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Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   First 100 Days of Suvendu Adhikari Government in West Bengal: A Shift in Policy and Politics

शुभेंदु सरकार के 100 दिन: क्या बदला, क्या मिला, क्या अधूरा रहा?

सार

100 Days of Suvendu Adhikari: आज शुभेंदु अधिकारी सरकार के 100 दिन पूरे हो गए। सत्ता परिवर्तन के बाद सरकार ने स्वास्थ्य, महिला कल्याण, निवेश और प्रशासन में बदलाव को अपनी प्राथमिकता बनाया है। लेकिन रोजगार, कानून-व्यवस्था, औद्योगिक जमीन पर काम और वित्तीय दबाव जैसे सवाल अभी बाकी हैं। इसलिए 100 दिनों का रिपोर्ट कार्ड उपलब्धियों से अधिक आने वाले पांच वर्षों की दिशा का संकेत है।
 

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First 100 Days of Suvendu Adhikari Government in West Bengal: A Shift in Policy and Politics
100 Days of BJP in West Bengal - फोटो : ANI

विस्तार

100 Days of BJP in West Bengal: सत्ता परिवर्तन के बाद सबसे बड़ा सवाल- क्या बदला? पश्चिम बंगाल में 2026 का सत्ता परिवर्तन सिर्फ सरकार बदलने की घटना नहीं है। लंबे तृणमूल शासन के बाद भाजपा की सरकार और शुभेंदु अधिकारी का मुख्यमंत्री बनना राज्य की राजनीति में बुनियादी बदलाव है। 9 मई को शपथ लेने वाली सरकार के सामने सबसे पहली चुनौती थी कि चुनावी नारों और वादों को प्रशासनिक फैसलों में बदला जाए। 

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पहले 100 दिनों में सरकार ने यह संकेत देने की कोशिश की है कि उसकी प्राथमिकताएं पिछली सरकार से अलग हैं। आयुष्मान भारत को लागू करना, महिला-केंद्रित अन्नपूर्णा योजना, उद्योगों को आकर्षित करने के लिए नई नीतियों की तैयारी और केंद्र के साथ बेहतर तालमेल इसी बदलाव का हिस्सा हैं।
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स्वास्थ्य: सबसे बड़ा नीतिगत बदलाव

सरकार की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में आयुष्मान भारत को पश्चिम बंगाल में लागू करना है। सरकार का दावा है कि इससे राज्य के करोड़ों लोगों को देशभर में कैशलेस इलाज की सुविधा मिलेगी। स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने के लिए केंद्र से करीब 3,000 करोड़ रुपये की मंजूरी और शुरुआती 500 करोड़ रुपये जारी होने की बात भी सामने आई है। 
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राजनीतिक दृष्टि से इसका महत्व और अधिक है। ममता बनर्जी सरकार की स्वास्थ्यसाथी योजना के समानांतर अब आयुष्मान भारत राज्य की नई स्वास्थ्य नीति का चेहरा बन रहा है। लेकिन सरकार की वास्तविक परीक्षा तब होगी, जब गरीब मरीज बिना कागजी जटिलताओं के अस्पताल में इसका लाभ उठा पाएंगे।

महिलाओं को साधने की कोशिश

अन्नपूर्णा योजना शुभेंदु सरकार की दूसरी बड़ी राजनीतिक और सामाजिक पहल है। रिपोर्टों के अनुसार योजना के तहत पात्र महिलाओं को 3,000 रुपये मासिक सहायता देने का प्रावधान है और बड़ी संख्या में लाभार्थियों को भुगतान शुरू किया गया है। हालांकि बड़ी संख्या में आवेदनों की जांच और कुछ आवेदन खारिज किए जाने से पात्रता तथा सत्यापन की चुनौती भी सामने आई है। 

यहां राजनीति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बंगाल की चुनावी राजनीति में महिला मतदाता निर्णायक रहे हैं। इसलिए अन्नपूर्णा योजना सिर्फ कल्याणकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि भाजपा के नए सामाजिक आधार को मजबूत करने का प्रयास भी है। आने वाले वर्षों में यह देखना होगा कि योजना आर्थिक रूप से कितनी टिकाऊ रहती है।

उद्योग और रोजगार: असली परीक्षा यहीं

बंगाल में सत्ता परिवर्तन का सबसे बड़ा वादा रोजगार और औद्योगिक पुनरुद्धार का था। नई सरकार निवेश-अनुकूल माहौल बनाने के लिए औद्योगिक और भूमि नीति में बदलाव की तैयारी कर रही है। टाटा समूह के साथ करीब 28,000 करोड़ रुपये के संभावित निवेश पर बातचीत को सरकार अपने उद्योग एजेंडे की बड़ी उपलब्धि के रूप में देख रही है।
 
लेकिन यहां सरकार को सावधानी से चलना होगा। निवेश की घोषणा और वास्तविक निवेश में अंतर होता है। जमीन पर कारखाना, उत्पादन और स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार शुरू होने तक किसी भी निवेश प्रस्ताव को उपलब्धि मानना जल्दबाजी होगी। बंगाल की अर्थव्यवस्था के लिए अगले दो-तीन साल इस सरकार की सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा होंगे।

प्रशासन और कानून-व्यवस्था

भाजपा लंबे समय से बंगाल में राजनीतिक हिंसा, भ्रष्टाचार और प्रशासन के राजनीतिकरण का मुद्दा उठाती रही है। इसलिए सत्ता में आने के बाद शुभेंदु सरकार के लिए कानून-व्यवस्था केवल सामान्य प्रशासनिक विषय नहीं, बल्कि उसकी राजनीतिक विश्वसनीयता का प्रश्न है।

हाल के दिनों में पुलिस हिरासत में मौत के मामले में अधिकारियों पर कार्रवाई और मुख्यमंत्री का पीड़ित परिवार से मिलना यह संकेत देता है कि सरकार जवाबदेही दिखाने की कोशिश कर रही है। लेकिन दूसरी ओर राजनीतिक टकराव और हिंसा की घटनाएं पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं।

इसलिए 100 दिनों के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि बंगाल की राजनीतिक हिंसा का दौर समाप्त हो गया है। सरकार को निष्पक्ष पुलिसिंग और कानून का समान अनुपालन सुनिश्चित करना होगा।

राजनीति का रंग भी बदला

शुभेंदु सरकार ने प्रशासनिक बदलाव के साथ प्रतीकों की राजनीति में भी परिवर्तन किया है। 16 अगस्त को 'आयुष्मान दिवस' मनाने का फैसला इसी राजनीतिक-सांस्कृतिक बदलाव का उदाहरण है। यह ममता बनर्जी सरकार के 'खेला होबे दिवस' से अलग राजनीतिक संदेश देता है। 

नेताजी सुभाष चंद्र बोस और खुदीराम बोस जैसे बंगाल के राष्ट्रवादी प्रतीकों को लेकर सरकार की सक्रियता भी भाजपा के उस प्रयास का हिस्सा है जिसमें वह बंगाली अस्मिता को राष्ट्रवादी राजनीति के साथ जोड़ना चाहती है। खुदीराम बोस की जन्मभूमि के विकास के लिए पांच करोड़ रुपये की योजना इसका एक उदाहरण है। 

क्या अधूरा रह गया?

सबसे बड़ा सवाल रोजगार का है। सरकारी नौकरियों में पारदर्शिता, भर्ती प्रक्रिया और युवाओं के लिए निजी क्षेत्र में अवसर पैदा करना अभी लंबी चुनौती है। उद्योगों के लिए जमीन, निवेशकों का भरोसा, बिजली-पानी और आधारभूत ढांचे को मजबूत करना भी समय मांगता है।

दूसरी चुनौती वित्तीय स्थिति है। मुख्यमंत्री ने दावा किया है कि अगले एक-दो वर्षों में राज्य वित्तीय रूप से मजबूत होगा और सरकार कारोबारी माहौल सुधारने की दिशा में काम कर रही है। लेकिन कल्याणकारी योजनाओं और विकास परियोजनाओं के बीच वित्तीय संतुलन बनाना आसान नहीं होगा। 

सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती

शुभेंदु अधिकारी की सरकार को अब दो मोर्चों पर एक साथ लड़ना है। एक तरफ उसे अपने समर्थकों की अपेक्षाएं पूरी करनी हैं और दूसरी तरफ उन मतदाताओं को भरोसा दिलाना है जिन्होंने बदलाव के लिए भाजपा को वोट दिया लेकिन अब सरकार के कामकाज का मूल्यांकन करेंगे।

तृणमूल कांग्रेस का मजबूत राजनीतिक आधार पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। इसलिए सरकार की हर प्रशासनिक चूक राजनीतिक मुद्दा बनेगी और हर उपलब्धि को विपक्ष चुनौती देगा। यही कारण है कि शुभेंदु सरकार के लिए पहले 100 दिन राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जरूर हैं, लेकिन निर्णायक नहीं।

100 दिन, रिपोर्ट कार्ड नहीं- दिशा का संकेत

शुभेंदु सरकार के 100 दिनों को फिलहाल 'बदलाव की शुरुआत' कहा जा सकता है, अंतिम रिपोर्ट कार्ड नहीं। स्वास्थ्य और महिला कल्याण में कुछ ठोस कदम दिखाई देते हैं, उद्योग और निवेश के मोर्चे पर दिशा तय करने की कोशिश शुरू हुई है और प्रशासनिक स्तर पर नई कार्यशैली का संकेत मिला है।

लेकिन बंगाल की जनता के लिए असली सवाल इससे आगे के हैं-क्या उद्योग आएगा? क्या युवाओं को रोजगार मिलेगा? क्या राजनीतिक हिंसा रुकेगी? क्या सरकारी योजनाओं का लाभ बिना भेदभाव मिलेगा? और क्या सरकार अपनी घोषणाओं को लंबे समय तक वित्तीय रूप से चला पाएगी? इन सवालों के जवाब अगले 100 दिनों में नहीं, बल्कि अगले दो-तीन वर्षों में मिलेंगे। इसलिए शुभेंदु सरकार के पहले 100 दिन उत्सव से ज्यादा वायदे और परिणाम के बीच की दूरी मापने का पहला पड़ाव हैं।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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