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तमिलनाडु : 59 वर्ष बाद दो द्रविड़ स्तंभों से बाहर निकली राज्य की राजनीति, टीवीके के 'विजय' का उदय
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सार
Tamil Nadu Election Results 2026: तमिलनाडु में सुपरस्टार विजय की पार्टी टीवीके का उदय द्रविड़ राजनीति के पारंपरिक किलों को चुनौती दे रहा है। मतदाताओं का बढ़ता असंतोष और युवाओं का समर्थन राज्य में एक बड़े सत्ता परिवर्तन और वैचारिक बदलाव का संकेत है।
थलापति विजय।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
Vijay Thalapathy TVK: चेन्नई में तमिल फिल्मों के सुपरस्टार और नवोदित तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) पार्टी के संस्थापक जोसेफ विजय चंद्रशेखर के घर उल्लास का माहौल है। परिवार के सदस्यों का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें वो टीवीके के चुनाव चिह्न 'सीटी' को बजा रहे हैं। मात्र दो साल पहले विजय ने टीवीके की स्थापना की थी। नतीजों से स्पष्ट है, वो तमिलनाडु में सरकार बनाने जा रहे हैं। हालांकि, राज्य की राजनीति में किसी फिल्मी स्टार का उदय नई बात नहीं है।
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द्रविड़ राजनीति के दो स्तंभों के बीच नए विकल्प का उदय
वैसे पहले, तमिलनाडु की राजनीति लंबे समय (1967 से अब तक) तक दो बड़े द्रविड़ स्तंभों द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) और अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) के बीच सीमित रही है। अब जिस तरह अभिनेता से नेता बने विजय राजनीति के केंद्र में आते दिखाई दे रहे हैं, वह इस बात का संकेत है कि राज्य की राजनीति एक नए मोड़ पर खड़ी है। यह केवल सत्ता परिवर्तन की संभावना नहीं, अपितु मतदाता के मन में गहराते बदलाव का प्रतिबिंब भी है।
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सत्ता विरोधी लहर और जनता की चुनौतियां
द्रविड़ राजनीति की पहचान हमेशा सामाजिक न्याय, क्षेत्रीय अस्मिता और कल्याणकारी योजनाओं से जुड़ी रही है, लेकिन समय के साथ हर विचारधारा को खुद को नए संदर्भों में ढालना पड़ता है। मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के नेतृत्व में डीएमके सरकार ने कई योजनाएं लागू कीं, परंतु शासन केवल योजनाओं का विस्तार नहीं होता, वह भरोसे की निरंतरता भी मांगता है। पिछले कुछ समय में बिजली दरों में वृद्धि, संपत्ति कर और शहरी अव्यवस्थाओं जैसे मुद्दों ने आम नागरिक के जीवन को सीधे प्रभावित किया है। ऐसे छोटे-छोटे असंतोष जब एक साथ जमा होते हैं तो वे सत्ता विरोध की एक मजबूत धारा बन जाते हैं।
राजनीति में परिवारवाद और विचारधारा पर सवाल
द्रमुक के भीतर परिवार के बढ़ते प्रभाव ने भी सवाल खड़े किए। उदयानिधि स्टालिन का तेजी से उभार यह संकेत देता है कि क्या राजनीतिक अवसर समान रूप से वितरित हो रहे हैं या नहीं? राजनीति में विरासत कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब यह योग्यता पर भारी पड़ती दिखे तो जनता का विश्वास डगमगाने लगता है। इसी के समानांतर, धार्मिक मुद्दों पर दिए गए कुछ बयानों ने भी एक बड़े वर्ग को असहज किया है। द्रविड़ राजनीति का मूल स्वर भले ही धर्मनिरपेक्षता रहा हो, लेकिन आज का मतदाता अपनी पहचान के हर पहलू को सम्मान के साथ देखना चाहता है। यदि उसे यह सम्मान नहीं मिलता तो उसकी नाराजगी चुपचाप वोट में बदल जाती है।
फिल्मी लोकप्रियता से राजनीतिक आधार तक का सफर
ऐसे माहौल में विजय और उनकी पार्टी टीवीके का उभार केवल एक राजनीतिक घटना नहीं, अपितु सामाजिक मनोविज्ञान का परिणाम है। विजय की लोकप्रियता फिल्मों से शुरू हुई, लेकिन उन्होंने उसे केवल परदे तक सीमित नहीं रखा। उनके प्रशंसक समूह धीरे-धीरे एक संगठित राजनीतिक आधार में बदल गए। यह वही रास्ता है, जिसे कभी एम.जी. रामचंद्रन ने अपनाया था और बाद में वह तमिलनाडु की राजनीति में स्थाई छाप छोड़ गए। फर्क इतना है कि आज का दौर सोशल मीडिया और तेज सूचना प्रवाह का है, जहां छवि और संदेश, दोनों तेजी से बनते और बदलते हैं।
फिल्मी लोकप्रियता से राजनीतिक आधार तक का सफर
विजय की छवि अपेक्षाकृत साफ-सुथरी रही है। उन्होंने खुद को पारंपरिक द्रविड़ राजनीति और कट्टर वैचारिक ध्रुवों से थोड़ा अलग रखते हुए एक संतुलित विकल्प के रूप में पेश किया है। खासकर युवाओं और पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं के बीच उनका आकर्षण स्पष्ट दिखता है, लेकिन यहां एक गंभीर सवाल खड़ा होता है, क्या लोकप्रियता और नैतिक छवि शासन की जटिलताओं को संभालने के लिए पर्याप्त होती है?
करिश्मा बनाम अनुभव की चुनौती
इतिहास यह बताता है कि करिश्मा चुनाव जिता सकता है, लेकिन शासन चलाने के लिए अनुभव, टीम और नीतिगत स्पष्टता जरूरी होती है। यदि एआईएडीएम की बात करें तो वो भी धीरे-धीरे अपनी जमीन मजबूत करती दिखाई दे रही है। एडप्पाडी. के. पलनीस्वामी के नेतृत्व में पार्टी ने आंतरिक संघर्षों को काफी हद तक नियंत्रित किया है। ग्रामीण इलाकों में उसका पारंपरिक आधार अब भी मजबूत है। महंगाई और कृषि संकट जैसे मुद्दों ने उसे फिर से प्रासंगिक बना दिया है। जे. जयाललिता के समय की कल्याणकारी योजनाएं आज भी लोगों के मन में एक भावनात्मक जुड़ाव पैदा करती हैं।
राष्ट्रीय राजनीति पर तमिलनाडु के बदलाव का असर
हालांकि, तमिलनाडु में सत्ता परिवर्तन का असर केवल राज्य तक सीमित नहीं रहेगा। यदि द्रमुक कमजोर होती है तो इंडी गठबंधन की ताकत पर भी असर पड़ेगा। विजय जैसे नए नेताओं का उभार यह संकेत देता है कि भारतीय राजनीति में अब भी नए चेहरों के लिए जगह बनी हुई है, बशर्ते वे जनता की अपेक्षाओं को समझ सकें। दक्षिण भारत, जिसे लंबे समय तक एक स्थिर राजनीतिक क्षेत्र माना जाता था, अब प्रयोग और परिवर्तन का केंद्र बनता दिखाई दे रहा है।
बदलाव की दिशा और जनता की नई आकांक्षाएं
सवाल यह नहीं है कि कौन जीतेगा या कौन हारेगा?, बल्कि यह है कि तमिलनाडु की राजनीति किस दिशा में जा रही है। क्या यह बदलाव केवल अस्थाई लहर है या फिर एक स्थाई परिवर्तन की शुरुआत? क्या द्रविड़ राजनीति अपने मूल स्वरूप को बचाए रखते हुए नए समय के साथ खुद को ढाल पाएगी या फिर नए चेहरे और नए विचार उसे नई दिशा देंगे? तमिलनाडु की जनता अब यह स्पष्ट संकेत दे रही है कि केवल इतिहास या नाम के आधार पर सत्ता नहीं मिलती। आज का मतदाता परिणाम चाहता है, संतुलन चाहता है और सबसे बढ़कर वह अपने लिए एक ऐसा विकल्प चाहता है, जो उसकी बदलती आकांक्षाओं को समझ सके। यही इस संभावित महापरिवर्तन का सबसे बड़ा संदेश है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
