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जीवन धारा: ईश्वर तो जीवन की हर धड़कन में मौजूद है
Thu, 25 Jun 2026 07:26 AM IST
Devesh Tripathi
महर्षि अरविंद
महर्षि अरविंद
Published by: Devesh Tripathi
Updated Thu, 25 Jun 2026 07:26 AM IST
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जीवन धारा
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विस्तार
मनुष्य सदियों से ईश्वर को खोज रहा है। इसके लिए उसने मंदिर बनाए, तीर्थ यात्राएं कीं और गुफाओं में ध्यान किया। उसकी कल्पना में ईश्वर इस संसार से परे किसी दूसरे लोक में विराजमान है, जैसे वह जीवन से अलग कोई सत्ता हो और कहीं दूर बैठ कर इस संसार को चला रहा हो। लेकिन, मैं कहता हूं कि यदि ईश्वर अनंत है, तो वह किसी एक स्थान में सीमित कैसे हो सकता है! यदि वह सर्वव्यापी है, तो वह केवल स्वर्ग में ही क्यों होगा, पृथ्वी पर क्यों नहीं? यदि वही समस्त अस्तित्व का स्रोत है, तो जीवन उससे अलग कैसे हो सकता है?मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यह है कि उसने ईश्वर और जीवन को अलग-अलग मान लिया है। इसी भ्रम के कारण उसने आध्यात्मिकता को जीवन से अलग कर दिया। उसे लगता है कि सत्य की खोज के लिए जीवन का त्याग करना होगा, संसार से दूर जाना होगा, संबंधों और कर्मों को छोड़ना होगा। पर, सृष्टि का रहस्य इससे भी अधिक गहरा है। ईश्वर जीवन के बाहर नहीं खड़ा है। वह जीवन के भीतर से स्वयं को प्रकट कर रहा है। इसलिए, जब मैं कहता हूं कि ईश्वर जीवन के भीतर कार्य कर रहा है, तो मेरा आशय केवल इतना नहीं कि वह मनुष्य की सहायता करता है। मेरा अर्थ इससे कहीं अधिक गहरा है। मैं कहता हूं कि जीवन स्वयं उसकी कार्यशाला है। इतिहास, संस्कृति, संघर्ष, प्रेम, ज्ञान, कला-ये सब उसी महान प्रक्रिया के भाग हैं, जिनके जरिये दिव्यता स्वयं को प्रकट कर रही है। मनुष्य अक्सर संसार के दुखों को देख कर पूछता है कि यदि ईश्वर है, तो इतना संघर्ष क्यों है? यह प्रश्न स्वाभाविक है। किंतु, हमें यह समझना होगा कि विकास की प्रक्रिया सदैव क्रमिक होती है। बीज एक ही क्षण में वृक्ष नहीं बन जाता। उसे मिट्टी, अंधकार, वर्षा, धूप और समय की जरूरत होती है। उसी प्रकार चेतना का विकास भी धीरे-धीरे होता है। तो, यदि ईश्वर जीवन के भीतर कार्य कर रहा है, तो जीवन का त्याग क्यों किया जाए? जब तुम अपने कार्य को पूरे समर्पण के साथ करते हो, तब ईश्वर कार्य कर रहा होता है। जब तुम सत्य के लिए खड़े होते हो या जब तुम प्रेम करते हो, तब भी वही कार्य कर रहा होता है और जब तुम अंधकार के बीच भी आशा बनाए रखते हो, तब भी।
ईश्वर को दूर मत खोजो। वह केवल मंदिरों और ध्यान की निस्तब्धता में नहीं है, वह हर जगह मौजूद है। जीवन की हर धड़कन में है। सृष्टि में कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जिसे ईश्वर ने बनाकर छोड़ दिया हो। इसलिए, आध्यात्मिकता का लक्ष्य संसार से दूर किसी स्वर्ग को प्राप्त करना नहीं, बल्कि यह देखना है कि स्वर्ग की संभावना पृथ्वी पर ही है। दिव्यता कहीं बाहर प्रतीक्षा नहीं कर रही, वह तो जीवन के हृदय में है। और, जिस दिन मनुष्य इस सत्य को अनुभव कर लेगा, उस दिन उसके लिए संसार और ईश्वर के बीच का विभाजन समाप्त हो जाएगा। तब वह जान जाएगा कि उसकी अपनी यात्रा भी उसी महान दिव्य कार्य का एक हिस्सा है।