AI Voice Technology: एलेक्सा और सिरी कैसे करते हैं इन्सानों से बातें, आवाज के पीछे कौन सी तकनीक करती है काम?
एलेक्सा और सिरी जैसे डिजिटल सहायक इंसानों की तरह बातचीत करते हुए क्यों सुनाई देते हैं? इनके पीछे कौन सी तकनीक काम करती है, जो लिखे हुए शब्दों को आवाज में बदलती है। पहले मशीनों की आवाज अजीब और रोबोट जैसी होती थी, लेकिन मशीन लर्निंग और एआई ने इसे काफी बदल दिया है। अब एआई कुछ सेकंड की आवाज से किसी व्यक्ति की आवाज की नकल भी कर सकता है। आखिर यह तकनीक काम कैसे करती है? आइए, टैम गुयेन के इस ब्लॉग में सबकुछ विस्तार से जानते हैं...
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विस्तार
जब हम एलेक्सा या सिरी से कोई सवाल पूछते हैं और जवाब सुनते हैं, तो आवाज इतनी सामान्य लगती है कि कुछ पल के लिए यह भूलना आसान हो जाता है कि सामने इंसान नहीं, बल्कि मशीन है। इस आवाज के पीछे टेक्स्ट-टू-स्पीच तकनीक काम करती है। इसका सीधा काम लिखे हुए शब्दों को ऐसी आवाज में बदलना है, जिसे इंसान आसानी से सुन और समझ सके। आज यह तकनीक फोन, कंप्यूटर और दूसरे डिजिटल उपकरणों में तेजी से इस्तेमाल हो रही है।
इंसान के बोलने और कंप्यूटर के बोलने में क्या अंतर है?
इंसान जब बोलता है तो फेफड़ों से निकली हवा श्वास नली से होकर गले में मौजूद वोकल कॉर्ड्स तक पहुंचती है। इनके कंपन से आवाज पैदा होती है। इसके बाद दिमाग मुंह, जीभ और होंठों की मदद से इस आवाज को शब्दों का रूप देता है। कंप्यूटर के पास फेफड़े, गला, जीभ या होंठ नहीं होते। वह इस पूरी प्रक्रिया की नकल इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल और स्पीकर की मदद से करता है। सॉफ्टवेयर सिग्नल तैयार करता है और स्पीकर उन्हें कंपन में बदल देता है।
आवाज बनाने वाली मशीनों का सफर कितना पुराना है?
मशीन से इंसानी आवाज निकालने की कोशिश नई नहीं है। 1700 के दशक में आविष्कारकों ने ऐसी मशीनें बनाने की कोशिश की, जो फेफड़ों और गले की नकल कर सकें। इन मशीनों से निकलने वाली आवाज काफी अजीब और डरावनी होती थी। 1930 के दशक में इलेक्ट्रॉनिक स्पीच मशीनें सामने आईं। इनमें वोडर सबसे प्रसिद्ध मशीनों में शामिल थी। इसे चलाने के लिए कई इलेक्ट्रॉनिक बटन, कीज और फुट पैडल का इस्तेमाल करना पड़ता था।
कंप्यूटर ने शब्दों को बोलना कब शुरू किया?
1960 के दशक तक कंप्यूटर आवाज की छोटी-छोटी इकाइयों यानी फोनीम को जोड़कर शब्द बोलने लगे थे। हालांकि, उनकी आवाज रुक-रुककर आती थी और सुनने में काफी रोबोट जैसी लगती थी। तकनीक आगे बढ़ने के साथ कंप्यूटर के पास शब्दों और ध्वनियों को जोड़ने के बेहतर तरीके आए। इसके बाद मशीन लर्निंग और एआई ने इस क्षेत्र को पूरी तरह बदलना शुरू कर दिया। अब मशीनें सिर्फ शब्द नहीं बोलतीं, बल्कि बोलने के अंदाज को भी समझने की कोशिश करती हैं।
एआई की आवाज इतनी इंसानी जैसी कैसे हो गई?
आधुनिक एआई को इंसानी बातचीत की रिकॉर्डिंग से प्रशिक्षित किया जाता है। इस दौरान वह आवाज के बहुत छोटे-छोटे पैटर्न को समझना सीखता है। इनमें शब्दों का उच्चारण, बोलने की गति और आवाज में आने वाले बदलाव शामिल होते हैं। इसी वजह से आज की कंप्यूटर आवाज पहले की तुलना में ज्यादा स्वाभाविक लगती है। एआई के पास जितना बेहतर प्रशिक्षण और तकनीक होती है, उसकी बनाई आवाज उतनी ही ज्यादा इंसानी जैसी सुनाई दे सकती है।
क्या एआई किसी इंसान की आवाज की नकल भी कर सकता है?
हां, उन्नत एआई तकनीक कुछ सेकंड की आवाज सुनकर किसी व्यक्ति की आवाज की नकल करने में सक्षम हो सकती है। इसके बाद वह उस आवाज में ऐसे वाक्य भी बोल सकती है, जिन्हें संबंधित व्यक्ति ने कभी कहा ही नहीं। यही क्षमता इस तकनीक को उपयोगी होने के साथ-साथ चिंताजनक भी बनाती है। किसी व्यक्ति की आवाज की नकल करके बनाई गई नकली रिकॉर्डिंग को वास्तविक समझा जा सकता है।
टेक्स्ट-टू-स्पीच तकनीक से क्या खतरा है?
टेक्स्ट-टू-स्पीच तकनीक लाखों लोगों के लिए उपयोगी है। यह उन लोगों की मदद कर सकती है, जिन्हें लिखने या पढ़ने में परेशानी होती है और डिजिटल उपकरणों के इस्तेमाल को आसान बनाती है। लेकिन इसका गलत इस्तेमाल ऑडियो डीपफेक के रूप में भी हो सकता है। किसी नेता, अधिकारी, कारोबारी या आम व्यक्ति की नकली आवाज बनाकर गलत बयान या झूठी सूचना फैलाना संभव है। इसलिए एआई से बनी आवाज को बिना जांचे सच मानना जोखिम भरा हो सकता है।
आखिर मशीन की आवाज के पीछे क्या चलता है?
एलेक्सा और सिरी जैसी आवाजों के पीछे कोई इंसानी फेफड़ा या वोकल कॉर्ड नहीं होता। यहां ध्वनि, सॉफ्टवेयर, स्पीकर, मशीन लर्निंग और एआई मिलकर काम करते हैं। कंप्यूटर लिखे हुए शब्दों को समझने लायक ध्वनि में बदलता है और स्पीकर उसे हमारे कानों तक पहुंचाता है। कभी रोबोट जैसी सुनाई देने वाली मशीन की आवाज आज काफी स्वाभाविक हो गई है। लेकिन यही तकनीक जितनी उपयोगी है, उतनी ही सावधानी की मांग भी करती है, क्योंकि नकली आवाज और असली आवाज में अंतर करना भविष्य में और मुश्किल हो सकता है।