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किधर है निशाना: ‘दिमागी नक्सल’ नरेटिव बदलने की नई सियासी फिरकी तो नहीं?

Mon, 17 Aug 2026 05:23 PM IST
Ajay Bokil अजय बोकिल
Updated Mon, 17 Aug 2026 05:23 PM IST
सार

‘दिमागी नक्सल’ कहकर प्रधानमंत्री किस पर निशाना साध रहे थे और किन तत्वों से देश को आगाह कर रहे थे?  इसको लेकर अलग-अलग राय सामने आ रही है। लोग अपने नरेटिव के हिसाब से इसकी व्याख्या कर रहे हैं।

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dimagi naxal what is means Political Reactions and Controversy
भाजपा सांसद सुधांशु त्रिवेदी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 15 अगस्त पर लाल किले से अपने 13वें भाषण में नए शब्द ‘दिमागी नक्सल’ का जिक्र कर देश में एक नई राजनीतिक और बौद्धिक बहस को हवा दे दी है। सवाल उठ रहा है कि प्रधानमंत्री ने यह जुमला किसके लिए और क्यों इस्तेमाल किया? क्योंकि ‘अर्बन नक्सल’ तो पहले से चलन में था। तो क्या ‘दिमागी नक्सल’  उसके आगे की और कोई अदृश्य चीज है? या फिर यह विपक्ष और जेन-जी के हावी होते मुद्दों से ध्यान हटाने की नई राजनीतिक  फिरकी है?

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दिमागी नक्सल’ कहकर प्रधानमंत्री किस पर निशाना साध रहे थे और किन तत्वों से देश को आगाह कर रहे थे?  इसको लेकर अलग-अलग राय सामने आ रही है। लोग अपने नरेटिव के हिसाब से इसकी व्याख्या कर रहे हैं। पीएम मोदी ने अपने भाषण में खास तौर से कहा कि ‘दिमागी नक्सल’ वो लोग हैं, जो कहीं न कहीं समाज में अराजकता फैलाने की कोशिश करते हैं।  जो शायद विकसित भारत के निर्माण को नहीं देख सकते।
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'दिमागी नक्सली' विचारधारा वाले लोग समाज को गलत रास्ते पर ले जाने का मौका तलाश रहे हैं। प्रधानमंत्री ने देशवासियों से ऐसे लोगों को ‘पहचानने’ और ‘अलग थलग’ करने की अपील की। हालांकि प्रधानमंत्री ने ‘दिमागी नक्सल’ के रूप में किसी व्यक्ति अथवा संगठन विशेष का नाम नहीं लिया। फिर भी मानो दाढ़ी में छिपा तिनका खुद ही बोल उठा कि मैं यहां हूं।
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अब सवाल यह कि अगर पीएम सीधे किसी पर वार नहीं कर रहे थे तो उनके इस जुमले का असल राजनीतिक मकसद क्या है? कहीं ऐसा तो नहीं कि हाल में जेन-जी और उसके पहले चले सरकार विरोधी आंदोलनों और सोशल मीडिया पर लगातार चल रहे एंटी मोदी नरेटिव से ध्यान हटाने के लिए ‘दिमागी नक्सल’ का नया शोशा उछाला गया है?

अगर ऐसा है तो यह कारगर होता दिख रहा है, क्योंकि ज्यादातर लोग अब दूसरे बुनियादी सवालों से हटकर  ‘दिमागी नक्सल’ पर ही लामबंद होते दिख रहे हैं। इस बीच सीजेपी की तर्ज पर  दिमागी नक्सल जनता पार्टी नामक व्यंग्यात्मक वर्चुअल पार्टी भी सोशल मीडिया पर बन गई है, जिससे करीब 2 लाख लोग जु़ड़ गए हैं।

जाहिर है यह बहस अभी और चलेगी, जब तक कि यह तय न हो जाए कि इस तीर का असली लक्ष्य कौन है और वो कहां तक निशाने पर लगा है? बहुतों का मानना है कि प्रधानमंत्री के स्वतंत्रता दिवस के भाषण की सुर्खी ‘दिमागी नक्सल’ ही थी।

प्रधानमंत्री ने नक्सलवाद और माओवाद के खिलाफ अपनी सरकार की निर्णायक कार्रवाई का जिक्र करते हुए कहा था कि हमने ‘हथियारी नक्सलियों’ को तो खत्म कर दिया कि लेकिन उनके वैचारिक पोषक और समर्थक ‘दिमागी नक्सली’ व्यवस्था में घुसपैठ कर नीतियों को प्रभावित करने की कोशिश कर सकते हैं। प्रधानमंत्री ने यह बात देश के गृहमंत्री अमित शाह के उस दावे के संदर्भ में कही थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत में हिंसक नक्सलवाद अब पूरी तरह खत्म कर दिया गया है। 

नक्सल शब्द की पश्चिम बंगाल में आज से करीब साठ साल पहले नक्सलबाड़ी गांव में जमींदारों के शोषण और अत्याचार तथा पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ वामपंथियों के एक वर्ग द्वारा संगठित किसानों मजूदरो के हिंसक विद्रोह के साथ शुरू हुई थी। यह बगावत इस विचार से प्रेरित थी कि देश में राजनीतिक-सामाजिक क्रांति  बंदूक की नली से आ सकती है।

यह पूंजीवादी शोषक व्यवस्था के खिलाफ खुला और हिंसक विद्रोह था। हालांकि न तो व्यवस्था बदली और  न ही शोषण खत्म हुआ। अलबत्ता लंबे समय तक रक्तपात जरूर चलता रहा। यही नहीं, जिन देशों में इस तरह की सफल क्रांति हुई, उनमें से अधिकांश इस सिद्धांत से किनारा कर प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से पूंजीवाद की गोद में बैठ चुके हैं। 

दिमागी नक्सलवाद कहकर किसपर साधा निशाना?
  
यहां सवाल यह है कि प्रधानमंत्री मोदी ने आखिर दिमागी नक्सल कहा किसे? क्या यह केवल देश में हिंसक क्रांति के समर्थक दिमागों के बाकी बचे अवशेषों के लिए कहा गया अथवा इसके दायरे में वो सभी लोग हैं, जो मोदी, भाजपा और संघ से अहसमत हैं, या फिर वो तमाम लोग और खासकर जेन जी भी है, जो किसी खास राजनीतिक विचारधारा  के समर्थक न होकर केवल अपने हकों की मांग कर रही है? और सियासी पार्टियां उन्हें पीछे से समर्थन दे रही हैं।

कुछ विरोधियों का यह भी कहना है कि संसद में महिला आरक्षण और परिसीमन बिल पारित करने में नाकाम रही सरकार अब ‘दिमागी नक्सल’ का नया शगूफा लेकर आई है।
 
अगर असहमति और न्याय मांगना  ही ‘दिमागी नक्सल’ होना है तो फिर झारखंड या बिहार में न्याय मांगने वाले छात्र क्या हैं? उसी तरह अगर बंदूक के जरिए  ही सामाजिक-राजनीतिक न्याय की प्राप्ति संभव होती तो इस देश में क्रांति कब की आ जाती? लेकिन यह देश मूलत: गांधी के रास्ते पर चलने और उसे ही संघर्ष का स्वाभाविक और बहुमान्य स्वरूप मानने वाला देश है।

हालांकि इसके लेकर भी असमतियां रही हैं, लेकिन ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है। इसी सत्ता परिवर्तन  भी वोट के जरिए हो, यह सर्व स्वीकार्य है।  

दिमागी नक्सल ‘गांधीयन्स विद गन्स’

जहां तक ‘दिमागी नक्सल’ की व्याख्या की बात है तो भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु मिश्रा ने कहा कि दिमागी नक्सल ‘गांधीयन्स विद गन्स’ है। यानी बंदूकधारी गांधीवादी। यह अपने आप में ही विरोधाभासी है। गांधी के साथ लाठी तो हो सकती है, गन कैसे हो सकती है। सुधांशु शायद यह कहना चाहते हैं कि दिमागी नक्सल ‘प्रच्छन्न गांधीवादी’ हैं।

जो बात तो गांधी की करते हैं, लेकिन हिंसा के जरिए देश में अराजकता फैलाना चाहते हैं। सरकार को अस्थिर करना चाहते हैं। किसी भी मुद्दे और आंदोलन का इसका माध्यम बनाने की कोशिश की जाती है। मोदी सरकार की नीतियों और कानूनों आदि की गलत अथवा अर्द्धसत्यात्मक व्याख्या की जाती है।  

‘दिमागी नक्सल’ से खुद को जोड़ने वाली पहली प्रतिक्रिया कांग्रेस नेता और देश के पूर्व गृहमंत्री रहे पी. चिदम्बरम् की तरफ से आई। उन्होंने कहा कि मुझे अपने ‘दिमागी नक्सल’ होने पर गर्व है। इस पर एक प्रतिक्रिया यह भी आई कि ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का पहली बार प्रयोग तो चिदम्बरम ने ही 2010 में किया था, जैसे कि ‘हिंदू आतंकवाद।‘ यानी मोदी ने तो उसे आज के संदर्भ में दोहराया भर है। इसी तरह आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने कहा कि मैं भी दिमागी नक्सली हूं, क्योंकि मैं देशभक्त हूं। 

वैसे ज्यादातर विपक्षी नेताओं  का मानना है कि बात भले ही दिमागी नक्सली की हो, असल में इसकी आड़ में हर सरकार विरोधी स्वर को दबाने की चाल है। माकपा महासचिव एम. ए. बेबी ने कहा कि उनकी पार्टी नक्सलवाद का विरोध करती है, लेकिन सरकार द्वारा  माओवादियों से निपटने में कानून और संविधान का उल्लंघन करने के भी खिलाफ है।

उन्होंने कहा कि 'नक्सलवाद एक राजनीतिक दृष्टिकोण और विचारधारा है, जिससे हम सभी पूरी तरह असहमत हैं। बेबी के मुताबिक यह कहना कि उनके दिमाग में माओवादी विचार हैं, एक सुविधाजनक और बेहद आपत्तिजनक आरोप है।‘' 

इसमें दो राय नहीं कि व्यवस्था से नाराज और परेशान हर व्यक्ति ‘दिमागी नक्सल’ तो नहीं हो सकता। फिर नक्सल होने के लिए भी ‘दिमाग’ की दरकार तो है। भले ही खुराफाती क्यों न हो। वरना यह शब्द ही नहीं बनता। इसके पहले प्रचलित ‘अर्बन नक्सल’ में ऐसी कोई प्री-कंडीशन नहीं थी। 

विपक्ष को आशंका है कि ‘दिमागी नक्सल’ की आड़ में सरकार हर उस शख्स को दबोच सकती है, जो सवाल करे, सरकार की नीतियों और मंशा पर उंगली उठाए। व्यवहार में ऐसा होगा या नहीं, होगा तो किस हद तक होगा, इस बारे में अभी कुछ भी स्पष्ट नहीं है। थोड़े बहुत ‘दिमागी नक्सल’ समूचे देश के मानस को नहीं बदल सकते।

बहरहाल देश में मोदी के भाषण के बाद नया दिमागी नरेटिव वाॅर शुरू हो चुका है, जिसमें हर कोई अपनी सुविधा और पूर्वाग्रह के साथ तलवार भांज रहा है। इसका अंजाम देखने के लिए हमे रूकना होगा।



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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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