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Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   From Rani Lakshmibai to Usha Mehta: Women Freedom Fighters Untold Stories Behind India's Independence

Indian Women Freedom Fighters: भारत की गुमनाम महिला स्वतंत्रता सेनानियों की कहानी

Mon, 17 Aug 2026 06:25 PM IST
Dr.Naaz Parveen डॉ. नाज परवीन
Updated Mon, 17 Aug 2026 06:25 PM IST
सार

women freedom fighters of India: महात्मा गांधी के नेतृत्व में जब आंदोलन भारत की सड़कों से घरों तक पहुंचा। भारतीय महिलाएं बड़ी संख्या में घर की चारदीवारी से बाहर नेतृत्व करने आई। उन्होंने सत्याग्रह, बहिष्कार और जेल की यात्राएं की। स्वर कोकिला सरोजनी नायडू ने अपनी आवाज को हथियार बनाकर नेतृत्व किया।

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From Rani Lakshmibai to Usha Mehta: Women Freedom Fighters Untold Stories Behind India's Independence
भारतीय महिला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी - फोटो : Ai

विस्तार

80th Independence Day 2026: भारत की स्वतंत्रता की कहानी जब तक अधूरी है जब तक उसमें भारत की वीरांगनाओं का नाम न हो। हम आजादी के 80 वें वर्ष का जश्न मना रहे हैं। हम जब भी भारत के स्वतंत्रता संग्राम की बात करते हैं और आजादी के आंदोलनों को याद करते हैं तो हमें मंगल पांडे, तात्या टोपे,  राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, शहीदे आजम भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, बटुकेश्वर दत्त, अशफ़ाक उल्ला खां, रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद, सुभाष चंद्र बोस जैसे महानायकों की याद सबसे पहले आती है। लेकिन आजादी की कहानी अधूरी है जब तक इसमें भारत की वीरांगनाओं का नाम शामिल न हो।

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आजादी के संघर्ष में उनकी शहादत बेमिसाल है। उन्होंने अपना घर लुटा कर हमें आबाद किया। अब हमारी बारी है उनके संघर्ष को सार्थक बनाने की। स्वतंत्रता के इतिहास की पांडुलिपियाँ उनके साहस, त्याग और बलिदान की गाथाओं के बगैर अधूरी रहेंगी। इन बेटियों ने हमें अपनी आधी आबादी का गौरवशाली इतिहास दिया।
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1857 में महिलाओं ने युद्ध का मोर्चा संभाला

सन् 1857 का दौर भारतीय इतिहास में एक निर्णायक मोड़ था। जब महिलाओं ने युद्ध में मोर्चा संभाला। तब का समाज इतना सहज नहीं था कि महिलाओं को बराबरी का दर्जा दे सके। तब महिलाओं ने न केवल स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया बल्कि अपने  अधिकार क्षेत्रों में सैनिक नेतृत्व भी किया झांसी में रानी लक्ष्मी बाई ने महिला आर्मी बनाई। महिलाओं को युद्ध कौशल का प्रशिक्षण दिया और स्वयं युद्ध का नेतृत्व किया। उनके अदम्य साहस को देख अंग्रेजी सेना के पांव हिल गए और जनरल ह्यूग रोज़ को कहना पड़ा कि वो "विद्रोहियों में वह एकमात्र 'मर्द' (बहादुर) थी।
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बेगम हजरत महल आंदोलन का हिस्सा

अवध में क्रांति की कमान बेगम हजरत महल ने संभाली और यह साबित किया कि भारतीय महिलाएं हर मोर्चे का सामना करने में सक्षम है। अंग्रेजों ने ऐसे भारतीय नेतृत्व की कल्पना नहीं की होगी। दिल्ली के दरवाजे पर क्रांतिकारियों ने दस्तक दी तो वृद्ध बहादुर शाह जफर को अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ भारत के नौजवान सैनिकों का नेतृत्व करने के लिए जीनत महल ने प्रेरित किया और स्वयं भी क्रांति के असफल होने के बाद बहादुर शाह जफर के साथ रंगून में निर्वासित होकर वहीं अंतिम सांस ली।

यकीनन यह वह समय था जब भारत की महिलाओं ने समय से परे जाकर क्रांति की कमान संभाली। मेरठ की गुमनाम महिलाओं ने सैनिकों को प्रेरित किया। बंगाल विभाजन के दौरान विरोध में महिलाओं ने अपने घरों से अंग्रेजी सामानों को निकाल होली जलाई। एक दूसरे को राखी बांध ये संदेश दिया कि भारत की एकता और अखंडता सर्वोपरि है।

सरोजनी नायडू ने आवाज को बनाया हथियार

महात्मा गांधी के नेतृत्व में जब आंदोलन भारत की सड़कों से घरों तक पहुंचा। भारतीय महिलाएं बड़ी संख्या में घर की चारदीवारी से बाहर नेतृत्व करने आई। उन्होंने सत्याग्रह, बहिष्कार और जेल की यात्राएं की। स्वर कोकिला सरोजनी नायडू ने अपनी आवाज को हथियार बनाकर नेतृत्व किया।

20वीं सदी का समाज जिसमें महिलाओं को शिक्षा, समानता, स्वतंत्रता जैसे बराबरी के अधिकार न के बराबर थे। महिलाओं का राष्ट्र सेवा के लिए घर से बाहर निकलना ही अपने आप में क्रांति थी। 1942 के  भारत छोड़ो आंदोलन के ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि जब देश के ज्यादातर महानायकों को ब्रिटिश हुकूमत ने अपनी गिरफ्त में ले लिया था तब आंदोलन को चलने का जिम्मा इन भारतीय बेटियों ने थामा था।

इन महिलाओं ने ब्रिटिश हुकूमत को दी थी खुली चुनौती

भारत की एक बेटी अरुणा आसफ अली ने मुंबई के गोवालिया टैंक मैदान में तिरंगा फहराकर ब्रिटिश सत्ता को खुली चुनौती दी। तो दूसरी बेटी उषा मेहता ने भूमिगत कांग्रेस रेडियो के माध्यम से अंग्रेजी शासन की सेंसरशिप को चुनौती दे डाली। उनकी आवाज ने आंदोलनकारियों में उत्साह और जनता में स्वतंत्रता की चेतना बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। किसी ने तलवार उठाई, किसी ने कलम चलाई किसी ने अपनी आवाज को ही हथियार बना डाला था।

महिलाएं बनी थीं गुप्तचर

महान क्रांतिकारी भगवती चरण वोहरा की पत्नी दुर्गा भाभी (दुर्गावती देवी) ने निडरता से क्रांतिकारियों के साथ क्रांति की मशाल को जलाए रखा। क्रांति के इतिहास को देखे तो यकीन करना मुश्किल है कि भारतीय समाज का एक बड़ा तबका गुप्तचर के रूप में कार्य कर रहा था उनमें अनगिनत महिलाएं थीं। जिनका इतिहास में कहीं नाम दर्ज नहीं है। शायद उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता होगा उन्हें तो भारत की स्वतंत्रता हासिल करनी थी। अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभानी थी। अपनी शहादत पानी थी।

फौज में भी महिलाएं 

आजाद हिंद फौज के सैनिकों में ऐसी अनेक जांबाज वीरांगनाएं हैं जैसे कैप्टन लक्ष्मी सहगल उन्होंने सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में आजाद हिंद फौज की रानी झांसी रेजिमेंट का नेतृत्व किया। और उस दौर की महिलाओं को क्रांति के लिए प्रेरित किया। आज भी भारतीय महिलाएं गर्व से उन्हें अपनी प्रेरणा मानती हैं।

इतिहास में गुमनाम रह गईं ये महिलाएं

स्वतंत्रता संग्राम की सबसे बड़ी खूबसूरती यह थी कि इसमें केवल प्रसिद्ध महिलाएं ही शामिल नहीं थीं बल्कि इतिहास उन महिलाओं से भरा पूरा है जिन्होंने भारत के गांव और कस्बों से क्रांति में भाग लिया। हालांकि इतिहास की पुस्तकों में उनका नाम हमें कहीं नहीं मिलेगा क्योंकि इतिहास अक्सर बड़े नामों को याद रखता है लेकिन कोई भी देश छोटे छोटे त्यागों से बनता है। इन महिलाओं ने स्वतंत्रता के संघर्ष को सफल बनाने के लिए आंदोलनकारियों को भोजन, आश्रय, और जरूरी सुविधाओं को पहुंचाने में मदद दी। उन तक गुप्त रूप से संदेश पहुंचाए। जहां कहीं पकड़ी गईं या तो अंग्रेजों के द्वारा मार दी गई या खुद ही शहादत हासिल कर स्वतंत्रता आंदोलन को आगे बढ़ाया।

आजादी के लिए दी सपनों की कुर्बानी

इन तमाम वीरांगनाओं का योगदान उतना ही अहम है जितना कि इतिहास में दर्ज वीरांगनाओं का। आज हमारे हाथों में तिरंगा है, हमारे पास अपना संविधान है जिसमें महिलाओं के अधिकार सुरक्षित हैं, हम स्वतंत्रता से अपने भविष्य की योजनाओं को बना सकते हैं, आज हम गर्व से कहते हैं कि हम आजाद हैं। हमें ये आज़ादी विरासत में मिली है। हमारी वीरांगनाओं ने अपने सपनों की कुर्बानी देकर आजादी हासिल की है, अब हमारी बारी है स्वतंत्रता हमारी जिम्मेदारी है। उनके सपनों का भारत सुरक्षित रहे यह आज की पीढ़ी को देखना होगा।

बेटियों को शिक्षा दें

बेशक अंग्रेज जा चुके हैं! हम आजाद हैं! लेकिन हमें देखना होगा कि कहीं भारत का भविष्य कोई बेटी या कोई बेटा शिक्षा से वंचित न हो, कोई महिला केवल इसलिए अवसर से वंचित न हो क्योंकि वह महिला है। भारत के हर नागरिक को अपने सपने पूरे करने के लिए सुरक्षित और स्वतंत्र वातावरण मिल सके। अभी संघर्ष जारी है अब आजादी को नई परिभाषा देने का समय है।

भारत आज विकास की नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ रहा है। विज्ञान, शिक्षा, तकनीक, खेल, प्रशासन, राजनीति और उद्यमिता, हर क्षेत्र में महिलाएं अपनी पहचान बना रही हैं। लेकिन हमें यह भी याद रखना होगा कि अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। हमें सोचना होगा कि कि उन अमर बलिदानियों के सपनों का भारत कैसे बने, जिसका उन्होंने सपना देखा था। जिस भारत में किसी तरह का भेदभाव न हो, एक-दूसरे के प्रति द्वेष न हो, सब मिल जुल कर साथ रहें। हमे अपनी भावी पीढ़ियों को स्वतंत्रता संघर्ष के उन साझे मूल्यों को सौपना होगा जिन्हें बहुत कुर्बानियां देकर हमने संवारा है।

महिला सैनानियों को जानते ही नहीं छात्र

नई शिक्षा नीति भी इस पर फोकस करती है कि हमें अपनी संस्कृति, साझी विरासत और भारतीय मूल्यों को शिक्षा में समाहित कर युवा पीढ़ियों को सिखाना होगा! ऐसा ही एक अभ्यास श्री द्रोणाचार्य (पी.जी.) कॉलेज के कला संकाय में इतिहास विभाग द्वारा स्वतंत्रता संग्राम में योगदान देने वाली महिलाओं के जीवन पर पोस्टर प्रदर्शनी आयोजित कर की गई! महिला स्वतंत्रता सेनानियों को जब सूचीबद्ध किया गया तो छात्र-छात्राओं ने पाया कि वे 80 प्रतिशत महिला स्वतंत्रता सेनानियों को जानते ही नहीं।

यह आश्चर्य के साथ-साथ दुःख का विषय भी था कि जिन की कुर्बानियों के कारण हम स्वतंत्रता की खुली हवा में सांस ले रहे है, उनके हम नाम तक नहीं जानते है, यह बेहद शर्मनीय है! इसलिए हमें अपनी भावी पीढ़ियों को अपने पुरखों की कुर्बानियों को बताना है उनको स्मृतियों में बनाए रखना है, यह श्रद्धा ही हमारी देशभक्ति की प्रेरक शक्ति है! जिसे हर पीढ़ी को हर हाल में बनाए रखना है।

इन वीरांगनाओं को सच्ची श्रद्धांजलि तब होगी, जब भारत की अंतिम पंक्ति पर खड़ी अंतिम बेटी को आगे बढ़ने का अवसर मिलेगा। उन्हें सुरक्षा का वातावरण मिलेगा। हमारी वीरांगनाओं ने अपने हिस्से का फर्ज निभाया है!अब हमारी बारी है। उनके सपने हमें समानता, सम्मान और शिक्षा से पूरे करने है।


जय हिंद
जय भारत!

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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