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ऋतोब्रत बनर्जी फिलहाल रहेंगे नेता प्रतिपक्ष, लेकिन हाई कोर्ट की 10 टिप्पणियों ने बढ़ाई सियासी धड़कनें
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सार
नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति को लेकर पश्चिम बंगाल विधानसभा और कलकत्ता हाईकोर्ट के इतिहास में यह पहला मामला माना जा रहा है।
ममता बनर्जी कलकत्ता हाईकोर्ट
- फोटो : ANI
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विस्तार
पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद को लेकर चल रहे मामले में कलकत्ता हाइकोर्ट ने फिलहाल कोई अंतरिम आदेश नहीं दिया है। परिणामस्वरूप, ऋतब्रत बनर्जी ही अभी नेता प्रतिपक्ष के पद पर बने रहेंगे। स्पीकर रथींद्र बसु का फैसला फिलहाल प्रभावी रहेगा।
हाईकोर्ट की एकल पीठ में जस्टिस कृष्णा राव ने 16 और 17 जून की सुनवाई के बाद 18 जून को स्पीकर के निर्णय में किसी प्रकार का हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति कृष्ण राव ने कहा कि मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई को होगी। उन्होंने सभी पक्षों को उस दिन तक अपने-अपने हलफनामे (एफिडेविट) दाखिल करने का निर्देश दिया है।
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नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति को लेकर पश्चिम बंगाल विधानसभा और कलकत्ता हाईकोर्ट के इतिहास में यह पहला मामला माना जा रहा है। दो दिनों तक चली सुनवाई के दौरान जस्टिस कृष्णा राव ने कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं, जिन्होंने इस संवैधानिक और संसदीय विवाद के विभिन्न पहलुओं को सामने रखा।
जस्टिस कृष्णा राव की 10 प्रमुख टिप्पणियां:-
➡️ स्पीकर ने टीएमसी के मूल प्रस्ताव की जांच शुरू तभी ही कर दी थी, जब उस पर उस समय इसके बारे में कोई शिकायत भी नहीं मिली थी।
➡️ स्पीकर टीएमसी विधायकों के उस फैसले को मानने के लिए बहुत उत्सुक दिखे, जिसमें उन्होंने पार्टी के आधिकारिक पसंद के बजाय सदन में अपना नेता नियुक्त किया था।
➡️ स्पीकर इस बात के लिए बहुत उत्सुक दिखे की 58 विधायक बहुमत में हैं और मैं उन्हें नियुक्त करता हूं, लेकिन 78 विधायकों के मामले में आपके स्पीकर ने सारी जांच शुरू कर दी, ऐसा क्यों?
➡️ नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति के संबंध में अगर एक ही राजनीतिक दल से दो अलग अलग प्रस्ताव मिले तो स्पीकर को कौन सी प्रक्रिया अपनानी चाहिए?
➡️ स्पीकर क्या स्वतः संज्ञान लेते हुए निर्णय ले सकते हैं या फिर दोनों पक्षों को सुनवाई का अवसर देना आवश्यक होगा?
➡️ शोभनदेव चट्टोपाध्याय को नियुक्त करने के लिए एक प्रस्ताव 9 मई को भेजा गया था उस पर तत्काल कार्रवाई क्यों नहीं की?
➡️ विधायकों के हस्ताक्षर को लेकर 27 मई को शिकायत की गई थी जबकि नियुक्ति संबंधी प्रस्ताव काफी पहले भेजा गया था।
➡️ नेता प्रतिपक्ष पद के लिए ऋतोब्रत बनर्जी का नाम किसने प्रस्तावित किया था? क्योंकि यह प्रस्ताव किसी राजनीतिक दल की ओर से ही आना चाहिए।
➡️ जालसाजी की शिकायत के बाद एफआईआर और फिर सीआईडी जांच पूरा होने के पहले ही नेता प्रतिपक्ष क्यों चुन लिया गया?
➡️ जिस व्यक्ति को पार्टी ने 1 जून को दल से निष्कासित कर दिया, क्या उस व्यक्ति को ही 3 जून को नेता चुना जा सकता है?
टिप्पणियों को देखने पर स्पष्ट होता है कि हाइकोर्ट की मुख्य चिंता प्रक्रिया की निष्पक्षता, स्पीकर की भूमिका की सीमाएं और नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति की वैधानिकता से जुड़ी हुई थी। फोकस केवल बहुमत के दावे पर नहीं, बल्कि निर्णय लेने की पूरी प्रक्रिया की वैधता, निष्पक्षता और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के पालन पर था।
बहरहाल, 28 जुलाई को अगली सुनवाई में यदि स्थिति बदलती है तो तब सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि बागी गुट आगे क्या कदम उठाएगा? क्या वह भी बागी सांसदों की राह पर चलेगा? दूसरी ओर, ममता बनर्जी के खेमे में भी कुल विधायकों का 10 प्रतिशत यानी 30 विधायक नहीं हैं, जिससे विपक्ष के नेता के पद को लेकर संवैधानिक और राजनीतिक पेचीदगियां और बढ़ सकती हैं।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।