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Donald Trump: डोनाल्ड ट्रंप ने भारत की चुनाव व्यवस्था को सराहा, फिर भारत में उस पर सवाल क्यों?
सार
ट्रंप का भारत की चुनाव व्यवस्था का उदाहरण देना अपने आप में महत्वपूर्ण है। इसलिए नहीं कि भारतीय चुनाव आयोग को किसी विदेशी नेता के प्रमाण पत्र की जरूरत है, बल्कि इसलिए कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की चुनावी व्यवस्था को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कैसी धारणा बन रही है, यह भी विचार का विषय है।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप
- फोटो : ANI
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विस्तार
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत की चुनाव व्यवस्था का उदाहरण देते हुए अपने देश में चुनाव सुधार की जरूरत बताई है। ट्रंप ने भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ हुई बातचीत का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत जैसे विशाल देश में मतदाताओं की पहचान के लिए फोटो पहचान-पत्र की व्यवस्था है।
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चुनाव में बड़ी संख्या में लोग मतदान करते हैं। उन्होंने भारत में वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान पड़े 64.64 करोड़ वोटों और अपेक्षाकृत कम डाक मतपत्रों का भी संदर्भ दिया। ट्रंप का यह उल्लेख दरअसल अमेरिका में प्रस्तावित SAVE America Act के समर्थन में था, जिसमें मतदाता पहचान और नागरिकता के प्रमाण जैसी व्यवस्थाओं पर जोर दिया गया है।
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ट्रंप का भारत की चुनाव व्यवस्था का उदाहरण देना अपने आप में महत्वपूर्ण है। इसलिए नहीं कि भारतीय चुनाव आयोग को किसी विदेशी नेता के प्रमाण पत्र की जरूरत है, बल्कि इसलिए कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की चुनावी व्यवस्था को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कैसी धारणा बन रही है, यह भी विचार का विषय है।
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लेकिन, इसी बिंदु पर भारत की राजनीति का एक विचित्र विरोधाभास सामने आता है। जिस देश की चुनाव व्यवस्था को दुनिया का एक प्रमुख राजनीतिक नेता अपने यहां सुधार के लिए उदाहरण के रूप में देख रहा है, उसी देश में कुछ राजनीतिक दल चुनाव हारने के बाद उसी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करते हैं।
इनमें से कुछ दल ट्रंप के बयान पर भी सवाल उठा रहे हैं। कांग्रेस के राज्यसभा सांसद एवं मीडिया प्रभारी पवन खेड़ा ने तो सोशल मीडिया पर ट्रंप को जवाब देते हुए यह तक लिख लिया कि ज्ञानेश कुमार गुप्ता को अमेरिका ले जाइए और वहीं रख लीजिए। हमारी ईवीएम भी अगली उपलब्ध उड़ान से आपके पास भेज देंगे। आपने हमारी ओर जितने अपमान और तंज भेजे हैं, उनके बदले हम आपके लिए इतना तो कर ही सकते हैं।
दरअसल, डोनाल्ड ट्रंप का तर्क मुख्य रूप से मतदाता पहचान और चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जुड़ा है। अमेरिका में संघीय चुनावों के लिए मतदाता पहचान और नागरिकता के प्रमाण को लेकर उनकी सरकार लंबे समय से जोर दे रही है।
SAVE America Act में मतदाता पहचान, नागरिकता के प्रमाण और डाक मतपत्रों पर कुछ सीमाएं लगाने जैसे प्रावधान प्रस्तावित हैं। भारत में मतदाता की पहचान के लिए Electoral Photo Identity Card यानी EPIC मुख्य पहचान दस्तावेज है, हालांकि चुनाव आयोग निर्धारित अन्य पहचान दस्तावेजों को भी स्वीकार करता है।
इसलिए यह कहना अधिक सही होगा कि भारत में केवल एक ही पहचान-पत्र से मतदान की व्यवस्था नहीं है, बल्कि EPIC के साथ आयोग द्वारा स्वीकृत वैकल्पिक दस्तावेज भी मान्य हैं। यही वह व्यवस्था है, जिसे ट्रंप अमेरिकी बहस में उदाहरण के तौर पर सामने रख रहे हैं। यहां सवाल ट्रंप की राजनीति का नहीं, अपितु भारत की व्यवस्था को लेकर हमारे अपने राजनीतिक रवैये का है।
भारत में चुनाव परिणाम आने के बाद एक परिचित राजनीतिक दृश्य देखने को मिलता है। जीत हुई तो जनता का आशीर्वाद, संगठन की मेहनत और लोकतंत्र की जीत, हार हुई तो ईवीएम, मतदाता सूची, चुनाव आयोग और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल। यह स्थिति किसी एक दल तक सीमित नहीं रही है।
अलग-अलग समय पर अलग-अलग राजनीतिक दलों ने चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं, लेकिन समस्या सवाल पूछने में नहीं है। लोकतंत्र में सवाल पूछना जरूरी है। समस्या तब पैदा होती है, जब सवाल का आधार ठोस प्रमाण के बजाय केवल चुनाव परिणाम बन जाता है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में करीब 97.98 करोड़ मतदाता पंजीकृत थे और 64.64 करोड़ वोट पड़े।
चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार इनमें 64.21 करोड़ ईवीएम वोट और लगभग 42.82 लाख डाक मतपत्र थे। इतने विशाल पैमाने पर चुनाव कराना अपने आप में दुनिया के सबसे बड़े प्रशासनिक अभ्यासों में से एक है। ऐसे में चुनाव आयोग से सवाल पूछना बिल्कुल जायज है, लेकिन सवाल और आरोप के बीच की सीमा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
ईवीएम पर राजनीतिक बहस नई नहीं है, लेकिन इस बहस में न्यायपालिका के निष्कर्ष को भी ध्यान में रखना चाहिए। अप्रैल 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने ईवीएम और वीवीपैट से संबंधित याचिकाओं पर फैसला देते हुए कहा था कि चुनाव प्रक्रिया में पर्याप्त जांच और संतुलन की व्यवस्था मौजूद है।
केवल आशंका या अनुमान के आधार पर पूरी चुनाव प्रक्रिया को संदेह के घेरे में नहीं डाला जा सकता। अदालत ने 100 प्रतिशत वीवीपैट पर्चियों की गिनती को अनिवार्य करने की मांग भी स्वीकार नहीं की। इसका अर्थ यह नहीं कि चुनाव आयोग आलोचना से ऊपर है। किसी भी लोकतांत्रिक संस्था को सवालों से परे नहीं माना जा सकता, लेकिन आलोचना और अविश्वास फैलाने के बीच अंतर जरूर होना चाहिए।
अगर किसी राजनीतिक दल के पास चुनावी गड़बड़ी का ठोस प्रमाण है तो उसे निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से सामने रखना चाहिए। अदालत में जाना चाहिए, प्रमाण प्रस्तुत करने चाहिए और व्यवस्था में सुधार की मांग करनी चाहिए। सिर्फ इसलिए कि परिणाम मन के मुताबिक नहीं आया, पूरी मशीनरी को संदिग्ध बता देना लोकतांत्रिक विमर्श को मजबूत नहीं करता।
यहां विपक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। विपक्ष लोकतंत्र का अनिवार्य स्तंभ है। सरकार से सवाल करना, चुनाव आयोग से जवाब मांगना और मतदाता सूची की जांच करना विपक्ष का अधिकार ही नहीं, जिम्मेदारी भी है, लेकिन क्या यह जिम्मेदारी चुनाव परिणाम के साथ बदलनी चाहिए?
क्या जिस चुनाव आयोग के माध्यम से कोई दल सत्ता में आता है, उसी आयोग की विश्वसनीयता अगले चुनाव में हारते ही संदिग्ध हो जाती है? क्या चुनाव आयोग तब तक निष्पक्ष है जब तक परिणाम हमारे पक्ष में है? क्या हार के बाद ईवीएम पर सवाल उठाना जनता के निर्णय पर सवाल उठाने के बराबर नहीं हो जाता? इन सवालों पर विपक्ष को आत्ममंथन करना चाहिए।
चुनाव आयोग केवल कोई सरकारी कार्यालय नहीं है। वह संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत स्थापित संवैधानिक संस्था है। देश के चुनावों के संचालन की जिम्मेदारी उसी के पास है। स्वयं चुनाव आयोग अपने नागरिक सेवा पोर्टल पर इसे चुनाव प्रशासन के लिए स्वायत्त संवैधानिक प्राधिकरण के रूप में वर्णित करता है।
ट्रंप ने तारीफ की तो क्या भारत को खुश होना चाहिए? उत्तर- नहीं। भारत को किसी ट्रंप, किसी अमेरिकी संस्था या किसी विदेशी टिप्पणीकार की प्रशंसा के आधार पर अपनी चुनाव व्यवस्था को सही साबित करने की जरूरत नहीं है।
भारत का लोकतंत्र अपनी ताकत स्वयं रखता है, लेकिन ट्रंप की टिप्पणी को पूरी तरह नजरअंदाज करना भी ठीक नहीं होगा। एक अमेरिकी राष्ट्रपति अपने देश में चुनाव सुधार की बहस के दौरान भारत का उदाहरण दे रहा है। यह इस बात का संकेत जरूर है कि भारत ने चुनाव प्रबंधन के क्षेत्र में ऐसा अनुभव अर्जित किया है, जिसे दूसरे लोकतंत्र भी अपने विमर्श में शामिल कर रहे हैं।
भारत को इस उपलब्धि को आत्ममुग्धता में बदलने के बजाय आत्मविश्वास में बदलना चाहिए। विपक्ष को भी यह समझना होगा कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता केवल सरकार की नहीं, विपक्ष की भी जरूरत है।
इसका दूसरा पक्ष भी उतना ही जरूरी है। चुनाव आयोग को यह नहीं मानना चाहिए कि संवैधानिक संस्था होने मात्र से जनता के हर सवाल का जवाब देने की जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है। आज का मतदाता पहले से अधिक जागरूक है। सोशल मीडिया के दौर में आधी-अधूरी जानकारी कुछ ही मिनटों में करोड़ों लोगों तक पहुंच सकती है।
इसलिए मतदाता सूची, चुनावी प्रक्रिया, ईवीएम-वीवीपैट, शिकायतों और कार्रवाई से जुड़ी सूचनाओं को अधिक सरल और सार्वजनिक तरीके से उपलब्ध कराना आयोग के हित में भी है। आयोग जितना पारदर्शी होगा, राजनीतिक आरोपों की गुंजाइश उतनी ही कम होगी।
विपक्ष जितना प्रमाण आधारित सवाल पूछेगा, उसकी विश्वसनीयता उतनी ही बढ़ेगी। जनता जितनी तथ्य आधारित जानकारी पर भरोसा करेगी, लोकतंत्र उतना ही मजबूत होगा।
ट्रंप का हालिया बयान एक तरह से भारतीय लोकतंत्र के सामने आईना रखता है। अमेरिका में चुनाव व्यवस्था को लेकर बहस चल रही है। भारत की व्यवस्था को वहां उदाहरण के तौर पर पेश किया जा रहा है। दूसरी तरफ, भारत में ही कुछ राजनीतिक आवाजें चुनाव परिणामों के बाद उसी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रही हैं।
दोनों बातों को साथ रखकर देखने की जरूरत है। भारत की चुनाव व्यवस्था में कमियां हो सकती हैं। सुधार की गुंजाइश हमेशा रहती है। मतदाता सूची हो, आचार संहिता हो, चुनाव खर्च हो, नियुक्ति प्रक्रिया हो या तकनीकी पारदर्शिता, हर विषय पर स्वस्थ बहस होनी चाहिए, लेकिन सुधार का रास्ता अविश्वास से नहीं, प्रमाण और संस्थागत संवाद से निकलता है।
लोकतंत्र में चुनाव जीतना महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण है, जनता के निर्णय को स्वीकार करने की लोकतांत्रिक क्षमता। ट्रंप भारत की चुनाव व्यवस्था को अपने देश में बहस का हिस्सा बनाएं, यह भारत के लिए एक सकारात्मक संकेत हो सकता है, लेकिन भारतीय लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा तब होगी जब सत्ता पक्ष भी संस्थाओं का सम्मान करे और विपक्ष भी हार के बाद उन्हीं संस्थाओं पर भरोसा बनाए रखे।
आखिर चुनाव आयोग की साख किसी एक सरकार की संपत्ति नहीं है। यह हर मतदाता की संपत्ति है। इसलिए आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होना चाहिए कि ट्रंप ने भारत की चुनाव व्यवस्था की तारीफ क्यों की?
बड़ा सवाल यह है कि जिस चुनाव व्यवस्था पर दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र खड़ा है, क्या हम स्वयं उसके प्रति अपना विश्वास राजनीतिक सुविधा के हिसाब से तय करेंगे? अगर इसका जवाब 'नहीं' है तो जीत में जनादेश और हार में षड्यंत्र, दोनों को एक साथ नहीं चलाया जा सकता। यही लोकतांत्रिक परिपक्वता की पहली शर्त है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।