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Holi in Rajasthan: शेखावाटी में ढ़फ की ताल पर होली मनाते हैं लोग

Ramesh saraf रमेश सर्राफ
Updated Tue, 10 Mar 2020 07:46 AM IST
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Holi in Rajasthan in 2020 know shekhawati holi
ढ़फ का निर्माण भेड़ के चमड़े को धूप में सुखा कर काठ के गोल घेरे में इस चमड़े को चढ़ाकर किया जाता है। - फोटो : Amar Ujala
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बसंत पंचमी के दिन से ही राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र में होली का हल्ला शुरू हो जाता है। क्षेत्र के हर गांवो के मोहल्लों में अपनी-अपनी ढ़फ पार्टी होती है। ढ़फ बजाने के साथ धमाल गाने का सिलसिला बसंत पंचमी से शुरू होकर गणगौर तक चलता है। ढ़फ वादन की अभिव्यक्ति इतनी प्रभावशाली होती है की ढ़फ पर थाप पड़ते ही लोगों को नाचने पर मजबूर कर देती है।

ढ़फ के साथ गाए जाने वाले लोक गीतों को धमाल के नाम से जाना जाता है। इन धमालों में होली से संबंधित स्थानीय किस्से, कहावतें होती हैं जिनका धमाल के रूप में गाकर वर्णन किया जाता है।

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होली के दिनों में बजाए जाने वाले ढ़फ के साथ धमाल व होली के गीत गाए जाते हैं। पुरुष ढफ़ को अपने एक हाथ से थामकर और दूसरे हाथ से छड़ी के टुकड़े से व हाथ की थपकियों से बजाते हैं। साथ में झांझ, मंजीरे बजाते रहते हैं। एक घेरा बनाकर लोग धमाल गाते हैं। इसमें भाग लेने वाले पुरुष ही होते हैं, किंतु उनमें से कुछ पुरूष महिला वेष धारण कर नाचते हुए लोगों का मनोरंजन करते हैं। ढ़फ वादन के बीच में गांव के पुरुषों द्वारा विभिन्न प्रकार के गीत निकाले जाते हैं। गांवो में ढ़फ मण्डली की कोई विशेष वेश-भूषा नहीं होती है। लोग प्रतिदिन पहनने वाले कपड़े पहनकर ही ढफ़ बजाते हैं।

 

Holi in Rajasthan in 2020 know shekhawati holi
ढ़फ वादन बहुत ही अनुशासित, व्यवस्थित तरीके से होता है। - फोटो : self

ढ़फ वादन का आयोजन रात को होता है। ढ़फ वादन बहुत ही अनुशासित, व्यवस्थित तरीके से होता है। शेखावाटी इलाकों में देर रात तक ढ़फ की थाप पर गूंजती होली की धमाल फाल्गुनी रंग को परवान चढ़ा देती है।

गांवों की चौपालों पर रसिकों की टोलियां ढ़फ की थाप पर थिरकते हुए दिखाई देती है। कलाप्रेमी होली तक चलने वाले इन आयोजनों में धमालों की टेर लगाते हैं। जो देखने-सुनने वालों को भी क्षेत्रीय संस्कृति के आनंद की अनुभूति करवाती है। पहले गांवों में होली के दिनो में औरते घरों के बाहर चौक में इक्कठी होकर होली के गीत गाती थी जिन्हें क्षेत्र में होली के बधावा गाना कहा जाता है।

हालांकि अब ये नजारे कम ही देखने को मिलते हैं। शेखावाटी में ढूंढ का चलन अभी भी व्याप्त है। परिवार में पुत्र के जन्म होने पर उसके ननिहाल पक्ष से कपड़े, मिठाई दिए जाते हैं, जिनकी पूजा कर बच्चे को कपड़े पहनाए जाते हैं व मिठाई मौहल्ले में बांटी जाती है।

आजकल क्षेत्र में बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान के अन्तर्गत बेटी जन्म को बढ़ावा देने के उदेश्य से गांवों में बेटी के जन्म पर भी ढ़ूंढ़ पूजना प्रारम्भ हुआ है। जो कन्या भ्रूण हत्या रोकने की दिशा में एक सकारात्मक प्रयास साबित होगा।

ढ़फ का निर्माण भेड़ के चमड़े को धूप में सुखा कर काठ के गोल घेरे में इस चमड़े को चढ़ाकर किया जाता है। इस पर हल्दी का लेप लगाया जाता है। इन ढफ़ो पर विभिन्न प्रकार के चित्र बनाने के साथ ही ढ़फ मण्डलियों के नाम भी लिखे जाते है। वर्षों से ढफ़ बना रहे चिराना के दौलतराम सैनी ने बताया कि चिराना में बनने वाले ढफ़ वजन में हल्के व मजबूत होते हैं। ढफ़ का घेरा बनाने के लिए आम के पेड़ की लकड़ी काम ली जाती है जो काफी हल्की और मजबूत होती है।

ढफ़ अमूमन 22 से 32 इंच तक के होते हैं। ढफ़ों पर मंढऩे के लिए भेड़ की खाल मंगवाई जाती है। खाल को आकड़े के दूध से साफ करके गुड़, मेथी, गोंद का घोल बनाकर उससे खाल को लकड़ी के घेरे पर चिपकाया जाता है। इसे छांव में ही सुखाया जाता है। नवलगढ़ में ढ़फ बनाने वाले मिंतर खटीक ने बताया कि वह अपना पुस्तैनी काम संभाल रहा है। लेकिन अब धीरे-धीरे ढ़फ का प्रचलन कम होने लगा है।

ढ़फ बनाने वालों का कहना है कि किसी जमाने में हमारे पास खरीददारों की लाइन लगती थी। लेकिन अब स्थिति बिल्कुल विपरीत है। नए लोगों का रुझान दिन प्रतिदिन घटने तथा मंहगाई के कारण इनकी ब्रिकी घटने लगी है। ढ़फ विक्रेताओं का कहना है कि आज के युवा को ढफ़ बजाना भी नहीं आता है वो सिर्फ कैसेट के माध्यम से ही धमाल सुनते हैं।

इनकी जगह फिल्मी गानों ने ले ली है। पहले जहां बसंत पंचमी से ही ढफ़ की आवाज सुनने लग जाती थी वो अब होली पर भी सुनाई नहीं दे रही है। शहरो में जरूर कई संस्थान धमाल पार्टी का आयोजन करवाते हैं। क्षेत्र में मण्डावा, फतेहपुर शेखावाटी, रामगढ़ शेखावाटी की ढफ़ मण्डलियां कोलकाता, मुम्बई, चैन्नई, बेगलुरू, हैदराबाद,सूरत,अहमदाबाद सहित देश, प्रदेश के विभिन्न शहरों में अपनी प्रस्तुतियां देने जाती रहती है।

सरकारी स्तर पर इस लोककला को जिन्दा रखे हुये कलाकारों को किसी भी प्रकार का प्रोत्साहन नहीं दिया जा रहा है। हालात ऐसे ही रहे तो आने वाली पीढ़ी होली की बाते सिर्फ कहानियों में ही सुना करेगी।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 

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