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जीवन धारा: क्षितिज सीमा नहीं निमंत्रण है आगे बढ़ने का

रिचर्ड पार्क्स Published by: Devesh Tripathi Updated Thu, 18 Jun 2026 07:50 AM IST
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सार
सबसे बड़ी बाधा आपके सामने खड़ा पर्वत नहीं, बल्कि भीतर की वह आवाज है, जो कहती है कि आप उस पर चढ़ नहीं सकते। जब आप उस आवाज को सवालों के घेरे में लाना सीख जाते हैं, तब दुनिया बदलने लगती है।
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जीवन धारा - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

मैंने अपने जीवन में पर्वतों से अधिक ऊंची दीवारें देखी हैं। वे पत्थर, बर्फ या चट्टानों की नहीं थीं, वे मेरे अपने मन में खड़ी थीं। लोग मुझे एक पर्वतारोही और ध्रुव यात्री के रूप में जानते हैं, पर एक समय था, जब मेरी पहचान रग्बी के मैदान से जुड़ी थी। मुझे लगता था कि मेरा भविष्य स्पष्ट है। मैं जानता था कि मैं कौन हूं और मुझे कहां पहुंचना है। फिर एक दिन सब बदल गया। एक गंभीर चोट ने मेरे खेल जीवन का अंत कर दिया। उस समय मेरे सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं था कि मैं आगे क्या करूंगा, बल्कि यह था कि अब मैं हूं कौन? तब मुझे पहली बार समझ में आया कि मनुष्य की सबसे बड़ी लड़ाई अपने भीतर उठने वाले भय, संदेह व असुरक्षा से होती है। मैंने महसूस किया कि चोट मेरे शरीर में नहीं, बल्कि विश्वास को लगी थी। मेरे मन ने मुझे बताना शुरू कर दिया कि अब मेरे सर्वश्रेष्ठ दिन बीत चुके हैं, आगे कुछ भी नया संभव नहीं है। लेकिन, धीरे-धीरे मैंने एक बात समझी। जब हम किसी मुश्किल दौर का सामना करते हैं, तो अक्सर हकीकत से मुंह मोड़ लेते हैं और अपनी कल्पनाओं, आशंकाओं तथा डर में जीने लगते हैं।


जब मैंने पहली बार पर्वतों की ओर कदम बढ़ाया, तो मुझे पर्वतारोहण का कोई तजुर्बा नहीं था। मेरे सामने ऐसे लोग थे, जो वर्षों से पर्वतारोहण कर रहे थे। अगर मैं केवल हालात को ही देखता रहता, तो शायद मुझे प्रयास ही नहीं करना चाहिए था। लेकिन, मैंने पाया कि प्रगति का रहस्य भविष्य की पूरी यात्रा देखने में नहीं, बल्कि अगले कदम पर ध्यान देने में है। एवरेस्ट की चढ़ाई के दौरान कोई भी व्यक्ति एक ही छलांग में शिखर तक नहीं पहुंचता। वह पहले एक-एक करके कदम बढ़ाता है। कभी हवा उसका विरोध करती है, तो कभी ठंड, तो कभी थकान। पर, सबसे कठिन क्षण वे नहीं होते, जब शरीर थकता है, बल्कि वे होते हैं, जब मन हार मानने लगता है। जब मैंने ‘737 चैलेंज’, यानी सात महाद्वीपों की सर्वोच्च चोटियों और तीन ध्रुवों तक पहुंचने का विचार रखा, तो कई लोगों को यह असंभव लगा। सच कहूं तो कभी-कभी मुझे भी ऐसा ही लगता था। दरअसल, होता यह है कि जब हम किसी लक्ष्य को देखते हैं और उसे बोझ समझने लगते हैं, तो डर जाते हैं। लेकिन यदि हम उसी लक्ष्य को छोटे-छोटे चरणों में बांट दें, तो वही असंभव कार्य संभव होने लगता है। मैंने सीखा कि साहस भय की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि वह क्षमता है, जिसके द्वारा हम भय के साथ भी आगे बढ़ते रहते हैं।


यदि मेरे जीवन की यात्रा ने मुझे कोई एक सबक दिया है, तो वह यही है कि सबसे बड़ी बाधा वह पर्वत नहीं है, जो आपके सामने खड़ा है। सबसे बड़ी बाधा भीतर की वह आवाज है, जो कहती है कि आप उस पर्वत पर चढ़ नहीं सकते। जब आप उस आवाज को सवालों के घेरे में लाना सीख जाते हैं, तब दुनिया बदलने लगती है। तब आप पाते हैं कि क्षितिज वास्तव में सीमा नहीं था। वह तो केवल एक निमंत्रण था आगे बढ़ने, स्वयं को खोजने और यह जानने का कि आप वास्तव में कितने सक्षम हैं।
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