विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: बच्चियों की आशा, समाजिक-धार्मिक बंदिशें
पहली फिल्म ‘वाजदा’ की निर्देशिका 40 साल की हैफा अल-मंसूर है, जो सऊदी अरबिया की रहने वाली हैं। दूसरी फिल्म की निर्देशिका ने ‘बुद्धा कोलापस्ड आउट ऑफ शेम’ फिल्म बनाने तक 20 साल पूरे नहीं किए थे।
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कुछ दिनों पहले भारत में एक नारा उछला था, ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’। इससे एक बात स्पष्ट होती है, बेटियों का जीवन खतरे में है। नारे का दूसरा हिस्सा बेटियों को शिक्षित करने से संबंधित है। इससे समाज का बेटियों के प्रति नजरिया पता चलता है।
क्यों हमें ऐसे नारे की आवश्यकता पड़ती है? समाज-परिवार बेटे-बेटियों में फर्क करता है, यह सबकी जानी-देखी रोज की हरकत है। अगर भारत के बाहर नजर डालें तो बेटे-बेटियों के बीच किया गया फर्क दुनिया के अधिकांश समाज में दिखता है। इसकी जांच हम कुछ फिल्मों के माध्यम से कर सकते हैं।
भारत के बाहर की दो फिल्मों के द्वारा यह देखने का प्रयास करती हूं। फिल्में ली हैं, जिन्हें बनाने वाले पुरुष नहीं बल्कि औरतें हैं, बनाने वाली बूढ़ी औरतें नहीं हैं, युवा स्त्रियां हैं और इन फिल्मों की केंद्रीय पात्र लड़कियां ही हैं। ऐसी बच्चियां जिन्हें अपनी छोटी-छोटी आशाओं-इच्छाओं के लिए समाज से टकराना पड़ता है। समाज इनके रास्ते में तमाम रोड़े अटकाता है।
ग्यारह वर्ष की वाजदा (वाद मोहम्मद) की एक छोटी-सी इच्छा है। वाजदा साइकिल खरीद कर पड़ोसी अब्दुल्ला (अब्दुल्ला रहमान अल्गोहानी) को साइकिल रेस में हराना चाहती है। दूसरी ओर उससे छोटी छ: साल की बख्ते (निक्बख्त नौरोज) स्कूल जाकर मजेदार कहानियां सीखना चाहती है। यहां उसका हम उम्र अब्बास (अब्बास अलिजोमे) स्कूल जाता है।
- पहली कहानी सऊद अरबिया के रियाद में घटित हो रही है, दूसरी का कथानक अफगानिस्तान में स्थापित है। पहली फिल्म ‘वाजदा’ की निर्देशिका 40 साल की हैफा अल-मंसूर है, जो सऊदी अरबिया की रहने वाली हैं।
- दूसरी फिल्म की निर्देशिका ने ‘बुद्धा कोलापस्ड आउट ऑफ शेम’ फिल्म बनाने तक 20 साल पूरे नहीं किए थे।
हाना मखमलबाफ ईरान की पैदाइश हैं। दोनों ने अपनी फिल्म में अपने अनुभव भी पिरोए हैं। हैफा के लिए शूटिंग कठिन रही, हाना के लिए भी आसान न रही होगी।
लड़की की जिंदगी में पिता की अहम भूमिका होती है। वह उसका पहला आदर्श पुरुष होता है। दोनों फिल्मों में पिता तकरीबन गायब है जबकि दोनों निर्देशिकाएं अपने पिता की सहायता एवं प्रेरणा-प्रभाव से इस मुकाम तक पहुंची हैं। हैफा कवि अब्दुल रहमान मंसूर की बेटी हैं जिन्हें उनके पिता ने सिनेमाघर के अभाव में वीडियो पर फिल्म दिखाई और वे फिल्म स्टडी हेतु सिडनी गईं।
हाना मखमलबाफ
हाना प्रसिद्ध ईरानी निर्देशक मोहसिन मखमलबाफ की छोटी बेटी हैं। उनका पूरा परिवार पिता-मां, सौतेली-मौसेरी बहन, भाई सब फिल्म बनाते हैं। उन्होंने फिल्म बनाने की व्यावहारिक शिक्षा अपने पिता से ली है। दोनों की यह पहली फिल्म है। वाद मोहम्मद की भी पहली फिल्म है, बख्ते गैर-पेशेवर बच्ची है।
धनी घर की वाजदा तथा गरीब बख्ते दोनों मासूम, बुद्धिमान, संवेदनशील और लगन की पक्की हैं। वाजदा लड़कियों के स्कूल जाती है, बख्ते स्कूल जाने की हर संभव कोशिश कर रही है। दोनों बड़े लड़के प्यारे हैं और अपनी दोस्त के साथ हैं, अब्दुल्ला की शरारत वाजदा को साइकिल खरीदने की जिद को जुनून तक ले जाती है। बख्ते में अब्बास को पढ़ते देख स्कूल जाने की इच्छा पैदा होती है।
पिता की अनुपस्थिति में साइकिल कैसे आए, बख्ते के घर में खैर कुछ नहीं ही है। वह स्कूल केलिए कॉपी-पेंसिल कहां से लाए। दोनों तमाम तरीके आजमाती हैं। वाजदा प्रतियोगिता जीतने केलिए कुरान रट रही है ताकि ईनाम की रकम से साइकिल खरीद सके, डर है तब तक साइकिल बिक न जाए। प्रतियोगिता जीतने के बाद भी रकम उसके हाथ नहीं लगती है। बख्ते चार अंडे बेच कर कॉपी खरीदने वाली है, मां की लिपस्टिक से पेंसिल का काम लिया जा सकता है। दोनों के लिए यह कठिन डगर है, बख्ते के लिए जीवन की बाजी लगाना है, क्योंकि वह तालिबान शासित देश में रह रही है।
धार्मिक कट्टरता रियाद में भी है। लड़कियों-औरतों को शरीर ढक कर रहना है, लड़कों के साथ भिन्न व्यवहार दोनों जगहों पर है। वाजदा की मां बेटा पैदा नहीं कर पाई इसलिए उसका पिता दूसरी शादी कर रहा है, उसकी दादी अपने बेटे के पक्ष में है।
‘वाजदा’ का स्क्रीनप्ले हैफा मंसूर ने स्वयं तैयार किया जबकि हाना की फिल्म का स्क्रीनप्ले उनकी मां मारजीह मखमलबाफ ने लिखा है। ‘वाजदा’ की सिनेमाटोग्राफी लुट्ज रेटमीयर की है, ‘बुद्धा कोलापस्ड आउट ऑफ शेम’ का कैमरा उस्ताद अली ने संभाला है।
पहली फिल्म 2012 में वेनिस फिल्म समारोह में दिखाई गई, फिल्म सर्वोत्तम विदेशी फिल्म का पुरस्कार ले आई। वैसे कुल 22 पुरस्कार मिले। यह सऊदी अरबिया की पहली फिल्म थी जिसे ऑस्कर के लिए भेजा गया था। ‘बुद्धा कोलापस्ड आउट ऑफ शेम’ को कुल आठ पुरस्कार मिले, सारे-के-सारे हाना मखमलबाफ को प्राप्त हुए।
बच्चे सब देखते हैं, भले सब समझते नहीं हैं। बड़ों की कई बातें आत्मसात कर लेते हैं, जैसे अफगानिस्तान में कुछ लड़के स्कूल जाते हैं, बहुत सारे लडकों ने तालिबानी जीवन शैली अनजाने में अपना ली है। वे लड़की के खुले बाल, लिपस्टिक सहन नहीं कर सकते हैं। किसी को नापसंद करने पर उसे अमेरिकी जासूस कह सकते हैं, भले वह छ: साल की बच्ची हो। कब्र खोद कर दफनाने, संगसारी करना, टहनी से बंदूक बना कर गोली चलाने का काम कर सकते हैं। अब्दुल्ला वाजदा का दुपट्टा खींच सकता है।
दोनों फिल्मों में कट्टरपंथ, पितृसत्तात्मकता, अत्याचार, हिंसा और बहुत कुछ है। हां, इन्हीं दकियानूसी समाज में आज की पीढ़ी के कुछ संवेदनशील, सकारात्मक व्यवहार वाले लड़के हैं। अब्दुल्ला वाजदा को साइकिल चलाना सिखाता है। अब्बास बख्ते को हाथ पकड़ कर स्कूल ले जाता है, जब नजर नहीं आती है तो नाम लेकर उसे जोर-जोर से पुकारता है। जहां वाजदा के पिता एवं बख्ते को सताने वाले लड़कों को देख कर निराशा होती है वहीं अब्दुल्ला एवं अब्बास को देख कर भविष्य केलिए सकारात्मक आशा पनपती है।
पर्सियन भाषा की ‘बुद्धा कोलापस्ड आउट ऑफ शेम’ एवं अरबी भाषा की ‘वाजदा’ दोनों दिखाती हैं कि स्वतंत्रता, समानता, भाईचारा यूं ही नहीं मिलता है, इन्हें कमाना पड़ता है। ‘बुद्धा कोलापस्ड आउट ऑफ शेम’ का एक डॉयलॉग बहुत मानीखेज है, ‘इन ऑर्डर टू सेट यू फ्री...डाई’। अगर ठान लिया जाए तो मंजिल पाने में बाधाओं के बावजूद उस तक पहुंचा जा सकता है।
ये बच्चियां सोते हुएस्वप्न नहीं देख रही हैं, इनकी जागती आंखों में सपने हैं और इन सपनों को पाने का उत्साह, लगन, विश्वास है एवं अपने सपने साकार करने केलिए ये जी-जान से संघर्षरत हैं। भला कौन इन्हें रोक सकेगा!
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