इंसाफ का तराजूः तारीख पे तारीख से उबरने की एक पहल
Supreme Court Judges Strength: न्याय में देरी के बीच सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 38 करने का विधेयक पास हुआ है। हालांकि, अदालतों में भारी लंबित मामलों और कॉलेजियम विवाद के बीच त्वरित न्याय सुनिश्चित करना अब भी बड़ी चुनौती है।
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सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने का विधेयक
अब राहत की बात यह है कि भले संसद का ताजा मानसून सत्र शोरशराबे के लिए चर्चा में रहा लेकिन इसकी एक बड़ी उपलब्धि न्यायिक संशोधन विधेयक का पास होना है। हालांकि, संसद के दोनों सदनों में इस विधेयक पर कोई चर्चा नहीं हो पाई और बिना बहस के ही यह विधेयक पास हो गया। इसकी जरूरत इसलिए पड़ी, ताकि लंबित मुकदमों के त्वरित निष्पादन के लिए सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाई जा सके। इस विधेयक के संसद से पास होने के बाद अब सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 34 से बढ़कर 38 हो जाएगी। उम्मीद की जा सकती है कि जजों की संख्या बढ़ने से लंबित मामलों के निष्पादन में थोड़ी तेजी आएगी।
अदालतों में लंबित मामलों के आंकड़े
वैसे हकीकत तो यह है अदालतों पर मुकदमों का बोझ काफी ज्यादा है और शायद इसलिए तारीख-पे-तारीख का चलन पुराना है। राष्ट्रीय न्यायिक डाटा ग्रिड (एनएसडीजी) के आंकड़ों पर गौर फरमाएं तो सुप्रीम कोर्ट में ही करीब 95,936 मामले लंबित या विचाराधीन हैं। इनमें 10 साल से पुराने मामले करीब दस हजार से अधिक हैं। 20 साल से पुराने मामले 558 हैं। 30 साल से पुराने 26 मामले हैं। इसी तरह, हाईकोर्ट या निचली अदालतों में 5 करोड़ 63 लाख से अधिक मामले विचाराधीन हैं। हाईकोर्ट या निचली अदालतों में लंबित मामलों में एक साल से लंबित मामलों की संख्या 52 लाख के करीब है। 10 साल पुराने मामले 16 लाख हैं। 30 साल पुराने मामले करीब 84 हजार हैं।
उच्च न्यायालयों में रिक्त पदों की स्थिति
नये विधेयक के पास होने के बावजूद अब भी सुप्रीम कोर्ट में जज का एक पद खाली है। इसी तरह, देश के सभी 25 उच्च न्यायलयों में कुल स्वीकृत 1122 पदों में से 341 पद रिक्त हैं। रिक्त पदों की संख्या स्वीकृत पदों की तुलना में करीब 30 फीसदी है। इनमें सर्वाधिक इलाहाबाद हाईकोर्ट, उड़ीसा हाईकोर्ट, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख हाईकोर्ट में पद खाली हैं। इसी तरह 25 में से करीब 7 हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीश के पद खाली हैं। उडीसा हाईकोर्ट में तो 33 में 17 न्यायाधीश हैं। 2018 के बाद से उड़ीसा हाईकोर्ट का प्रतिनिधित्व सुप्रीम कोर्ट में नहीं हो पाया है। कई हाईकोर्ट कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के सहारे चल रहे हैं।
कॉलेजियम प्रणाली: सरकार बनाम न्यायपालिका का टकराव
न्यायाधीशों की नियुक्ति और प्रतिनियुक्ति प्रक्रिया में कॉलेजियम की अहम भूमिक होती है लेकिन इस कॉलेजिमय प्रक्रिया को लेकर विवाद छिड़ते रहे हैं। 2022 में कॉलेजियम को लेकर सुप्रीम कोर्ट और सरकार के बीच टकराव इस कदर बढ़ा कि 18 मई 2023 को तत्कालीन कानून मंत्री किरेन रिजिजू को बदलना पड़ा। अर्जुन मेघवाल को कानून मंत्री बनाया गया। 2015 के बाद से सुप्रीम कोर्ट ने कॉलेजियम प्रणाली में सरकारी हस्तक्षेप को संविधान के बुनियादी ढांचे पर हमला बताया। हालांकि, ऐसा नहीं कि कॉलेजियम का यह विवाद केवल इसी सरकार में हुआ। इससे पहले 1981, 1993, 1998 में भी कॉलेजियम को लेकर सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच ठनी थी। न्यायपालिका की ओर से नियुक्तियों में कार्यपालिका के एकाधिकार को बार-बार चुनौती दी जाती रही है।
न्यायपालिका के भीतर कॉलेजियम पर उठते सवाल
और तो और कॉलेजियम प्रणाली का यह विवाद केवल सरकार बनाम सुप्रीम कोर्ट तक ही सीमित नहीं रहा। कॉलेजियम व्यवस्था को लेकर न्यायपालिका के भीतर भी अंदरुनी आवाज उठी है। 2018 में सुप्रीम कोर्ट के चार बड़े जजों जस्टिस चेलामेश्वर,जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन वी लोकुल और जस्टिस कूरियन जोसेफ ने सार्वजनिक प्रेस कांफ्रेंस कर तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा पर कॉलेजियम व मुकदमों के आवंटन में पारदर्शिता की कमी का खुला आरोप लगाया था। इसी तरह, 2022 में मुख्य न्यायाधीश यू यू ललित ने कॉलेजियम बैठक होने पर जजों की नियुक्ति के प्रस्ताव को मंजूरी के लिए सर्कुलेशन के जरिये भेजा। 2025 में कॉलेजियम विवाद में आंतरिक मतभेद पर जस्टिस बी वी नागरत्ना ने असहमति नोट दिया। अब हाल में ही न्यायाधीश उज्जवल भुईया ने कॉलेजियम प्रणाली पर सवाल उठाया है। जस्टिस कुरैशी विवाद में भी जस्टिस नरीमन ने बैठक का बहिष्कार किया था।
त्वरित न्याय की उम्मीद और सामूहिक प्रयास की जरूरत
सरकार बनाम न्यायपालिका और न्यापालिका के अंदरुनी विवादों की इन लंबी फेहरिस्त के बीच अब संसद के ताजा मानसून सत्र में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने संबंधी संशोधन विधेयक का पास होना, न्याय में तेजी लाने की दिशा में एक उम्मीद जगाता है। हालांकि, अदालतों में अब भी न्यायाधीशों के पद खाली हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में त्वरित सुनवाई के अधिकार को नागरिकों का मौलिक अधिकार माना गया है। उम्मीद यह भी की जानी चाहिए कि कॉलेजियम बनाम सरकार और खुद न्यायपालिका के अंदरुनी विवाद थमे, लंबित मामलों का निष्पादन त्वरित गति से हो ताकि तारीख पे तारीख या जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनायड के कहावत से समूचा तंत्र उबर सके। फिर कोई अर्जुन माझी न हो, जिसे सबूतों के अभाव में 20-22 साल बाद खुद सुप्रीम कोर्ट को यह टिप्पणी करते हुए आजाद करना पड़े कि यह न्यायिक व्यवस्था की सामूहिक विफलता है। इस सामूहिक विफलता से उबरने के लिए जरूरी है कि सरकार के साथ-साथ अदालतें भी सामूहिक प्रयास करें। हर साल की तरह इस पंद्रह अगस्त को भी अलग-अलग राज्यों से सैकड़ों बंदियों की रिहाई हुई। आजादी के आठवें दशक में इंसाफ की जगी यह उम्मीदें आगे भी कायम रहे, ताकि कोई और अर्जुन माझी इंसाफ की आस में वर्षों कालकोठरी में यूं ही कैद न रह जाए।
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