसी इशारे से आतंकियों को बता देता है कि कहां छुपा है और वो उसे मौत के घाट उतार देते हैं।
ये असली कहानी टेलीकम्युनिकेशन ऑफिसर बीके गंजू की थी, जबकि जो बेटे को साथ लेकर आतंकियों ने जिस बूढ़े बाप की हत्या की थी, वो कहानी सर्वानंद कौल ‘प्रेमी’ की थी, जिन्होंने भागवद गीता का कश्मीरी में अनुवाद किया था और हमेशा कुरान भी अपने पास रखते थे। गांव के लोगों पर भरोसा था, लेकिन मार डाले गए. ऐसी कई दर्दनाक कहानियों के लिए आप जगमोहन की किताब ‘माई फ्रोजन टर्बुलेंस इन कश्मीर’ पढ़ सकते हैं। लेकिन किसी भी कमेटी ने इन परिवारों से मिलने की कोशिश नहीं की।
कांग्रेस पर भी उठते हैं कई बड़े सवाल?
कांग्रेस भले ही सत्ता में नहीं थी लेकिन उसकी जिम्मेदारी कम नहीं थी, मूल तो 370 थी ही। कश्मीर में सत्ता में आने के लिए उसका सरकारों को गिराना, फिर टाईअप करके चुनावों में धांधली करके जीतना, 19 जनवरी के कांड के लिए जिम्मेदारा बिट्टा कराटे का नेशनल टीवी पर इंटरव्यू में खुलेआम 20 हत्याओं को कुबूलना, फिर भी छुट्टा घूमना, यासीन मलिक का मकबूल बट को फांसी देने वाले जज नीलकंठ गंजू की हत्या का बीबीसी के शो हार्ड टॉक में कुबूलनामे के बावजूद मनमोहन सिंह का उसे मिलने बुलाना, राजीव गांधी की भुट्टो से दोस्ती के चलते नजीबुद्दौला की चेतावनियों को नजरअंदाज करना और अब केरला कांग्रेस का कश्मीरी पंडितों से ज्यादा मुस्लिमों के मरने वाले ट्वीट से आप कांग्रेस का गुनाह समझ सकते हैं।
जब दिल्ली वापस आने के बाद जगमोहन ने राज्यसभा में कश्मीर मुद्दे पर सच्चाई बताने की कोशिश की थी, तो उन्हें कांग्रेसियों ने बोलने नहीं दिया था। जो जगमोहन कभी इंदिरा, संजय और राजीव तक के दुलारे थे, उनसे कांग्रेसी इसलिए खफा रहते हैं क्योंकि वो बाद में बीजेपी की टिकट पर नई दिल्ली से सांसद बने, मंत्री बने।
कभी इंदिरा गांधी ने न्यूयॉर्क में रहने वाली कश्मीरी मूल की डॉक्टर निर्मला मित्रा को कश्मीर पर अपनी बेबसी एक पत्र में लिखी थी-
आपकी तरह ही मुझे बड़ा दुख है कि आप कश्मीर में पैदा होकर भी, और मेरे पुरखे वहां के होते हुए भी ना आप और ना मैं वहां घर या जमीन नहीं ले सकते, मेरे हाथ में नहीं है। कश्मीरी पंडितों और लद्दाख में बौद्धों के साथ बहुत गलत व्यवहार और भेदभाव हो रहा है।
आखिर कश्मीरी पंडितों और 370 के विरोधियों का इतना अगाध विश्वास जगमोहन में क्यों था? क्योंकि सब जानते हैं कि धारा 370 को हटाने की वकालत सबसे ज्यादा जगमोहन ने की थी। कश्मीरी पंडितों की यथा सम्भव मदद यहां तक कि व्यक्तिगत भी जगमोहन ने की थी और वो लोग इस बात को जानते हैं। तभी तो कांग्रेस फिर एक बड़ी गलती ये कर रही है कि जगमोहन को विलेन बनाकर वो कट्टर मुस्लिमों को तो खुश कर लेगी लेकिन आम हिंदू खासतौर पर कश्मीरी पंडितों के दिल में फिर अपनी छवि खराब कर लेगी।
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